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Thursday, July 2, 2026
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समस्त गुमला जिला में वट सावित्री पूजा पर उमड़ा आस्था का सैलाब महिलाओं ने बरगद की पूजा कर पति की दीर्घायु की मांगी दुआ

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समस्त गुमला जिला में वट सावित्री पूजा के अवसर पर शुक्रवार को जिला मुख्यालय सहित पूरे जिले के विभिन्न मंदिरों और वट (बरगद पेड़ों ) के समक्ष सोलह सिंगार किए हुए विवाहित महिलाओं द्वारा बट सावित्री पूजा कर अपने सुहाग के लिए मांगी लंबी उम्र, विवाहित महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी । सुहागिन महिलाओं ने 16 श्रृंगार कर वट वृक्ष की पूजा-अर्चना की और पति की लंबी आयु, की प्रार्थना करते हुए अपने अपने पतियों की मांगी लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य व घर परिवार के लिए सुख-समृद्धि की कामना की। सुबह से ही महिलाएं लाल-पीली साड़ियों में सज-धज कर पूजा की थाली लेकर वट वृक्ष के पास पहुंचने लगीं। महिलाओं ने बट वृक्ष( बरगद के पेड़ ) की परिक्रमा कर कच्चा लाल सूत लपेटा, मूली धागा, अक्षत, रोली, केला, सेव, नारंगी अंगूर आदि फल-फूल चढ़ाए और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी। पूरे दिन मंदिरों और सिंगर दुकानों, पूजा सामग्री दुकानों, मिठाई की दुकानों में भीड़ उम्र पड़ी थी, सभी चौक-चौराहों पर मेले जैसा माहौल देखा गया। विभिन्न मंदिरों के पंडित और आचार्य ने वट सावित्री पूजा ( कथा ) पर विशेष महत्व और प्रकाश डालते हुए बताया कि यह पर्व पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सावित्री ने अपने तप और पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। तभी से सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष को साक्षी मानकर पूजा करती हैं। वट वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक है, इसलिए इसकी पूजा से पति को लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है।

महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर पूरे विधि-विधान से पूजा संपन्न की। शाम को कथा श्रवण के बाद फलाहार कर व्रत का पारण किया गया। उक्त त्योहार को लेकर बाजारों में भी रौनक दिखी। पूजा सामग्री, चूड़ी, बिंदी और फलों की दुकानों पर खूब खरीदारी हुई।

राम भक्तों के लिए

आयोजित अंचल दिवस में उपायुक्त पहुंचे, जमीन संबंधी मामलों का ऑन-द-स्पॉट समाधान

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला जिला अंतर्गत स्थित घाघरा प्रखंड में शनिवार को आयोजित अंचल दिवस कार्यक्रम में उपायुक्त दिलेश्वर महत्तो शामिल हुए। इस दौरान अपर समाहर्ता शशिंद्र कुमार बड़ाइक, अनुमंडल पदाधिकारी (सदर) राजीव नीरज, डीसीएलआर गुमला राजीव कुमार, अंचल अधिकारी घाघरा, प्रखंड विकास पदाधिकारी घाघरा सहित विभिन्न विभागों के पदाधिकारी एवं कर्मी उपस्थित रहे।

अंचल दिवस के अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे, जिनमें अधिकांश मामले जमीन से संबंधित थे। कार्यक्रम के दौरान राजस्व एवं भूमि से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए कई मामलों का मौके पर ही निष्पादन किया गया, वहीं शेष जटिल मामलों के त्वरित समाधान के लिए संबंधित पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।

ग्रामीणों ने भूमि मापी, दाखिल-खारिज, रसीद निर्गमन एवं सीमांकन जैसी समस्याएं प्रमुख रूप से रखीं। उपायुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि राजस्व से जुड़े मामलों का निष्पादन पारदर्शी एवं समयबद्ध तरीके से सुनिश्चित किया जाए, ताकि आम लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो।

कार्यक्रम के दौरान उपायुक्त ने आमजन से सीधे संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं और भरोसा दिलाया कि जिला प्रशासन लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए पूरी तरह संवेदनशील एवं प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि अंचल दिवस जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य प्रशासन और जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित करना है, जिससे समस्याओं का त्वरित एवं प्रभावी समाधान संभव हो सके।

इस अवसर पर उपायुक्त दिलेश्वर महत्तो ने कहा कि “अंचल दिवस के माध्यम से हम लोगों तक प्रशासन की पहुंच को और मजबूत बना रहे हैं। जमीन से जुड़े मामले आम लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए इनका समय पर समाधान हमारी प्राथमिकता है। आज कई मामलों का मौके पर ही निष्पादन किया गया है, और शेष मामलों को भी शीघ्रता से सुलझाने का निर्देश दिया गया है। हमारा प्रयास है कि लोगों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें और उन्हें एक ही स्थान पर समाधान मिल सके।”

उन्होंने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि जनहित से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता के साथ कार्य करते हुए निर्धारित समय सीमा के भीतर निष्पादन सुनिश्चित करें।

