नारायण विश्वकर्मा
रांची
झारखंड में स्वास्थ्य जगत का सबसे बड़ा महकमा रिम्स अक्सर विवादों में घिरा रहता है. निर्दलीय विधायक सरयू राय ने स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता पर पद का दुरुपयोग कर अपने लोगों के नाम से कोविड प्रोत्साहन राशि की निकासी का आरोप लगाया है. यह मामला अभी सुर्खियों में है. लेकिन यहां याद दिला दूं कि स्वास्थ्य मंत्री बनने के एक साल बाद यानी कोरोनाकाल (2020) में रिम्स जैसी स्वायत्त संस्था (ऑटोनोमस) से उनपर गाड़ी उपहार में लेने का आरोप लगा था. जब मामला तूल पकड़ने लगा तो, मंत्री ने जांच कराने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ा था. रिम्स के इतिहास में ऐसा मामला पहली बार आया था, जब अनुदान पर चल रहा किसी संस्थान ने मंत्री के लिए गाड़ी खरीदने का प्रस्ताव लाया था.
गाड़ी लेने की सहमति खुद मंत्री ने दी थी
बता दें कि रिम्स शासी परिषद की बैठक में ही रिम्स में दवा खरीद से लेकर, उपकरण और बाकी महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं. जहां दवा और उपकरण से लेकर रिम्स से जुड़े निर्णय लिए जाने चाहिए वहां स्वास्थ्य मंत्री के लिए गाड़ी खरीदने का प्रस्ताव तैयार किया गया था. यह इतनी अजीब बात थी कि रिम्स जैसे बड़े अस्पताल में कोरोना को लेकर जब चहुंओर अफरातफरी का माहौल था. एम्बूलेंस कम पड़ गई थी, तब रिम्स के जीबी के एजेंडे में मंत्री जी के लिए गाड़ी खरीदने का प्रस्ताव शामिल किया गया था. उस समय सब कुछ तय हो गया था. 14 अक्तूबर 2020 को मंत्री जी के लिए गाड़ी खरीदने की मंजूरी मिलनेवाली थी. यह एजेंडे के 24वें नंबर में लिखा हुआ था. इस प्रस्ताव को खुद परिषद के शासी निकाय के अध्यक्ष होने के नाते स्वास्थ्य मंत्री इसे सहमति दी थी.
मामला तूल पकड़ा तो निदेशक ने पल्ला झाड़ा
इस संबंध में बवाल मचने पर तत्कालीन रिम्स निदेशक प्रभारी डॉ. मंजू गाड़ी ने कहा था कि रिम्स द्वारा मंत्री को गाड़ी का तोहफा दिया जा रहा है. जरूरत के हिसाब से गाड़ियां खरीदी जाती रही हैं. स्वीकृति मिलने के बाद गाड़ी की खरीदे जाने की बात उन्होंने स्वीकारी थी. दरअसल, जैसे ही ये मामला तूल पकड़ने लगा तो रिम्स निदेशक ने भी इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की. रिम्स निदेशक ने कहा कि गाड़ी नहीं खरीदी जा रही है. पहले के जीबी में प्रस्ताव रखा गया था, उसी को हमलोग लाए हैं. अब सवाल यह है कि अगर ये प्रस्ताव पिछली सरकार का है तो इसे जीबी में लाने से पहले दुरुस्त क्यों नहीं किया गया?
जरा देखिए मंत्री की कठदलीली…!
