न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया
गुमला: चार पीढ़ियों से मांदर बनाने की कला को संभाल रहे गुमला के जरजट्टा गांव के कारीगरों के लिए 28 सितंबर 2026 एक खास दिन बन गया। रायडीह प्रखंड के जरजट्टा में पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाने वाले मांदर को भारत सरकार से भौगोलिक संकेतक यानी जीआई पंजीकरण मिलने के बाद गांव में सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस उपलब्धि को कारीगरों और ग्रामीणों ने अपनी पारंपरिक कला की बड़ी पहचान के तौर पर मनाया।
जरजट्टा ग्राम पंचायत में आयोजित कार्यक्रम में गुमला उपायुक्त दिलेश्वर महतो और उप विकास आयुक्त अनिमेश रंजन मौजूद रहे। दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। मौके पर रायडीह के प्रखंड विकास पदाधिकारी, डीपीएम जेएसएलपीएस शैलेंद्र जारीका, मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड के जिला समन्वयक अघनु उरांव, उद्यमी समन्वयक सूरज कुमार, प्रखंड समन्वयक हेराकृष्ण साहू, शशि भूषण साहू, जरजट्टा पंचायत की मुखिया मार्था एक्का समेत संबंधित अधिकारी और कर्मी उपस्थित रहे।
कारीगरों को मिला सम्मान, चार पीढ़ियों की मेहनत की हुई चर्चा
समारोह में मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के पदाधिकारियों को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया। इसके साथ ही मांदर बनाने वाले कारीगरों को भी सम्मानित किया गया। गुलाब घांसी, बस्तिया घांसी, बिरसा घांसी, फूलचंद घांसी, गुरुचरण घांसी, झलीत घांसी, चुनू घांसी, लखन घांसी, रंजीत घांसी, पोण्डे घांसी, नंदलाल घांसी, कोयल घांसी, बाबूचंद घांसी, बलदेव राम नायक, शन्तु घांसी, प्रदीप घांसी, मोतीराम घांसी, कोरवा राम/प्रसाद राम, प्रमोद राम और अर्जुन राम नायक समेत अन्य कारीगरों को सम्मान मिला।
जरजट्टा में मांदर बनाना कई परिवारों के लिए पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है। गांव के करीब 25 कारीगर परिवार मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से जुड़े हैं। इनके लिए जीआई पंजीकरण केवल किसी उत्पाद को मिली पहचान नहीं, बल्कि उनकी पारंपरिक तकनीक और वर्षों के हुनर को मिली औपचारिक मान्यता भी है।
उपायुक्त बोले- अब जरजट्टा की पहचान मांदर से भी होगी
उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने कहा कि छोटानागपुर-झारखंड का पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर यहां की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शादी-विवाह, पूजा-पर्व, पारंपरिक नृत्य और सामाजिक आयोजनों में इसकी थाप लंबे समय से सुनाई देती रही है।
उन्होंने कहा कि मांदर को जीआई पंजीकरण मिलना सिर्फ गुमला नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के लिए गौरव की बात है। यह उपलब्धि कारीगरों के वर्षों के परिश्रम, कौशल और पारंपरिक ज्ञान की पहचान है। उन्होंने कहा कि अब देश-दुनिया में मांदर की चर्चा होगी तो जरजट्टा गांव और यहां के कारीगरों का नाम भी सामने आएगा।
उपायुक्त ने यह भी कहा कि जिला प्रशासन आगे मांदर के उत्पादन, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और बाजार तक पहुंच को मजबूत करने की दिशा में काम करेगा, ताकि इसका लाभ सीधे कारीगरों की आय और आजीविका तक पहुंच सके।
2020 के आसपास शुरू हुआ था जीआई टैग का प्रयास
मांदर को जीआई पहचान दिलाने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड के उद्यमी समन्वयक सूरज कुमार ने बताया कि इसके लिए प्रयास वर्ष 2020 के आसपास शुरू हुआ था। रायडीह फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन के माध्यम से मांदर बनाने वाले कारीगरों को संगठित करने और उनकी कला को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में काम किया गया।
वहीं, उप विकास आयुक्त अनिमेश रंजन ने कहा कि जीआई पंजीकरण का असर आने वाले समय में अधिक स्पष्ट होगा। इससे मांदर की पहचान बढ़ने के साथ मांग में वृद्धि, नए कारीगरों के जुड़ने और उनकी आय बढ़ने की संभावनाएं बनेंगी। उन्होंने कहा कि प्रशासन मांदर को बड़े बाजारों तक पहुंचाने के लिए आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा।
कई वर्षों के प्रयास के बाद मिली मंजिल
कार्यक्रम में मांदर को जीआई पंजीकरण मिलने तक की यात्रा और उससे जुड़े प्रयासों की जानकारी भी साझा की गई। एफपीओ के निदेशक घनश्याम उरांव ने इस प्रक्रिया के दौरान किए गए प्रयासों और चुनौतियों के बारे में बताया।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड की ओर से इसके लिए आवेदन किया गया था। तत्कालीन उपायुक्त सुशांत गौरव ने कारीगरों के बीच पहुंचकर मांदर निर्माण की पारंपरिक प्रक्रिया और उनकी कला को समझने के साथ इसके दस्तावेजीकरण की दिशा में पहल की थी। इसके बाद तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी के कार्यकाल में तकनीकी, दस्तावेजी और प्रक्रियात्मक कार्यों को आगे बढ़ाया गया। आखिरकार 28 सितंबर 2026 को जरजट्टा के पारंपरिक मांदर को जीआई पंजीकरण प्राप्त हुआ।
जीआई पंजीकरण के बाद अब जरजट्टा में तैयार होने वाले मांदर को उसकी भौगोलिक पहचान के साथ जोड़ा गया है। इससे पारंपरिक कला के संरक्षण के साथ इसके ब्रांडिंग और बाजार विस्तार की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। चार पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखने वाले कारीगरों के लिए यह उपलब्धि अपनी विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में एक नई पहचान लेकर आई है।