कार्यक्रम के दौरान प्रशासन द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं की जानकारी भी ग्रामीणों को दी गई तथा उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया गया।

राम भक्तों के लिए

गुमला में विद्यार्थियों के लिए समर हॉलीडे होमवर्क असाइनमेंट तैयार करने की पहल

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला झारखंड शिक्षा परियोजना, द्वारा कक्षा 9 वीं से 12 वीं तक के विद्यार्थियों के लिए ग्रीष्मकालीन अवकाश अवधि में समर हॉलिडे असाइनमेंट तैयार कर सभी विद्यालयों को उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया है।

शैक्षणिक सत्र 2026-27 में विद्यार्थियों की शैक्षणिक गुणवत्ता में सतत सुधार, स्व-अध्ययन की आदत विकसित करने तथा ग्रीष्मावकाश अवधि का शैक्षणिक रूप से उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह पहल की गई है। इसके माध्यम से ग्रीष्मकालीन अवकाश में विद्यार्थियों की पढ़ाई में निरंतरता बनी रहेगी तथा कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त अभ्यास का अवसर मिलेगा।

इस संबंध में कविता खलखो जिला शिक्षा पदाधिकारी-सह-जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, गुमला द्वारा जिला स्तरीय शैक्षणिक कोर टीम के सभी विषय विशेषज्ञ शिक्षकों को निर्देश जारी किया गया है।

निर्देश में कहा गया है कि तैयार किए जाने वाले असाइनमेंट में वस्तुनिष्ठ, लघु उत्तरीय, दीर्घ उत्तरीय एवं गतिविधि आधारित प्रश्नों को शामिल किया जाएगा। साथ ही सभी सामग्री को बोर्ड परीक्षा उन्मुख, ज्ञानवर्धक एवं अभ्यास आधारित बनाने पर बल दिया गया है, जिससे विद्यार्थियों में लेखन कौशल, तार्किक क्षमता एवं अवधारणात्मक समझ का विकास हो सके।

इस कार्य हेतु जिला स्तर पर एक टास्क फोर्स समिति का गठन किया गया है, जिसमें विभिन्न विद्यालयों के अनुभवी शिक्षकों को शामिल किया गया है। सभी विषय विशेषज्ञ शिक्षकों को 18 मई 2026 तक विषयवार समर हॉलिडे होमवर्क असाइनमेंट तैयार कर विद्यालयों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।

जिला शिक्षा विभाग ने सभी माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को भी निर्देशित किया है कि ग्रीष्मावकाश प्रारंभ होने से पूर्व सभी विद्यार्थियों को विषयवार असाइनमेंट उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें।

राम भक्तों के लिए

मकान जनगणना कार्य में सहयोग करें : बीडीओ महादेव कुमार महतो

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न्यूज – कहकशां फारुकी

गोमिया। शनिवार को गोमिया जनगणना चार्ज अधिकारी सह प्रखंड विकास पदाधिकारी महादेव कुमार महतो ने जनगणना 2026 के तहत चल रहे मकान सूचीकरण एवं मकान जनगणना कार्य को लेकर पंचायत प्रतिनिधियों एवं आम जनता से सहयोग की अपील की।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार द्वारा संचालित यह महत्वपूर्ण जनगणना कार्य 10 मई 2026 से 14 जून 2026 तक चलाया जाएगा। पूरे प्रखंड क्षेत्र में कुल 410 प्रगणना ब्लॉक बनाए गए हैं, जिनमें 385 प्रगणकों द्वारा मकान जनगणना का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है। इसके सफल संचालन के लिए 18 सुपरवाइजरों को प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है।
बीडीओ महादेव कुमार महतो ने कहा कि जनगणना देश के विकास और योजनाओं के निर्माण का आधार होती है। इसलिए सभी जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे जनगणना कर्मियों को सही एवं आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराएं तथा अन्य लोगों को भी जागरूक करें।
उन्होंने बताया कि जनगणना के दौरान मकान में कमरों की संख्या, परिवार के सदस्यों की जानकारी, शौचालय, स्नानघर, पेयजल, बिजली सहित अन्य मूलभूत सुविधाओं से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी। इसके अलावा घर में उपलब्ध साइकिल, मोटरसाइकिल, कार समेत अन्य वाहनों की भी जानकारी ली जाएगी। कुल 34 प्रकार की सूचनाएं इस प्रक्रिया में संकलित की जाएंगी।
उन्होंने कहा कि इस बार मोबाइल नंबर देना अनिवार्य किया गया है। प्रत्येक परिवार को अपने घर के उपयोग में आने वाले मोबाइल नंबर की जानकारी उपलब्ध करानी होगी।
अंत में उन्होंने आम लोगों से अपील करते हुए कहा कि जब जनगणना कर्मी आपके घर पहुंचें तो उन्हें सही जानकारी देकर सहयोग करें, ताकि भारत सरकार के इस महत्वपूर्ण कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके।

राम भक्तों के लिए

18 मई 1983 को बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के द्वारा गुमला जिले का विधिवत उद्घाटन किया गया था, मुख्य समारोह परमवीर अल्बर्ट एक्का स्टेडियम गुमला संपन्न हुआ था

