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Wednesday, July 1, 2026
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आदिवासी रैयतों के लिए मसीहा साबित हुए कुलकर्णी, मात्र डेढ़ साल में दशकों से लंबित 424 से अधिक वादों का निष्पादन कर रिकार्ड बनाया

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नारायण विश्वकर्मा

झारखंड में सही और निष्पक्ष ढंग से काम करनेवाले अधिकारियों का टोटा है, पर जो करे… उसे हटाना गुड गवर्नेंस की पहचान नहीं है. गैरआदिवासी अधिकारी अगर आदिवासी रैयतों के साथ न्याय करे तो, उन्हें सरकार की ओर से प्रोत्साहन मिलना चाहिए. आदिवासियों के दम पर यहां के शासक शासन करे… उसकी भलाई का दंभ भरे… पर उसके अनुकूल आचरण नहीं करे तो, ये आदिवासी बहुल राज्य के माथे पर एक कलंक है. राज्य सरकार द्वारा अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग एक सामान्य प्रक्रिया है. उसी के तहत दक्षिणी छोटानागपुर के आयुक्त नितिन मदन कुलकर्णी को अब राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपी गई है. लेकिन आयुक्त के रूप में नितिन मदन कुलकर्णी के पिछले डेढ़ साल के कार्यकाल को सैकड़ों आदिवासी रैयतों को जीवन भर याद रहेगा, जिन्हें वे अब अपना मसीहा मानने लगे हैं.

कुलकर्णी के तबादले से राजभवन नाराज  

हालांकि मिली जानकारी के अनुसार राज्यपाल के प्रधान सचिव नितिन मदन कुलकर्णी के तबादले से राजभवन नाराज है. उनके तबादले की खबर पर राजभवन ने प्रभारी अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार सिंह से जवाब-तलब किया है. प्रदेश के राज्यपाल रमेश बैस बगैर उनकी सलाह के प्रधान सचिव को बदले जाने पर हेमंत सरकार की कार्यशैली पर बेहद खफा बताए जाते हैं. राजभवन ने जानना चाहा है कि आखिर उन्हें बताए बिना राजभवन से जुड़े अधिकारी को एक झटके में कैसे हटा दिया गया? दरअसल, 9 जुलाई को झारखंड कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग की जारी अधिसूचना में गवर्नर रमेश बैस के प्रधान सचिव नितिन मदन कुलकर्णी को हटाकर उनकी जगह राहुल शर्मा को राज्यपाल का प्रधान सचिव बनाया गया है। वैसे खबर है कि देवघर में अनौपचारिक तौर पर राज्यपाल ने सीएम को इस बात से अवगत करा दिया है. समझा जाता है सीएम इस मामले पर जल्द विचार करेंगे. संभावना जतायी गई है कि एक-दो दिन में आयुक्त के तबादले पर भी सरकार फिर से विचार करेगी. अगर ऐसा हुआ तो, ये आदिवासी रैयतों के हक में होगा.

कमिश्नर ऑफिस बाहर से ही नहीं, अंदर से भी बदला

बता दें कि जनवरी 2021 में नितिन मदन कुलकर्णी स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव के पद से हटाकर दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के पद पर पदस्थापित किया गया था. उस समच चर्चा थी कि सरकार ने कुलकर्णी को आयुक्त के पद पर भेजकर उन्हें संटिंग में डाल दिया है. लेकिन करीब डेढ़ साल के कार्यकाल में आदिवासी समाज के साथ न्याय करनेवाले पहले आयुक्त के रूप में नितिन मदन कुलकर्णी का नाम झारखंड के इतिहास में दर्ज हो गया है. तेज-तर्रार अधिकारी के रूप में जाने-पहचाने जानेवाले आईएएस नितिन मदन कुलकर्णी को सरकार में शामिल स्वास्थ्य मंत्री ने भले हटवा दिया, पर काम करनेवाले अधिकारी कहीं भी रहें, वे काम को ही प्राथमिकता देंगे. यही कारण है कि आज का आयुक्त कार्यालय बाहर से ही नहीं, अंदर भी बदला हुआ नजर आता है. आयुक्त न्यायालय द्वारा निष्पादित पुनरीक्षण वादों की संख्या आज चौंकानेवाले हैं.

