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Friday, August 14, 2026
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राहुल गांधी ने भारतीय मीडिया की वर्तमान स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठाया है

मीडिया को सत्ता का शत्रु नहीं, पर सत्ता से सवाल पूछनेवाला स्वतंत्र प्रहरी जरूर होना चाहिए

राहुल गांधी ने जब यह कहा कि “मीडिया सत्ता के सामने चूहे की तरह हो गया है”, तो यह केवल पत्रकारों पर की गई सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी. इस बयान के पीछे भारतीय मीडिया की वर्तमान स्थिति को लेकर एक गंभीर सवाल छिपा है—क्या आज भारतीय पत्रकारिता सत्ता से वैसे ही सवाल पूछ पा रही है, जैसे लोकतंत्र में उससे अपेक्षा की जाती है? इस सवाल को केवल राजनीतिक आरोप मानकर खारिज कर देना आसान है, पर भारत में प्रेस की स्वतंत्रता, मीडिया की आर्थिक संरचना व पत्रकारों के सामने मौजूद दबावों से जुड़े कुछ तथ्य इस बहस को गंभीर बना देते हैं.

भारत दुनिया के सबसे बड़े मीडिया बाजारों में से एक है. Reporters Without Borders के अनुसार देश में लगभग 21 करोड़ घरों में टेलीविजन है, करीब 900 निजी टेलीविजन चैनल हैं, जिनमें लगभग आधे समाचार चैनल हैं. इसके अलावा भारत में 1.40 लाख से अधिक प्रकाशन निकलते हैं और प्रिंट मीडिया का संयुक्त प्रसार 39 करोड़ से अधिक प्रतियों का है.

यानी भारतीय मीडिया का आकार बहुत बड़ा है; सवाल उसके आकार का नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और संपादकीय स्वायत्तता का है. Reporters Without Borders इसी संदर्भ में 2026 का World Press Freedom Index महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने रखता है. Reporters Without Borders के 2026 सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है और उसका स्कोर 31.96 है.2025 में भारत 151वें स्थान पर था, यानी एक वर्ष में उसकी रैंकिंग छह स्थान नीचे गई.

राहुल गांधी के बयान की अहमियत इसी सवाल में है कि पत्रकार का काम सत्ता के बयान को केवल दोहराना है या उससे जवाब मांगना भी। आज टेलीविजन की राजनीतिक बहसों को देखें तो कई बार विपक्षी नेताओं से बेहद तीखे सवाल पूछे जाते हैं, जबकि सरकार या सत्ताधारी दल के नेताओं के सामने वही तेवर दिखाई नहीं देता।

पत्रकारिता का काम बयान को खबर बनाना भर नहीं, बल्कि बयान की जांच करना भी है

पत्रकारिता का मूल धर्म किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है. जब कोई केंद्रीय मंत्री किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक या संसदीय विषय पर टेलीविजन पर बयान देता है, तो पत्रकार की जिम्मेदारी केवल उस बयान को प्रसारित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए.

उसे पूछना चाहिए कि मंत्री के दावे का आधार क्या है, उपलब्ध आंकड़े क्या कहते हैं, विपक्ष के आरोपों का जवाब क्या है और संसद में इस विषय पर सरकार ने क्या रुख अपनाया है. दूसरे शब्दों में, पत्रकारिता का काम बयान को खबर बनाना भर नहीं, बल्कि बयान की जांच करना भी है.

यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी का “चूहा” वाला रूपक अर्थपूर्ण हो जाता है. यदि पत्रकार सत्ता के सामने असुविधाजनक प्रश्न पूछने से बचता है, तो वह अपनी सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक भूमिका को कमजोर करता है.

लेकिन इस आरोप की दूसरी तरफ यह सावधानी भी जरूरी है कि किसी पत्रकार द्वारा सरकार से कम तीखे सवाल पूछना अपने आप में सरकारी दबाव का प्रमाण नहीं है. उसके पीछे संपादकीय नीति, कार्यक्रम का प्रारूप, समय की कमी, पत्रकार की अपनी दृष्टि या संस्थान की व्यावसायिक प्राथमिकताएं भी हो सकती हैं.

मोदी सरकार के दौर में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर बहस और अधिक तीखी हुई 

बीबीसी के कार्यालयों पर आयकर विभाग की कार्रवाई, इसके बाद 2025 में प्रवर्तन निदेशालय ने बीबीसी पर विदेशी मुद्रा नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर लगभग 3.15 लाख पाउंड का जुर्माना लगाया, दैनिक भास्कर और भारत समाचार पर आयकर कार्रवाई, न्यूज़क्लिक से जुड़े पत्रकारों पर कानूनी कार्रवाई तथा कश्मीर के पत्रकारों पर UAPA जैसे कठोर कानूनों के इस्तेमाल ने प्रेस स्वतंत्रता को लेकर देश-विदेश में सवाल पैदा किए.

सरकार का पक्ष यह रहा है कि सरकारी एजेंसियां कानून के अनुसार कार्रवाई करती हैं और किसी मीडिया संस्थान को उसकी पत्रकारिता के कारण निशाना नहीं बनाया जाता. दूसरी ओर पत्रकार संगठनों और विपक्ष का आरोप रहा है कि आलोचनात्मक पत्रकारिता करने वाले संस्थानों पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है.

मीडिया की विश्वसनीयता का प्रश्न केवल सरकार बनाम पत्रकार का प्रश्न भी नहीं है। मीडिया के सामने आर्थिक दबाव, विज्ञापन पर निर्भरता, कॉरपोरेट स्वामित्व का केंद्रीकरण, टीआरपी और डिजिटल क्लिक की प्रतिस्पर्धा तथा सोशल मीडिया पर राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियां भी हैं.

इसलिए “गोदी मीडिया” और “चूहा मीडिया” जैसे शब्दों को केवल राजनीतिक नारे के रूप में देखना भी अधूरा होगा. इन शब्दों के पीछे समाज में मौजूद एक व्यापक असंतोष को समझना आवश्यक है.

जब दर्शक यह महसूस करता है कि विपक्ष से कठिन सवाल पूछे जा रहे हैं लेकिन सरकार से अपेक्षाकृत आसान सवाल किए जा रहे हैं, जब किसी सरकारी दावे की स्वतंत्र जांच के बजाय उसे सीधे प्रसारित किया जाता है, या जब बहस तथ्य और नीति के बजाय राजनीतिक शोर में बदल जाती है, तो मीडिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है.

फिर भी भारतीय मीडिया की पूरी तस्वीर केवल टेलीविजन स्टूडियो से नहीं बनती. देश में प्रिंट, डिजिटल और क्षेत्रीय पत्रकारिता का विशाल नेटवर्क है. छोटे शहरों और गांवों में काम करने वाले पत्रकार स्थानीय भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक समस्याओं को सामने लाते हैं.

इसलिए यह कहना कि पूरा मीडिया “चूहा” बन चुका है, वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा. राहुल गांधी का बयान एक राजनीतिक रूपक है, उसे भारतीय पत्रकारिता की प्रत्येक संस्था या प्रत्येक पत्रकार पर लागू तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता.

मीडिया का काम सरकार गिराना या विपक्ष को सत्ता में पहुंचाना नहीं, बल्कि सत्ता को जवाबदेह बनाना है.

असल सवाल इससे कहीं बड़ा है. क्या पत्रकार प्रधानमंत्री से भी वही सवाल पूछ सकता है जो वह विपक्ष के नेता से पूछता है? क्या गृह मंत्री से भी जवाब मांगा जा सकता है? क्या किसी मुख्यमंत्री के दावे की स्वतंत्र जांच की जा सकती है? क्या सरकार की लोकप्रियता से प्रभावित हुए बिना उसकी नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा हो सकती है? और क्या विपक्ष के दावों की भी उसी कठोरता से जांच की जाती है?

लोकतंत्र में मीडिया का काम सरकार गिराना नहीं है और न ही विपक्ष को सत्ता में पहुंचाना. उसका काम सत्ता को जवाबदेह बनाना है. सरकार सही हो तो उसके काम की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग होनी चाहिए और सरकार गलत हो तो उसके खिलाफ सवाल भी उठने चाहिए. यही कसौटी विपक्ष पर भी लागू होनी चाहिए. पत्रकार का पहला दायित्व किसी नेता, पार्टी या सरकार के प्रति नहीं, बल्कि तथ्य और जनता के प्रति होना चाहिए.

राहुल गांधी के बयान की असली परीक्षा उनके राजनीतिक व्यक्तित्व में नहीं, बल्कि उस सवाल में है जिसे उन्होंने उठाया है. 2026 में भारत की 157वीं प्रेस-स्वतंत्रता रैंकिंग अपने आप में किसी सरकार के खिलाफ आरोप-पत्र नहीं है, लेकिन यह इतना जरूर बताती है कि मीडिया स्वतंत्रता का सवाल केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है।

राहुल गांधी का “सत्ता के सामने चूहे बन गया मीडिया” कहना अतिशयोक्तिपूर्ण राजनीतिक भाषा हो सकता है, लेकिन इसके पीछे मौजूद सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

लोकतंत्र में मीडिया को सत्ता का विरोधी होना आवश्यक नहीं है, लेकिन उसे सत्ता का स्वतंत्र प्रश्नकर्ता जरूर होना चाहिए. पत्रकार को पूछना चाहिए—आपने यह निर्णय क्यों लिया? इसका प्रमाण क्या है? जनता पर इसका असर क्या होगा? वादा पूरा क्यों नहीं हुआ? संसद में इस सवाल का सामना क्यों नहीं किया गया?

लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति यह नहीं है कि मीडिया सरकार की आलोचना करे. सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब मीडिया सवाल पूछना ही छोड़ दे. जिस दिन पत्रकार सत्ता के सामने असुविधाजनक प्रश्न रखने की हिम्मत खो देता है, उसी दिन लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण प्रहरी कमजोर पड़ने लगता है. और शायद राहुल गांधी के “चूहे” वाले बयान की सबसे गंभीर लोकतांत्रिक व्याख्या भी यही है—मीडिया को सत्ता का दुश्मन नहीं, लेकिन सत्ता से सवाल पूछने वाला स्वतंत्र प्रहरी जरूर होना चाहिए.

 


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