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गुमला जिले के प्रथम उपयुक्त द्वारका प्रसाद सिन्हा से इंटरव्यू करते हुए ब्यूरो चीफ गणपत लाल चौरसिया
गुमला जिले के प्रथम उपयुक्त द्वारका प्रसाद सिन्हा से इंटरव्यू करते हुए ब्यूरो चीफ गणपत लाल चौरसिया

न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला जिले के प्रथम उपयुक्त द्वारका प्रसाद सिन्हा से इंटरव्यू करते हुए ब्यूरो चीफ गणपत लाल चौरसिया

गुमला : – गुमला जिला हर साल 18 मई को अपना स्थापना दिवस मनाता है गुमला को 18 मई 1983 को पुराने रांची जिले से अलग करके एक स्वतंत्र जिले के रूप में बनाया गया था 1843 में इसे बिशनपुर प्रांत के अधीन लाया गया, जिसका नाम बाद में रांची रखा गया। वास्तव में रांची जिले का अस्तित्व 1899 में आया। 1902 में गुमला रांची जिले का उपमंडल बन गया। 18 मई 1983 को गुमला जिले का गठन हुआ। राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित है जो कि प्राकृतिक सुंदरता घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ है ऐसा माना जाता है कि इसका नाम ‘गौ’ (गाय) और ‘मेला’ से मिलकर बना है क्योंकि यहाँ मंगलवार को मवेशियों का मेला लगता था गुमला की शुरुआत एक छोटे से गाँव के रूप में हुई थी । यहाँ हर साल एक सप्ताह तक चलने वाला गौ मेला लगता था, जिसमें दैनिक उपयोग की वस्तुएँ (बर्तन, आभूषण , अनाज और कभी-कभी मवेशी ) बेची या अदला-बदली की जाती थीं। चूंकि ये वस्तुएँ केवल मेले में ही उपलब्ध होती थीं, इसलिए लोग साल भर अपनी ज़रूरतों की सूची बनाते रहते थे। गाँव की आबादी बढ़ती गई और यह “गुमला” ( गौ मेला का ही एक रूप ) नामक गाँव बन गया।मध्ययुग के दौरान, छोटानागपुर क्षेत्र पर नागवंशी वंश के राजाओं का शासन था और गुमला क्षेत्र पर बराइक देवनंदन सिंह का शासन था।भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान गुमला लोहरदगा जिले में स्थित था और 1800 में यहाँ ब्रिटिश राज के विरुद्ध विद्रोह हुआ। 1807 में, बरवे (गुमला के पश्चिम में स्थित) के ओरांव जनजाति ने श्रीनगर के अपने जमींदार की हत्या कर दी , और यह विद्रोह गुमला में फैल गया। 1818 में, बख्तर सैय ने कथित तौर पर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1843 में, गुमला बिशनपुर प्रांत का हिस्सा बन गया। 1899 में समाप्त हुए इस प्रांत का नाम बाद में रांची रखा गया; 1902 में, गुमला रांची जिले का एक उपखंड बन गया ।श्री रामनगर में काली मंदिर का निर्माण कराने वाले गंगा महाराज 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय थे ; भारतीय स्वतंत्रता में उनके योगदान के लिए उन्हें सरकार से पेंशन प्राप्त हुई।18 मई 1983 को बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा द्वारा गुमला जिले की स्थापना की गई थी । द्वारिका नाथ सिन्हा को नए जिले का पहला उपायुक्त नियुक्त किया गया था।
[16/05, 4:22 pm] Ganpat Lal Chourasia: जिले का संक्षिप्त इतिहास
गुमला जिला बिहार सरकार अधिसूचना सं 7 /T -1-204 / 83 दिनांक 16.5.1 9 83 के द्वारा राँची जिले को विभाजित करके बना है । इस जिले का कुल क्षेत्रफल 5347.25 वर्ग० कि०मी० है। दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के 5 जिलों में से एक है जबकि अन्य चार जिले लोहरदगा, राँची, खूँटी एवं सिमडेगा हैं। यह जिला 22.35 डिग्री 23.33 डिग्री उत्तर अक्षांश और 84.40 डिग्री 85.1 डिग्री पूर्व रेखांश के बीच स्थित है। गुमला जिले में 3-अनुमण्डल, 12-सामुदायिक विकास खण्ड और 3-जनगणना कस्बे (गुमला, घाघरा और टोटो) शामिल हैं। गुमला जिले का मुख्य शहर है। यह जिले का मुख्यालय एवं अनुमण्डल है गुमला-सदर का । 12-सामुदायिक विकास खण्ड जिसमें शामिल है गुमला सदर, घाघरा, बिशुनपुर, चैनपुर, डुमरी, रायडीह, सिसई, भरनो, कामडारा, बसिया, पालकोट और अल्बर्ट एक्का (जारी) । यह जनजातीय बहुल जिला है। गुमला जिला इन राज्यों एवं जिलों से घिरा हुआ है जिनमें उत्तर में लातेहार, पूर्व में लोहरदगा, दक्षिण में रांची, खूँटी एवं सिमडेगा और पश्चिम में छत्तीसगढ़ है। गुमला जिले से संबंधित अनेक भाषायें एवं किवदंतिया हैं। इसमें सबसे संबंधित नाम ” गुमला ” जो मुंडारी भाषा से आया है। यहाँ के स्थानीय जनजातियों की आजीविका मुख्यतः चावल प्रसंस्करण कार्य (धन-कुटना), दूसरा ‘गौ-मेला’ मवेशी मेला है। मवेशी मेला हर मंगलवार को गुमला शहर में आयोजित किया जाता था। ग्रामीण इलाकों में, नागपुरी और सादरी लोग अबतक इसे ‘गोमिला’ कहते हैं।