900 वादों में से अबतक 424 से अधिक वादों का निष्पादन

आदिवासियों की हड़पी गई जमीन को वापस दिलाने में और उसके साथ न्याय करने में आयुक्त न्यायालय ने महज डेढ़ साल में ऐतिहासिक रिकार्ड बनाया. यहां यह बताते चलें कि शिड्यूल एरिया रेगुलेशन 1969 के अधीन दायर वादों के पुनरीक्षण प्राधिकार आयुक्त होते हैं. इसके तहत आदिवासी रैयतों की जमीन से संबंधित मामलों में सीएनटी एक्ट-1908 के प्रावधानों का उल्लंघन कर जमीनों के लेन-देन के मामलों में उपायुक्त न्यायालय के आदेश को चुनौती दी जाती है. इसमें पीड़ित आदिवासी रैयत कई दशकों से केस के चक्कर में भाग-दौड़ करते रहते हैं. इसके बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिलता है. आयुक्त न्यायालय में 1980, 1990, 2000 और 2010 के दशक से लंबित करीब 900 वादों में से श्री कुलकर्णी ने अबतक 424 से अधिक वादों का निष्पादन कर आदिवासी रैयतों का उद्धार किया है. यह रिकार्ड उनके नाम दर्ज हो गया है. इस रिकार्ड को शायद ही कोई दूसरा कमिश्नर तोड़ पाए.

आदिवासी रैयतों में मायूसी, नहीं हटाने की गुहार

बताया गया कि आयुक्त कोर्ट में सारे वादों का निष्पादन आदिवासी रैयतों के पक्ष में किया गया है. इस मामले में दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल मिसाल कायम कर चुका है. निकट भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति असंभव प्रतीत होता है. आदिवासी रैयत श्री कुलकर्णी को अपना मसीहा मान रहे हैं. आदिवासी रैयतों से हजारों परिवाद पत्र प्राप्त हुए. इस पर तेज गति से काम हुआ और आदिवासी रैयतों को इंसाफ मिला. एक आदिवासी रैयत ने बताया कि कुलकर्णी सर तो हम आदिवासियों के लिए किसी मसीहा से कम साबित नहीं हुए. उन्हें जब बताया गया कि अब उनका यहां से ट्रांसफर हो गया है. तो उसने मायूसी से जवाब दिया कि अच्छा काम करनेवाले अधिकारियों के साथ सभी सरकारें ऐसा ही करती हैं. उसने बताया कि वह पिछले दस साल से चक्कर लगा रहा था. लेकिन कुलकर्णी जी ने दो सुनवाई में ही उनके पक्ष में फैसला सुना दिया. उनका दरबार सबके लिए खुला हुआ है. ऐसा ही अन्य आदिवासी रैयतों के साथ भी हुआ है. उन्होंने सरकार से निवेदन किया है कि कुलकर्णी जैसे अफसर की यहां अभी बहुत जरूरत है. इसलिए आदिवासियों के हित की खातिर उन्हें यहां से नहीं हटाया जाए.

आयुक्त को नहीं मिला जिला प्रशासन का सहयोग

जिला प्रशासन के एक कर्मचारी ने बताया कि निवर्तमान रांची उपायुक्त ने अगर सकारात्मक सहयोग किया होता तो, और भी सुखद परिणाम मिलते. उन्होंने बताया कि झारखंड बनने के बाद रांची जिले में आदिवासी जमीन की बड़े पैमाने पर सरकारी तंत्र की मिलीभगत से दलालों ने चांदी काटी. आयुक्त द्वारा सिल्ली अंचल में आदिवासी भूमि के अवैध हस्तांतरण एवं नामांतरण की जांच कराई गई और दोषी पदाधिकारियों पर ठोस कार्रवाई के लिए रांची के उपायुक्त को निर्देश दिया गया था. इसके फलस्वरूप कई अंचलाधिकारियों पर प्रपत्र क में आरोप गठित कर सरकार को भेजा गया था. वहीं आयुक्त के कड़े रुख के कारण ही रांची जिले के कई अंचल कार्यालयों में सुधार होने लगा था. पर अंचल कार्यालयों की कार्यशैली से आयुक्त कभी खुश नहीं हुए.