इस मामले में स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की सफाई पर थोड़ा गौर फरमाएं. मंत्री ने कहा कि मुझे गाड़ी की आवश्यकता नहीं है. क्योंकि पहले से सरकार ने गाड़ी दे रखी है. बेमतलब के गाड़ी की लंबी कतार का कोई मतलब नहीं है. मुझे नहीं मालूम किन परिस्थिति में एजेंडा में डाला गया है. हम बहुत हड़बड़ी में थे, जो बच्चों को लाने के लिए गाड़ी की जरूरत थी, मैंने उसमें कहा था ठीक है. ये मामला पूर्व डायरेक्टर डीके सिंह से जुड़ा है क्योंकि हो सकता है उन्होंने पूर्व के मंत्री के लिए गाड़ी का प्रस्ताव लाया होगा. उस प्रसंग में आया होगा. मुझे गाड़ी की जरूरत नहीं हैं. मैं समाजवादी रहा हूं, मुझे गाड़ी के विलासिता की आवश्यकता नहीं है. अलबत्ता रिम्स प्रबंधन की ओर यह कुतर्क दिया गया था कि तीन-तीन बार क्रास चेक होने के बावजूद एजेंडे से गाड़ी नहीं हटी. इस बीच सबकुछ पब्लिक डोमेन में आ चुका था और रिम्स प्रबंधन और मंत्री जी की भद्द पिट चुकी थी.
पूर्व निदेशक ने कहा था-मंत्री ने गलतबयानी की
दरअसल, रिम्स में 49वीं जीबी बैठक के बाद तत्कालीन प्रभारी निदेशक मंजू गाड़ी ने पूर्व निदेशक डॉ. डीके सिंह पर आरोप लगाया था कि उन्होंने ही स्वास्थ्य मंत्री के लिए वाहन क्रय का प्रस्ताव 48वीं जीबी बैठक में लाया था. उसी को गलती से लागू कर दिया गया. इस पर पूर्व निदेशक डॉ. डीके सिंह ने अपनी सफाई पेश करते हुए कहा था कि स्वास्थ्य मंत्री और प्रभारी निदेशक दोनों झूठ बोल रहे हैं. उन्होंने मंत्री के लिए गाड़ी खरीद का कोई प्रस्ताव नहीं लाया था. डॉ सिंह ने कहा था कि बन्ना गुप्ता ने स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद ही रिम्स प्रबंधन से खुद के लिए वाहन की मांग की थी. मंत्री के पहले पीएस ने लिखित रूप से एक गाड़ी जमशेदपुर से राजेश कुमार नाम के व्यक्ति को ओएसडी और एक ड्राइवर की मांग की थी. मंत्री के दो महीने के लिए बोलेरो गाड़ी भाड़े पर लेकर दी गई थी.
मंत्री जी बताएं-दो साल बाद भी जांच क्यों नहीं हुई?
सच कहा जाए तो 15 अक्तूबर 2020 रिम्स जीबी की बैठक में बन्ना गुप्ता का झूठ पकड़ा गया था. अगर ऐसा है तो दो साल बाद भी मंत्री ने इसकी जांच क्यों नहीं करायी? जांच की फाइल कहां धूल फांक रही है. इस बारे में रिम्स प्रबंधन को कुछ नहीं पता. रांची के सांसद संजय सेठ ने कहा कि हां उस जीबी की बैठक में मंत्री ने गाड़ी की मांग की थी और एजेंडे में था. सांसद महोदय उस बैठक में अन्य अनियमितता को लेकर बैठक का विरोध कर निकल गए थे.
बहरहाल, इस पूरे प्रकरण में सीएमओ ने कोई कार्रवाई नहीं की. ये किसी ने नहीं पूछा कि आखिर मंत्री को रिम्स के पैसे से गाड़ी खरीदने के एजेंडे में कैसे और किसने शामिल किया? कुछ ऐसा ही नजारा अबतक सरयू राय के मामले में देखने-समझने को मिला है. विधायक के बार-बार पत्र लिखने के बावजूद सीएमओ ने अभी तक कोई एक्शन नहीं लिया है. इस पूरे प्रकरण में सरयू राय को अभी तक कोई ठोस जवाब देने में विफल रहे बन्ना गुप्ता अब अदालत में निबटने की तैयारी में हैं. सरयू राय ने भी उन्हें चुनौती दे डाली है. अब देखना है कि इस मामले में सीएम हेमंत सोरेन कबतक हस्तक्षेप करते हैं….!
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