आरंभिक इतिहास
गुमला जिला, बिहार सरकार की अधिसूचना दिनांक 16.5.1983 के द्वारा रांची जिले से बनाया गया था | स्वाभाविक रूप से, इसका रिकॉर्ड इतिहास अधिसूचना से पहले रांची जिले के भीतर निहित है। 1881-82 में कोल की बढ़ती वजह से दक्षिण-पश्चिम गैर-विनियमन सीमा का निर्माण किया गया जिसके बाद लोहरदगा जिला अस्तित्व में आया, जिसमें वर्तमान में गुमला जिला था- 1899 में जिला का नाम लोहरदगा से रांची तक बदल दिया गया था। प्राचीन काल में पड़ोसी पश्चिम मार्ग के साथ जिले का क्षेत्र मुंडा और उरावं के निर्विवाद कब्जे में था। आर्यों के समय क्षेत्र को झारखंड या वन क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। यह हिंदू प्रभाव से परे था, संभवतः, यह क्षेत्र अशोक (273-232 बी.सी.) के शासनकाल के दौरान मगधान साम्राज्य के अधीन आया था। मौर्य के पतन के साथ ही कलिंग के राजा खारवले ने झारखंड के माध्यम से एक सेना का नेतृत्व किया और राजगढ़ और पाटलीपुत्र को बर्बाद कर दिया। बाद में, समुद्र गुप्त (335-380 ईस्वी) ने अपने अभियान पर दक्कन के क्षेत्र में पारित किया होगा। माना जाता है कि चीनी यात्री इटसीग ने नालंदा और बोधगया की अपनी यात्रा के दौरान छोटानागपुर पठार के रास्ते यात्रा की। माना जाता है कि छोटानागपुर राज शाही गुप्त के पतन के बाद पांचवीं शताब्दी एडी में स्थापित किया गया था। फनिमुकुट पहले राजा चुने गए थे। ऐसा कहा जाता है कि वह एक नाग (सांप) की सुरक्षा के तहत एक टैंक में पाया गया था। इसलिए उनके द्वारा स्थापित वंश को नाग राजवंश नाम दिया गया था।

मुस्लिम काल
केवल अकबर ने इस क्षेत्र में मुस्लिम प्रभाव का विस्तार कर सकता था। आईने-ए-अकबर के अनुसार शाबरबाज खान द्वारा अकबर के बल द्वारा सहायक की स्थिति में कमी आई थी और बिहार के सुबेह में शामिल किया गया था। 1605 में अकबर की मौत के बाद क्षेत्र को संभवतः आजादी मिली। 1616 में फतेह जंग ने चटानागपुर के 46 वें राजा दुर्जन साल पर कब्जा कर लिया। 1632 में, चटानागपुर को पटना में गवर्नर के रूप में 1,36,000 रुपये के वार्षिक भुगतान के खिलाफ जगिर के रूप में दिया गया था। लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं टिक सका। मुहम्मद शाह के समय (1719-1748) बिहार के राज्यपाल सर बुलंद खान ने चटानागपुर के राजा को हरा दिया। ऐसा माना जाता है कि जिला ने 1624 से लगभग शांति का आनंद लिया जब 1772 में अंग्रेजों की उपस्थिति तक दुर्जन साल जारी किया गया था।

ब्रिटिश काल
सम्राट शाह आलम -2 ने 1765 में पूर्वी भारत कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी दी। चटानागपुर बिहार के भीतर शामिल किया गया था। दिसम्बर में 1771 में इंटर्नकिन झगड़े कप्तान कैमैक द्वारा सांकेतित पलामू पर हमला किया। कप्तान कैमैक चोपणगपुर के पहले नागरिक प्रशासक चैपलैन द्वारा सफल हुए। शुरुआत के खिलाफ कृषि असंतोष के साथ-साथ ठेकेदार या मध्यस्थों द्वारा किराए में वृद्धि के साथ सरदार आंदोलन का कारण बन गया। आंदोलन का नेतृत्व सरदार ने किया था। 1887 तक आंदोलन तेज हो गया और कई मुंडा और ओरेन किसानों ने मकान मालिकों को किराए का भुगतान करने से इनकार कर दिया। बिरसा मुंडा की उपस्थिति के साथ, भगवान का अभिव्यक्ति और अवतार माना जाता था, आंदोलन 18 9 5 में इसकी ऊंचाई पर था। उन्होंने घोषणा की कि भूमि उन लोगों से संबंधित है जिन्होंने इसे वनों से पुनः प्राप्त किया था और इस प्रकार किराए पर भुगतान करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। बिरसा मुंडा के किसानों और गुमला के लोगों पर भी बहुत प्रभाव पड़ा। बिशुनपुर पुलिस थाने के एक स्थानीय नेता यात्रा ओरायन ने 1914 में टाना भगत आंदोलन के रूप में जाना जाने वाला एक धार्मिक आंदोलन का नेतृत्व किया। जात्रा के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन जल्द ही पलामू और हजारीबाग जिलों में फैल गया।