बेहतरीन कामकाज का सरकार ने अच्छा सिला नहीं दिया

श्री कुलकर्णी ने अपने छोटे से कार्यकाल में रांची जिले के निवर्तमान डीसी के कोर्ट से जुड़ी कई खामियों को उजागर किया और उसपर कार्रवाई के लिए सरकार को भी लिखा, पर सरकार ने अबतक इन मामलों में गंभीरता नहीं दिखाई है, न डीसी का कुछ बिगड़ा. उन्होंने हेहल अंचल के बजरा मौजा के भूमि नामांतरण और बुंडू अंचल के मौजा कोड़दा के गलत जमीन हस्तातंरण की जांच कर सरकार को प्रतिवेदन भेजा था. यह मामला काफी चर्चित हुआ. सरकार ने इसपर कोई ठोस कार्रवाई तो नहीं की, अलबत्ता उनका ट्रांसफर जरूर कर दिया. यह हेमंत सरकार की अदूरदर्शिता को दर्शाता है. आदिवासी हित में एक गैरआदिवासी अफसर के बेहतरीन कामकाज का सरकार ने अच्छा सिला नहीं दिया. इससे आदिवासियों के विकास के प्रति कथित रूप से समर्पित सरकार की नीयत का पता चलता है.    

राम भक्तों के लिए

रांची के अबतक के सबसे दागदार डीसी हटाए गए, सरकार की हो रही थी फजीहत

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नारायण विश्वकर्मा
आखिरकार चार्जशीटेड आईएएस अफसर को राजधानी रांची का डीसी पद छोड़ना पड़ा. नाम है छविरंजन. इनके नाम में छवि शब्द जुड़ा हुआ है. डीसी की छवि के रूप में तो इनकी छवि कभी अच्छी नहीं रही. कहते हैं दागदार दामन वाले अफसरों को कभी अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. पर ये दाग भी अच्छे होते हैं बशर्ते, गहरे दाग भी बेदाग की तरह दिखे. ऐसा हुआ तभी तो, एक दागदार आईएएस को राजधानी का डीसी बना दिया गया. दो साल के कार्यकाल में छविरंजन ने जो अपनी छवियां बिखेरी हैं, उसे रांची में लंबे समय तक याद किया जाएगा. आईएएस लॉबी में और सत्ता के गलियारे में छविरंजन की खराब छवि की खूब चर्चा रही. इनकी छवि के बारे में झारखंड हाईकोर्ट में लगातार हो रही फजीहत के बाद सरकार को इन्हें हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा.
डीसी को हटाना सरकार की मजबूरी थी
आईएएस छविरंजन को आगे अभी कई मामलों में हाईकोर्ट में सुनवाई का सामना करना पड़ेगा. लेकिन एक चार्जशीटेड आईएएस को रांची का डीसी किस मजूबरी के तहत बनाया गया, यह सवाल न कोई पूछेगा और न कभी इसका जवाब मिलनेवाला है. कोडरमा में डीसी के रूप में अपनी पहली पोस्टिंग में ही जिला परिषद की लकड़ी कटाई में ये आरोपी बन गए. इनके खिलाफ वहां के डीडीसी ने एफआईआर दर्ज करायी थी, तो इन्हें बहुत बुरा लगा था. उन्होंने डी़डीसी को ऐसा करने के लिए मना भी किया था. इस मामले में पिछले पांच साल से वे अभी भी हाईकोर्ट से बेल पर हैं. यह जानते हुए भी हेमंत सरकार ने इन्हें राजधानी की कमान थमा दी. इसी बीच हाईकोर्ट ने मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन के खदान लीज मामले में शपथ पत्र दाखिल करने पर छविरंजन पर दर्ज केस की पूरी जानकारी मांगी, तब लोगों को पता चला कि रांची के डीसी पर आपराधिक मामला दर्ज है. रांची डीसी को लेकर हाईकोर्ट में भारी फजीहत हुई थी.
कपिल सिब्बल कोर्ट में डीसी के बने हिमायती
दरअसल चार्जशीटेड डीसी के खिलाफ हाईकोर्ट के कड़े रुख के कारण हेमंत सरकार की किरकिरी हो रही थी. कांग्रेस की ओर से इन्हें हटान का प्रेशर था तो, उधर हाईकोर्टका छविरंजन पर कसता शिकंजा. इधर गत 1 जुलाई को सीएम हेमंत सोरेन के खनन लीज आवंटन मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार के वकील कपिल सिब्बल से कहा कि रांची डीसी को महात्मा गांधी साबित करने की कोशिश न करें. उनपर पहले से भ्रष्टाचार का मामला चल रहा है. हेमंत सोरेन के खान लीज मामले में रांची डीसी द्वारा शपथ पत्र दिए जाने पर कोर्ट ने कहा था कि जिस पर आपराधिक मामला चल रहा है, उसने अदालत में शपथ पत्र कैसे दाखिल कर दिया. तब रांची डीसी को पूरे झारखंड के खनन लीज संबंधी गोपनीय जानकारी होने पर भी कोर्ट ने सवाल खड़े किए थे. कोर्ट ने इस मामले में प्रार्थी शिवशंकर शर्मा को डीसी द्वारा फोन पर धमकी दिए जाने पर भी कड़ी नाराजगी जताई है. रांची डीसी की कॉल रिकार्डिंग कोर्ट में पेश किए जाने का हवाला देते हुए कोर्ट ने सरकारी वकील कपिल सिब्बल से कहा कि आप इस संगीन आरोप से इंकार नहीं कर सकते. उनके खिलाफ पहले से ही भ्रष्टाचार का मामला एसीबी कोर्ट में चल रहा है.
ऊपर की गाइडलाइन को फोलो करते थे डीसी
हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद छवि रंजन ने स्वीकार किया है कि उन पर आपराधिक मामला दर्ज है और एसीबी कोर्ट में इसकी सुनवाई लंबित है। हाईकोर्ट में शपथपत्र दाखिल करते हुए उपायुक्त ने जानकारी दी है कि एसीबी कोर्ट में अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करने के लिए उन्होंने याचिका भी दायर की है। अदालत में इस मामले में अभी ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। दरअसल हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री को अनगड़ा में खनन लीज देने के मामले में सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। सरकार की ओर से छवि रंजन ने शपथपत्र दाखिल किया था। इस पर अदालत ने नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि रांची के डीसी को खान विभाग और मुख्यमंत्री के बारे में सभी बातों की जानकारी कैसे हो सकती है। 19 मई को मामले की सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से अदालत को बताया गया कि रांची डीसी पर आपराधिक मामला है और यह मामला निचली अदालत में लंबित हैं। इस मामले में वह हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत पर हैं। इतना ही नहीं इस आईएएस की हठधर्मिता देखिए कि हाईकोर्ट के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव कुमार को आवास बुलाकर धमकी दी. सच कहा जाए तो डीसी ऊपर के आदेश के बिना ऐसी हिमाकत नहीं कर सकते थे. कहा जाता है कि वे ऊपरी आदेश की गाइडलाइन को ही फोलो करते थे.
और…कोर्ट में साफ झूठ बोल कर निकल गए
हाईकोर्ट ने गत 7 जुलाई को रातू अंचल में जमीन से जुड़े एक मामले में दायर याचिका पर सीओ को लताड़ लगाई थी. सुनवाई के दौरान रांची डीसी छविरंजन भी मौजूद थे. कोर्ट अधिकारियों से यह जानना चाह रहा था कि अंचल के कर्मचारी कितने वर्षों से एक ही जगह जमे हुए हैं और उनका तबादला क्यों नहीं किया जाता. इसपर डीसी ने कोर्ट को बताया कि तबादले के लिए विभाग की मंजूरी जरूरी है. हाईकोर्ट ने नियम-कायदा जानने के लिए अपर मुख्य सचिव को तलब करना चाहा, तो पता चला कि वे रांची से बाहर है. सिस्टम की थोड़ी सी भी जानकारी रखनेवाले को पता है कि छविरंजन में हाईकोर्ट में साफ झूठ कर निकल गए हैं. डीसी के पास शक्ति है कि वे खुद कर्मियों की इधर-उधर पोस्टिंग कर सकते हैं. इसके बाद उन्हें हटाने का घटनाक्रम तेजी से चला. समझा जाता है कि सीएमओ में इसकी चर्चा हुई कि आखिर डीसी ने ने यह झूठ क्यों बोला. अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस मामले की अगली सुनवाई में अपर मुख्य सचिव हाईकोर्ट में क्या जवाब देंगे? इस मामले में वे खुद तो फंसे ही पर उन्होंने अपर मुख्य सचिव को भी फंसा दिया. इससे पता चलता है कि कितने काबिल आईएएस को रांची का डीसी बनाया गया था.
नोट : आईएएस छविरंजन की कारस्तानियों के फसाने अभी और भी हैं. पढ़ते रहिए.

