नारायण विश्वकर्मा
पिछले 26 साल से जेपीएससी को सुधारने के लिए कोई भी सरकार दो कदम आगे नहीं बढ़ सकी. अब तो पेपर लीक मामूली घटना है. पेपर लीक होता नहीं, सीटें ही सीधे रसूखदारों को बेच दी जाती है। उनके रिश्तेदार परीक्षा में शामिल हो जाते हैं बस, बाक़ी उनका सलेक्शन पक्का है। झारखंड में रघुवर सरकार ने मजे में पांच साल शासन किया लेकिन जेपीएससी की नियुक्ति परीक्षा कराना कभी मुनासिब नहीं समझा. परीक्षा कराने को लेकर सरकार से कभी जवाब-तलब भी नहीं हुआ.
हेमंत सोरेन के शासनकाल में जेपीएससी की परीक्षाएं शुरू होने के बाद धांधलियों की खबरें आई. हालांकि इस बीच नौकरियां भी दी गई. कुछ मामले अभी झारखंड हाईकोर्ट में लंंबित है. मुकदमे की रफ्तार उतनी ही धीमी है, जितनी झारखंड विधानसभा में हुई नियुक्तियों की. इस बीच किसी को सजा नहीं हुई है. ये है परीक्षा में हुई धांधलियों की हकीकत.
एक राजनीतिक विशेषज्ञ मानना है कि जेपीएससी में धांधली पहली बार झारखंड सरकार के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूूूलाल मरांडी के शासनकाल में हुआ. उस समय झारखंड के मंत्रियों-विधायकों और रसूखदारों के रिश्तेदार आज भी बहाल हैं. मौजूदा सरकार में विपक्ष के कई विधायक और सत्तापक्ष के मंंत्री उनके रिश्तेदार हैं. चूंकि जांच एजेंंसियों ने अपना काम कर दिया है. हालांकि अभी भी उनकी नौकरियों पर तलवार लटकी हुई है. इस बीच दो दशक से अधिक समय गुजर गए. ये सभी प्रमोशन पाकर आराम से काम कर रहे हैं. लेकिन कानून बहाल अधिकारियों का बाल भी बांका नहीं कर सका.
शिक्षा माफियाओं की जेेब में है कानूून
सरकार क़ानून का झुनझुना बजाने के लिए हमें थमा दिया है. केंद्र सरकार पेपर लीक को लेकर इतनी गंभीर हुई कि दो वर्ष पहले एक कठोर कानून बना दिया. लेकिन शिक्षा माफियाओं ने कानून को ठेंगा दिखा दिया. गिरफ्तार हुए लोगों को जमानत मिल गई है. अभी तक कनविक्शन रेट 0 रहा. इस साल एनटीए ने नीट की परीक्षा करायी. पेपर लीक हुआ. कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं. फिर संजीव बालियान की तरह साक्ष्य के अभाव कुछ लोगों को जमानत मिल जाएगी.
नए कानून में तीन माह में जांच कराकर दोषियों को सजा दिलाने का प्रावधान है. लेकिन कानूून तो शिक्षा माफियाओं की जेेब में है. उनका इतराना इस मामले में जायज है. क्योंकि उन्हें सरकार का संंरक्षण प्राप्त है. इसका प्रमाण पिछली गड़बड़ियों से पता चलता है. फिर काहे का डर? जांच की सुस्त रफ्तार कायम रहेगी. फिर फास्ट ट्रैक कोर्ट इनका क्या बिगाड़ लेगा?
देश में पहली बार कॉकरोच जनता पार्टी का उदय हुआ. काफी मशक्कत के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ. उन्होंने अपने कार्यकाल में शिक्षा जगत का ऐसा कायाकल्प किया कि संसद परिसर में उनका जोरदार इस्तकबाल किया गया. फूल-मालाओं से उन्हें लाद दिया गया.
जंतर मंतर में जो कुछ घटित हुआ उसे पूरी दुनिया ने देखा-जाना और समझा. सरकार की गंभीरता देेेेखिए कि सीजेपी की तीन मांगों में सिर्फ शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ है. बाकी दो मांगों पर अभी तक फैसला आना बाकी है, जबकि सरकार ने सिर्फ दो दिन का समय मांगा था.
उधर, संसद में गृृृृृहमंत्री अमित शाह संसद में जवाब देेेने के लिए विपक्ष का धरना-प्रदर्शन जारी है. इस बीच मानसून सत्र के दो हफ्ते गुजर गए. संसद ठप है. 13 अगस्त को मानसून सत्र का अवसान हो जाएगा.
झारखंड में पेपर लीक को लेकर सत्तापक्ष-विपक्ष में नुराकुश्ती जारी है. विपक्ष पेपर लीक पर गरज-बरस रहा है तो उधर सत्तापक्ष उनके शासनकाल में हुुई धांधली को गिना रहा है. जेपीएससी कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारी के साथ साथ कोचिंग संस्थानों के संचालकों का हर बार नाम आता है, पर जाँच एजेंसियों को कुछ भी हासिल नहीं होता.
दरअसल, पेपर लीक को लेकर केंद्र-राज्य सरकारें चाहे जितने भी कठोर कानून बना ले…जबतक सिस्टम का ‘लीकेज’ बंद नहीं होगा तबतक पेपर लीक होता रहेगा.

हजारीबाग के युवक ने नेहा बोरा पर स्याही फेंककर माहौल गरमाया, क्या बदलेेेगा आंदोलन का स्वरूप …!
शुक्रवार की शाम रांची में छात्रों के अबतक के सफल आंदोलन में कालिख पोतने का काम कर दिया गया. वामपंथी छात्र संगठन आइसा की नेत्री नेहा बोरा दिल्ली से रांची पहुंची थी. विधानसभा मार्च के दौरान हजारीबाग के एक युवक ने नेहा बोरा पर स्याही फेंक दी. इधर, नेहा बोरा आंदोलन स्थल पर मंच पर पहुंची तो युवकों ने उन्हें धक्का देकर नीचे उतार दिया. कहा गया कि उन्हें राष्ट्र विरोधी शक्तियों की जरूरत नहीं है. हम अपना आंदोलन खुद संभाल लेंगे.
हालांकि आंदोलन को गलत दिशा देने की लगातार कोशिश हो रही है. दिल्ली से रांची पहुंचे राष्ट्री्य खबरिया चैनलों के महान एंकरों ने आंदोलन को भटकाने और हिंदू-मुस्लिम एंगल देने में जुटे हुए हैं. नेशनल मीडिया के दर्जनों पत्रकार कवरेज के लिए रांची में जमे हुए हैं.
नेहा बोरा के ऊपर स्याही फेंकने को लेकर अब थोड़ा नरेटिव बदलेगा और आंदोलन का स्वरूप भी बदल सकता है. हेमंंत सोरेन को समय रहते छात्रों की मांगों लेकर गंभीरता दिखानी चाहिए थी. आंदोलनरत छात्रों को बुलाने की बदले सीएम खुद जाकर पहल करते. छात्रों से कनेक्ट होते तो कुछ और बात होती. इस मामले में कर्नाटक सरकार ने मिसाल पेश की है. आंदोलन को बढ़ने से रोकने का सार्थक प्रयास होना चाहिए.