राम भक्तों के लिए

गोमिया प्रखंड में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई वट सावित्री पूजा

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न्यूज – कहकशां फारुकी

गोमिया। गोमिया प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में शनिवार को सुहागिन महिलाओं ने वट सावित्री पूजा पूरे श्रद्धा, उल्लास और उत्साह के साथ मनाई। गवर्नमेंट कॉलोनी, आईईएल गोमिया काली मंदिर, हजारी, होसिर, साड़म, ललपनिया सहित प्रखंड के कई क्षेत्रों में महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार वट वृक्ष की पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी आयु एवं परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
सुबह से ही सुहागिन महिलाएं नए वस्त्र एवं श्रृंगार कर पूजा स्थलों पर पहुंचीं। महिलाओं ने वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधकर पूजा की तथा व्रत कथा का श्रवण किया। इस दौरान पूजा स्थलों पर भक्ति गीतों और मंगल ध्वनि से वातावरण भक्तिमय बना रहा।
गवर्नमेंट कॉलोनी एवं आईईएल गोमिया काली मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में महिलाओं की भीड़ उमड़ी। वहीं हजारी, होसिर, साड़म और ललपनिया क्षेत्रों में भी महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा कर अखंड सौभाग्य की कामना की। पूजा के बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं दीं।
महिलाओं ने बताया कि वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति और दांपत्य जीवन की अटूट आस्था का प्रतीक है। इस अवसर पर पूरे प्रखंड में धार्मिक और उत्सवी माहौल देखने को मिला।

राम भक्तों के लिए

हिंडाल्को के खनन क्षेत्र का संयुक्त निरीक्षण, नियमों के अनुपालन एवं सुरक्षा पर जोर

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला उपायुक्त के निर्देशानुसार अनुमंडल पदाधिकारी, गुमला की अध्यक्षता में जिला खनन पदाधिकारी, अंचलाधिकारी बिशुनपुर, थाना प्रभारी गुरदारी एवं खनन निरीक्षक द्वारा संयुक्त रूप से हिंडाल्को कंपनी के मौजा गुरदारी स्थित धारित खनन पट्टा क्षेत्र का औचक निरीक्षण किया गया।

निरीक्षण के दौरान हिंडाल्को के महाप्रबंधक, खान प्रबंधक एवं अन्य संबंधित पदाधिकारी उपस्थित थे। टीम द्वारा खनन क्षेत्रों का विस्तृत निरीक्षण करते हुए खनन पद्धति की जानकारी प्राप्त की गई तथा अनुमोदित खनन योजना, पर्यावरणीय स्वीकृति एवं विस्फोटक कार्यों को नियमानुसार संचालित करने के निर्देश दिए गए। साथ ही, कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर विशेष बल दिया गया।

निरीक्षण के क्रम में अन्य बिंदुओं की भी जांच की गई तथा खनन कार्य पूर्ण हो चुके क्षेत्रों में Land Reclamation/Backfilling सुनिश्चित करने हेतु निर्देशित किया गया।

इस दौरान रैयत सत्य प्रकाश हुरहुरिया द्वारा उपायुक्त को दिए गए आवेदन के आलोक में उनकी भूमि पर सहमति के बिना खनन कार्य किए जाने की शिकायत की भी जांच की गई। हालांकि, आवेदक की अनुपस्थिति के कारण अनुमंडल पदाधिकारी द्वारा अंचलाधिकारी, बिशुनपुर को निर्देशित किया गया कि आवेदक, कंपनी प्रतिनिधि, मुखिया एवं ग्राम प्रधान सहित अन्य संबंधित पक्षों की उपस्थिति में तिथि निर्धारित कर भूमि का मापन सुनिश्चित किया जाए।

निरीक्षण के दौरान खनिज से लदे बॉक्साइट ट्रकों की भी जांच की गई, जिसमें खनिज परिवहन चालान की पुष्टि की गई।

राम भक्तों के लिए

तीर्थकरों की तपोभूमि मधुबन में भाजपा का दो दिवसीय प्रशिक्षण अभियान

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कैडरों से बाबूलाल मरांडी का आह्वान…सभी कार्यकर्ता संगठन में सक्रियता से जुड़ें

गिरिडीह (कमलनयन): भारतीय जनता पार्टी का दो दिवसीय प्रशिक्षण अभियान शनिवार से 22 तीर्थकरों की तपोभूमि श्री सम्मेद शिखर गिरिडीह के मधुबन में प्रारम्भ हुआ। एकात्म मानववाद के प्रणेता एवं उत्कृष्ट संगठनकर्ता भारतीय जनसंघ के फाउण्डर पंडित दीनदयाल उपाध्याप के सांगठनिक विचारों को कार्यकर्ताओं के बीच साझा करने के मकसद से शुरू हुए प्रशिक्षण अभियान में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी समेत जिले भर के करीब सवा सौ सक्रिय केडर शामिल हुए।