राम भक्तों के लिए

कांग्रेस से झामुमो को मुक्त करने के लिए भाजपा में मंथन शुरू, सत्ता का साथी बनेगी भाजपा…!

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नारायण विश्वकर्मा
महाराष्ट्र में शिवसेना का तीर अपनी कमान से निकल चुका है. इससे पार्टी के लोग बुरी तरह से घायल हुए हैं. महाराष्ट्र में भाजपा के ऑपरेशन लोटस के आगे विरोधियों ने घुटने टेक दिए. दूसरी तरफ झारखंड में झामुमो अपने तीर-कमान को मजबूती से संभाले हुए है. हालांकि पार्टी भले बाहर से एक दिखे, पर अंदर ही अंदर कई विधायक उबल रहे हैं. झामुमो के युवराज जब से दिल्ली से लौटे हैं, सरकार थोड़े बदले-बदले से नजर आ रहे हैं. झारखंड की राजनीति में झामुमो का तीर-धनुष कब किस पर चलेगा और कौन घायल होगा, यह तो राष्ट्रपति चुनाव के बाद ही पता चलेगा. दरअसल, झामुमो के भाजपा कनेक्शन से कांग्रेसियों की थोड़ी परेशानी बढ़ी है. इसके कारण कांग्रेसी खेमे में इस वक्त जरूर हलचल मची हुई है. सूत्रों की मानें तो झामुमो को कांग्रेस से मुक्त करने की पटकथा लिखी जा चुकी है. केंद्रीय स्तर पर भाजपा के अंदरखाने में मंथन का दौर जारी है. वैसे यहां याद दिला दूं कि झारखंड में भाजपा पूर्व में झामुमो के साथ सरकार बना चुकी है. भले राजनीतिक तौर पर इसे बेमेल गठबंधन कहा गया था. पर एक बार फिर झारखंड की राजनीति इतिहास दोहराने के मुहाने पर खड़ा है.
झामुमो के अंदर सबकुछ ठीकठाक नहीं
दरअसल, झामुमो के अंदर भी सबकुछ ठीकठाक नहीं है. झामुमो के विघ्नसंतोषी विधायकों ने सरकार गिराने के मकसद से दिल्ली से भाया देहरादून तक का सफर तय कर चुके हैं. ये बात बिल्कुल सही है कि गुरु दिशोम शिबू सोरेन का परिवार आंतरिक कलह से अभी तक उबर नहीं पाया है. शिबू सोरेन की बड़ी बहू और जामा की विधायक सीता सोरेन लगातार सरकार की कमियों को उजागर करती रहती हैं. बाकी झामुमो का कोई भी विधायक यह हिमाकत नहीं करता. गुरु जी के छोटे बेटे और दुमका के विधायक बसंत सोरेन के साथ झामुमो के विधायकों का एक दल दिल्ली जाकर भाजपा के रणनीतिकारों से मिला था. लेकिन वहां बात नहीं बनी, क्योंकि झामुमो के एक दर्जन विधायकों के पार्टी छोड़ने से सरकार का गिरना मुश्किल था. इसके लिए झामुमो के 30 में से 22 विधायकों को तोड़ने की चुनौती थी. इसलिए सरकार गिराने और बनाने के खेल का चैप्टर क्लोज हो गया. लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों की ओर से प्रयास जरूर हुआ था, क्योंकि झामुमो में अंदरूनी कलह की जानकारी दिल्ली को है. हालांकि पार्टी में अंदरुनी कलह अब भी जारी है. पार्टी में कुछ सीनियर तो कुछ जूनियर विधायक अपनी उपेक्षाओं से त्रस्त हैं. बताया गया कि कई विधायक सीएम से अपनी शिकायत करना चाहते हैं तो, सीएम के प्रेस सलाहकार अभिषेक प्रसाद उन्हें टरका देते हैं. इसके कारण कई कार्यकर्ता और विधायकों में उनके खिलाफ गहरा आक्रोश है. कमोबेश यही शिकायत कांग्रेसियों में भी है.