प्रशिक्षण अभियान की शुरुआत पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तस्वीरों पर माल्यार्पण कर किया गया। इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने झारखंड में सत्तारूढ़ हेमंत सोरेन सरकार की जनविरोधी नीति पर प्रहार कर निशाना साधा ही, साथ ही कहा कि गिरिडीह जिले में अब संगठन को और मजबूत करने की जरूरत है। केडरों का आहवान किया कि एक-एक कार्यकर्ता अब संगठन को लेकर सक्रिय बने।

बाबूलाल मरांडी ने इस दौरान बंगाल में भाजपा को मिली जीत का उदाहरण देते हुए कहा कि बंगाल में इस बार भाजपा के साथ कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर चुनाव लड़ा। कहा कि अंहिसा के संदेशवाहक भगवान पार्श्वनाथ की पवित्र धरा मधुबन से हर बार भाजपा को एक ऊर्जा मिलती रही है।

उन्होंने कहा कि यहां की ऊर्जा झारखंड भाजपा को मजबूत करती रही है। एक समय इसी मधुबन में गोलियां चलती थी। कहा कि मधुबन की पावन धरा जैन समाज के सबसे बड़े तीर्थकरों की भूमि के साथ आदिवासियों के सर्वोच्च देव स्थल मरांग बुरु के लिए प्रसिद्ध है। कार्यक्रम का शुभारंभ जिला अध्यक्ष रंजीत राय के स्वागत भाषण से हुआ।

प्रशिक्षण वर्ग की विस्तृत जानकारी दी गई

इस अवसर पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण वर्ग की विस्तृत जानकारी दी तथा उनसे संवाद स्थापित किया।

पहले दिन प्रशिक्षण वर्ग में जिला प्रशिक्षण प्रभारी रमेश सिंह, प्रदेश प्रशिक्षण टोली के सदस्य के रूप में के.के. गुप्ता, अभयकांत प्रसाद, आरती सिंह, गणेश मिश्रा एवं शशांक राज ने विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन दिया।

प्रशिक्षण सत्र का समापन 17 मई को होगा

प्रशिक्षण सत्र में पार्टी का इतिहास एवं विकास, वैचारिक अधिष्ठान, कार्यपद्धति, विचार परिवार सहित संगठनात्मक विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई। बताया गया कि कार्यक्रम का समापन 17 मई को होगा, जिसमें समापन के समय प्रदेश संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह शामिल रहेंगे।

प्रशिक्षण वर्ग में ये लोग थे उपस्थित

प्रशिक्षण वर्ग में मुख्य रूप से दिलीप वर्मा, शालिनी वैश्यकार, दिनेश यादव, यदुनंदन पाठक, महादेव दुबे, मुनिया देवी, दिनेश यादव, विनय सिंह, सुरेश साव, प्रदीप साहू, चुन्नू कांत, संदीप डांगाईच, सिकंदर हेम्ब्रम, श्याम प्रसाद, मनोज सिंह, नवीन सिन्हा, मुकेश जालान, सुरेश मंडल, संगीता सेठ, अरुण हाज़रा, देवराज, संजीव कुमार, प्रकाश यादव, मनोज पांडेय सहित सभी मंडल अध्यक्ष एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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बंगाल की सभी एसटी सीटों पर व असम की एक सीट छोड़ सभी सीटों पर भाजपा/एनडीए की जीत की आखिर वजह क्या है…?

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विनोद कुुुुमार

रांची : बंगाल की सभी एसटी सीटों पर और असम की एक सीट छोड़ सभी सीटों पर भाजपा या एनडीए की जीत की वजह क्या है. एक बड़ी संख्या यह मानती है कि एवीएम या कहिये चुनावी धांधली इसकी वजह है. कुछ ने आदिवासियों को नासमझ यानि अपना हित नहीं पहचानने वाला कहा, एकाध मित्र, खासकर सवर्ण मित्रों का कहना यह था कि भाजपा बेहतर शासन व विकास कर रही है और आदिवासी भी अपना विकास चाहते हैं, इसलिए भाजपा के पक्ष में वोट दिया.

ये सभी बातें आंशिक रूप से सही हो सकती हैं, लेकिन मूल वजह अभी भी उनके जवाबों से ओझल रहा. मेरा यह दावा कभी नहीं रहा है कि मेरी बातें पूर्णतः मुकम्मल हैं.

हां, मैं अपने अनुभव और समझ के अनुरुप अपनी धारणाएं गढ़ता हूं और आपके सामने रखता हूं. आजकल सरना-सनातन एक होने का नारा बहुत लग रहा है. लेकिन क्या अभी भी कोई आदिवासी नेता सामान्य सीट से चुनाव लड़ने का जोखम उठाने को तैयार है?

पूर्व में ऐसा नहीं हुआ हो, या आगे नहीं होगा, यह मैं नहीं कहता. इक्का दुक्का ऐसा हुआ होगा, लेकिन अपवादों से नियम नहीं बनता.