झामुमो द्रौपदी मुर्मू का विरोध करने की स्थिति में नहीं
सूत्र बताते हैं कि मौजूदा राजनीतिक हालात में झामुमो यूपीए फोल्डर की पार्टी है, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में वह एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करने का मन बना चुका है. राज्य में झामुमो-कांग्रेस और राजद गठबंधन की मौजूदा सरकार पिछले ढाई साल से चल रही है, लेकिन इस दौरान कई बार आपसी मतभेद उभर कर सामने आये हैं. सीएम हेमंत सोरेन और गृहमंत्री अमित शाह एक रणनीति के तहत राष्ट्रपति चुनाव में अपनी पार्टी का स्टैंड तय करने के लिए दोनों मिले. कहा जा रहा है कि उन दोनों के बीच खिचड़ी पक चुकी है. राष्ट्रपति चुनाव के बाद इसमें छौंक लगने की पूरी संभावना है. झामुमो की ओर से अभी पत्ते नहीं खोले हैं गए हैं. इसके कारण कांग्रेस में बेचैनी है. द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में फैसला लेने की सुगबुगाहट से कांग्रेस हलकान है. द्रौपदी मुर्मू आदिवासी महिला हैं. उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने एक तरह से झामुमो के लिए विरोध की सारी गुंजाइश, एक झटके में खत्म कर दी है. अगर झामुमो उनके खिलाफ मतदान करता है, तो उसके आदिवासी विरोधी होने का ठप्पा लग सकता है.
सीएम का भाजपा के प्रति नरम रुख अपनाने के मायने…!
भाजपा की ठोस रणनीति के कारण झारखंड में झामुमो-कांग्रेस को पसोपेश में डाल दिया है. कांग्रेस के पास तो कोई विकल्प ही नहीं है. पर झामुमो के पास विकल्प के मार्ग खुले हुए हैं. शायद यही कारण है कि भाजपा के प्रति सीएम के रुख में बदलाव साफ दिख रहा है. सीएम हेमंत सोरेन ने पिछले कई सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान अपने भाषणों में केंद्र सरकार या भाजपा के खिलाफ नरमी दिखायी है. ईडी की कार्रवाई के बाद कुछ दिन पूर्व तक हेमंत सोरेन सीधे केंद्र पर हमलावर थे. हालांकि वे यह भी जानते हैं कि ईडी की ओर से अगर निष्पक्ष कार्रवाई हुई, तो पूर्व सीएम रघुवर दास घिरते नजर आएंगे. वैसे इन दिनों रघुवर दास भी अब सरकार के खिलाफ बोलने से परहेज कर रहे हैं. इधर प्रधानमंत्री 12 जुलाई को देवघर आनेवाले हैं. इस दौरान पीएम 12 बड़ी योजनाओं का उदघाटन और शिलान्यास करेंगे. इस मौके पर सीएम उनके साथ मंच साझा कर सकते हैं.
भाजपा-झामुमो में हो सकती है सत्ता की भागीदारी…!
सूत्र बताते हैं कि झामुमो के द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट करने से कांग्रेस से खटपट होना तय है. राज्यसभा चुनाव के दौरान अचानक महुआ माझी को सामने लाकर हेमंत सोरेन ने कांग्रेस को जोर का झटका दिया था. राष्ट्रपति चुनाव के मामले में झामुमो के रुख से तो, कांग्रेस पूर्वाग्रह से ग्रसित हो गई है. उन्हें पता है कि झामुमो का क्या स्टैंड होगा. ऐसी स्थिति में मजबूरन कांग्रेस को सरकार से समर्थन वापस लेना पड़ सकता है. झारखंड में भाजपा हर हाल में सत्ता का साथी बनना चाहेगी. प्लॉट तैयार हो चुका है. इसलिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक रणनीति के तहत झामुमो के साथ हेमंत सरकार में शामिल होने का ताना-बाना बुनने लगा है. भाजपा सरकार के कार्यकाल के शेष बचे ढाई साल के लिए एक अनूठा प्रयोग कर सकती है. संभावना है कि हेमंत सरकार में भाजपा की ओर से कोई उप मुख्यमंत्री बनाया जाए. याद रहे भाजपा की अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली सरकार में हेमंत सोरेन उप मुख्यमंत्री बने थे. इस बार भाजपा की ओर से कोई आदिवासी विधायक ही उपमुख्यमंत्री बन सकता है. इनमें बाबूलाल मरांडी का नाम प्रमुख रूप से लिया जा रहा है. अगर उन्होंने इंकार किया तो, नीलकंठ सिंह मुंडा का नाम आगे किया जा सकता है. बहरहाल, झारखंड गठन के बाद से ही झारखंड को राजनीति का प्रयोगशाला कहा जाता रहा है. झारखंड एक बार फिर उसी राह की ओर बढ़ चला है.