सामान्य सीट से किसी आदिवासी का खड़ा होना अभी भी असामान्य घटना ही होगी. और इसकी वजह? गैर आदिवासी उन्हें वोट नहीं देंगे. दोनों के बीच सदियों का सांस्कृतिक फासला रहा है. हितों का अंतर रहा है. इसलिए आदिवासी सामान्यतः एसटी सीटों से ही खड़े होते हैं.

लेकिन एसटी सीट पर भी अब आदिवासीयत की ही जीत हो, यह जरूरी नहीं. आरक्षण ने यह तो सुनिश्चित कर दिया है कि आदिवासी ही एसटी सीट से जीतेगा, लेकिन राष्ट्रीय पार्टियों से जीतने वाला आदिवासी, आदिवासीयत का पैरोकार हो, आदिवासी हितों का समर्थक हो, यह जरूरी नहीं.

आदिवासी नेता आदिवासी हितों की अनदेखी के लिए मजबूर क्यों?

भाजपा के टिकट पर जीतने वाला आदिवासी भी दलगत राजनीति की मजबूरियों की वजह से अपने दल की नीतियों के अनुरूप बात करने लगता है. इसलिए संसद और विधानसभाओं में बड़ी संख्या में आदिवासियों के होते हुए भी आदिवासी हितों के प्रतिकूल काम होते हैं.

आदिवासी समाज भी शुरुआती दौर में इस बात से खुश हो जाता था कि किसी भी दल का हो, यदि वह आदिवासी है तो उसका अपना हुआ. लेकिन धीरे-धीरे यह समझ विकसित हो रही है कि राष्ट्रपति आदिवासी होने के बावजूद हसदेव (छग) के जंगल कट सकते हैं, मणिपुर जल सकता है, लद्दाख को अलग राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल होना कितना मुश्किल है, बाबूलाल और चंपई आदिवासी होते हुए भी आदिवासियों के काम के नहीं. इसलिए आदिवासी राजनीति में समझदारी आयी है.

लेकिन आदिवासी इलाकों की सामाजिक संरचना तेजी से बदल रही है. और ऐसे में जहां भी मजबूत क्षेत्रीय आदिवासी पार्टी नहीं है, वहां आदिवासी वोट गैर आदिवासी राष्ट्रीय पार्टियां ही लूट रही हैं.

एक साजिश के तहत मध्य भारत में बसे आदिवासियों को टुकड़े-टुकड़े कर अलग-अलग राज्यों में मिला दिया गया है. झारखंड अलग राज्य का आंदोलन एक वृहद आदिवासी राज्य की मांग करता था जो 28 जिलों का था. लेकिन झारखंड बना बिहार को काट सिर्फ 18 जिलों का. वे दस जिलों की राजनीति बिखर गयी.

यह भी हुआ कि सदियों तक साथ रहने वाले आदिवासी और सदान पहले एकजुट थे. झारखंड का ही उदाहरण लें तो यहां के आदिवासी और मूलवासियों ने मिल कर एक झारखंडी संस्कृति का निर्माण किया था, जिसकी बदौलत जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी 36 विधानसभा सीटों पर सिर्फ अपने दम जीता करती थी.

झामुमो को यहां तक पहुंचने में दशकों लग गये और महागठबंधन का हिस्सा बनना पड़ा, तब जाकर वह पिछले चुनाव में 34 सीटें जीत पायी है. और एलायंस से बाहर हुई तो हो सकता है कि वह फिर पुराने 18-19 सीटों पर सिमट जाये.

अब जब सामाजिक संरचना बदल चुकी है, इसलिए एसटी सीट पर भी जरूरी नहीं कि कोई क्षेत्रीय पार्टी ही जीते. एसटी सीटों पर भी आदिवासियों का घनत्व एक समान नहीं. कुछ सीटों पर वे 50 फीसदी से भी अधिक हो सकते हैं, लेकिन औसतन मान कर चलें कि एसटी सीटों पर वे 50 फीसदी हैं.

यानि, बड़ी संख्या में गैर आदिवासी हैं जिसमें सदान के रूप में परिगणित पुराने मूलवासी भी हैं. तो हो यह रहा है कि कट्टर आदिवासी पार्टी का प्रत्याशी राष्ट्रीय पार्टियों के आदिवासी प्रत्याशी से हार जाता है. क्योंकि, उसे आदिवासी वोटरों का ही वोट मिलता है, लेकिन भाजपा और उसके एलायंस से खड़े आदिवासी प्रत्याशी को आदिवासी मतों का एक हिस्सा के साथ उस विधानसभा क्षेत्र के तमाम गैर आदिवासी वोट मिल जाते हैं और वह जीत जाता है.

यही दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर भी हो रहा है. चिराग पासवान अपनी पार्टी के बलबूते आरक्षित सीटों पर भी नहीं जीत सकते, इसलिए भाजपा के मोहताज हैं. लेकिन भाजपा की मदद से चुनाव जीतने वाले आदिवासी हों या दलित, मनुवाद का समर्थन करने लगते हैं, सरना-सनातन एक का नारा बुलंद करने लगते हैं. जल, जंगल, जमीन की लूट को विकास कहने लगते हैं.