राम भक्तों के लिए

भुईंहरी जमीन हड़पने के लिए पंचवटी बिल्डर्स ने तीन मृतत्माओं के फर्जी हस्ताक्षर करा लिए

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नारायण विश्वकर्मा

राजधानी रांची में बिल्डरों ने सरकारी सिस्टम को अपनी कठपुतली बना रखा है. इनके लिए कोई नियम-कानून नहीं है। अफसरों के सहयोग से बिल्डर जमीन के मूल नक्शे में छेड़छाड़ कर, फर्जी दस्तावेज के सहारे और फर्जी हस्ताक्षर कर कहीं भी अपार्टमेंट बना लेने में कामयाब हो जाते हैं। बहुचर्चित पल्स अस्पताल  की भुईंहरी जमीन हथियाने के लिए पंचवटी बिल्डर्स ने मृतत्माओं के फर्जी हस्ताक्षर तक करा लिए. रांची नगर निगम के अधिकारियों ने बगैर इसकी जांच किए नक्शा पास भी कर दिया.    

तीन मृत भुईंहरदार के फर्जी हस्ताक्षर से रसीद कटी

अब इस चित्र को गौर से देखिए… ये भुईहरदार जमींदार की ओर से जारी की जानेवाली मालगुजारी रसीद है. तीन भुईंहरी जमींदार के (लाल घेरे में) फर्जी हस्ताक्षर हैं. किसी जमाने में ये जमींदार अपने स्तर से रैयतों के लिए रसीद काट कर देता था. ये तीनों भुईंहरदार ढाई दशक पूर्व स्वर्गवासी हो चुके हैं. लेकिन तीनों ने पंचवटी बिल्डर्स को एक ही दिन यानी 22.10.2016 को मालगुजारी की रसीद काट कर दी है. इनमें जमींदार सुकरा मुंडा,  खाता सं-162, जगतू मुंडा, खाता सं-161 और बिरसा मुंडा, खाता सं-160 है. रसीद में पहले जमींदार का नाम फिर आसामी का नाम पंचवटी बिल्डर्स और जमीन का विवरण लिखा हुआ है.

कृष्णा मुंडा ने कहा-सभी हस्ताक्षर फर्जी

इस रसीद की सच्चाई की पुष्टि के लिए भुईहरदारों के वंशज कृष्णा मुंडा ने देखा तो वह अवाक रह गया. उसने बताया कि यह पूरी तरह से फर्जी रसीद है. उसका कहना है कि उनके दादा सुकरा मुंडा हस्ताक्षर करना जानते ही नहीं थे. वह बिल्कुल अपढ़ थे. उनकी मृत्यु 1995 में हो गई है. इसके अलावा उनके रिश्तेदार जगतू मुंडा और बिरसा मुंडा के देहांत हुए करीब 25 वर्ष से अधिक हो गए. ये दोनों किसी तरह से अपना हस्ताक्षर कर लेते थे. लेकिन मालगुजारी की रसीद में जो हस्ताक्षर हैं, वो उनके रिश्तेदार के नहीं हैं.