(लेखक सांमाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ पत्रकार हैं)

नोट : कल हम विधानसभाओं के हालिया चुनाव में झामुमो की भूमिका पर बात करेंगे.

राम भक्तों के लिए

सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का अचूक उपाय हैं, वाहनों का – रफ्तार – जल्द से जल्द बंद की जाए, और रफ्तार की समय और सीमा निर्धारित की जाए

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस प्रशासन, स्थानीय परिवहन ( आरटीओ ) विभाग द्वारा समस्त वाहनों के- रफ्तार – पर अंकुश लगाने का अब समय ( वक्त ) आ गया है,,,,, नहीं तो होते रहेंगे,,,,, सड़क दुर्घटनाएं और मौत,,,,, दोषी कौन?????

उक्त रफ्तार के चक्कर में – जो – जाता है वह वापस नहीं आता – हैं – से – थे – तक का सफर करने वाले के उजड़ जाते हैं परिवार – दोषी कौन,,,,?????

गुमला : – सड़क दुर्घटनाओं में एक ही परिवार की आधा – आधा दर्जन दर्दनाक हृदय विदारक मोतों को देखते हुए, केंद्र सरकार,राज्य सरकार, स्थानीय जिलाप्रशासन पुलिस प्रशासन, संबंधित जिला परिवहन (आरटीओ ) विभाग को देश में लगातार बढ़ रही सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से जुर्माना वसूलना, हेलमेट पहनना, ट्रिपल रीडिंग( एक बाइक पर तीन सवारी बैठना ) ओवरलोडिंग, प्रेशर होरन और मल्टी टोन हॉर्न,और वाहन चलाते वक्त सीट बेल्ट बांधना आदि लाख उपाय करने के बावजूद भी दुर्घटनाओं का सिलसिला जारी है, इस पर केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस प्रशासन, जिला परिवहन (आरटीओ) विभाग को – ट्रैफिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार, अंतर राज्य अवैध नशीले पदार्थ के सौदागरों माफिया तस्करों द्वारा अपने गंतव्य स्थान पर जल्दी पहुंचने की चाहत में तेज रफ्तार से भागने वाले वाहनों सहित , विभिन्न समारोह और शादी समारोह लौटते वक्त लोग अपने वाहन चालक को नींद पूरा होने से पहले जबरदस्ती उठकर वाहन चलाने के लिए मजबूर करते हैं और वाहन चालकों के आंख झपकने और एकाएक वाहन चलाते वक्त नींद आ जाने से सड़क दुर्घटनाएं हो जाती है, और लोग अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं, जिसका जीता जागता उदाहरण यह है कि उत्तर प्रदेश जनपद बांदा में बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर गुरुवार सुबह सड़क दुर्घटना में स्कॉर्पियो में सवार एक ही परिवार के चार लोगों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि एक बच्ची गंभीर रूप से घायल हो गई हैँ, बताया जा रहा है कि उक्त स्कॉर्पियो के परख्रच्चे उड़ गए, प्रथमदृष्टिय यह पाया गया है कि स्कार्पियो चालक को एकाएक नींद आ जाने के कारण उक्त हादसा हुआ है ,ऐसी सड़क हादसों के फलस्वरुप लोग हैं – से – थें – तक का सफर तय कर लेते हैं और अपने तो चले जाते हैं परंतु अपने ( अपने माता-पिता – बहन – भाई – पत्नी बच्चों ) परिवार और परिजनों को जीवन भर का सदमा दे जाते हैँ,,,,, अतः केंद्र सरकार, राज्य सरकार, जिला प्रशासन, संबंधित जिला परिवहन (आरटीओ ) विभाग सहित संबंधित लोगों को विशेष कर सड़क में चलने वाले समस्त वाहनों पर तेज रफ्तार से वाहन चलाने वालों का तत्काल प्रभाव से लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया जारी होने चाहिए, और संबंधित वाहन मालिक पर कठोर से कठोर कानूनी कार्रवाई करते हुए जुर्माना लगाना चाहिए, तभी दुर्घटनाओं से निजात पाया जा सकता है, क्योंकि सड़क दुर्घटनाओं का मुख्य कारण हैं (नशे की हालत में ) तेज रफ्तार से वाहन चलाना और उक्त वाहन से अपना अनियंत्रित को देना और एक्सीडेंट करना, मुख्य कारण है जिस पर लगाम लगनी चाहिए, जल्दी पहुंचने की चाहत में लोगों के वाहनों का हमेशा – हमेशा के लिए रफ्तार रुक जाती है और उक्त दुर्घटनाग्रस्त वाहनों में सवार लोग का उक्त रफ्तार के कारण उनकी पहचान हैं – से – थे और उनके शरीर को – शव – के – रूप – में पहचाना जाता है,,,,, ऐसा क्यों,,,,,????? गलती किसकी,,,,,????? वह रफ्तार जो पहचान ही मिटा दे – समाप्त करते कैसी रफ्तार का क्या,,,,,?????

राम भक्तों के लिए
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