तीसरी बार रवि सरावगी के नाम से सेल डीड बना       

कागजात की छानबीन से पता चलता है कि नगर निगम के अधिकारी बगैर आवश्यक जांच-पड़ताल के भुईंहरी जमीन पर बहुमंजिला अस्पताल बनाने का परमिशन दे दिया. मजेदार बात तो ये है कि एक नहीं, तीन बार (2015, 2017 और 2018) भईंहरी जमीन को सरकार के नाम गिफ्ट दिखा दिया गया है. यहां हम विशेष रूप से 2018 में रवि कुमार सरावगी, पिता गोविंद राम सरावगी के नाम से बने सेल डीड का जिक्र कर रहे हैं. रवि सरावगी के बड़े भाई आलोक सरावगी ने यही काम 2015-17 में भी किया. पंचवटी बिल्डर्स की यूनिट के मेसर्स पंचवटी प्रमोटर्स प्रा.लि. के निदेशक रवि कुमार सरावगी के नाम से सेल डीड बना और नगर निगम से नक्शा पास करा लिया गया. कागजात के अनुसार पल्स संजीवनी हेल्थ केयर प्रा.लि. के निदेशक अभिषेक झा, पिता- कामेश्वर झा ने 3 करोड़ 60 लाख में जमीन खरीद ली.

रुंगटा फैमिली के नाम से भी बना गिफ्ट डीड

इससे पूर्व जो गिफ्ट डीड बने हैं उनमें आरसीआरजीएनएसएस लिमिटेड के तत्कालीन अध्यक्ष पुष्पा रुंगटा और सचिव सुनील रुंगटा के नाम हैं. इसके पावर होल्डर आलोक कुमार सरावगी थे. रांची नगर निगम के पूर्व सीईओ के प्रतिनिधि के रूप में नागेंद्र दुबे को 22 सितंबर 2015 को गिफ्ट किया. इस तरह निगम के अफसरों ने इस पुण्य काम को पूर्व में दो बार किया. इसके बाद 2018 में रवि कुमार सरावगी ने भी खाता सं-160, 161 और 162 के प्लॉट नं-1248, 1249, 1250 और 1251 के कुल रकबा 36.49 डिसमिल जमीन भुईंहरदार जुना मुंडा वल्द बुकना मुंडा से रजिस्ट्री करा ली गई. दरअसल, जमीन को सीएनटी सीएनटी एक्ट 1908 के संशोधन के सेक्शन 49 (1938 अनुसूची) के तहत 13 मार्च 1946 को रांची के उपायुक्त से रजिस्ट्री करा ली गई.

1869 के भुईंहरी कानून में कभी कोई संशोधन नहीं हुआ: रश्मि कात्यायन

झारखंड के काश्तकारी कानूनों के जानकार और विशेष करआदिवासी समुदाय की पारंपरिक मिल्कियत भुईंहरी एवं मुंडारी खुंटकट्टी जमीनों के इतिहास की विश्वसनीय जानकारी रखनेवाले रांची के वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यायननेसवाल उठाया कि जब अंग्रेजों के समय के 1869 के भुईंहरी कानून में आज तक कोई संशोधन नहीं हुआ तो, फिर इसे सीएनटी में कैसे और किसने शामिल करा दिया. इसका जवाब तो सरकार के पास होना चाहिए. श्री कात्यायन का कहना है कि मान लें किसी भुईंहरी जमीन पर स्कूल बनाने की स्वीकृति उपायुक्त के द्वारा ली गई है, अगर स्कूल बंद हो जाता है, तो जिस व्यक्ति को स्वीकृति मिली है, वह उस जमीन को दूसरे कामों में उपयोग में नहीं ला सकता, न ही वह व्यक्ति भुईंहरी जमीन बेच सकता है. स्कूल बंद होने की स्थिति में मूल भूस्वामी को यह जमीन स्वत: वापस हो जानी चाहिए. भुईंहरी जमीन की खरीद-बिक्री आदिवासियों के बीच भी नहीं हो सकती है. अगर किसी सार्वजनिक कार्य के लिए किसी को जमीन दी जाती है तो इसके लिए उपायुक्त की स्वीकृति अनिवार्य है. इसके बावजूद उपायुक्त के परमिशन से जमीन का जो पट्टा तैयार किया जाता है, उसमें जमीन के उपयोग का टर्म कंडीशन स्पष्ट रूप से लिखा जाना अनिवार्य है. भुईंहरी जमीन का उपयोग दूसरे कार्यों में नहीं किया जा सकता है. सार्वजनिक कार्य बंद होने की स्थिति में वो जमीन स्वत: जमीन मालिक को वापस हो जाती है.

5-6 खरीदारों के बाद पंचवटी बिल्डर्स के हाथ लगी जमीन

दरअसल, बरियातू रोड पर मौजा मोरहाबादी के खाता संख्या 162 के प्लॉट संख्या 1248 और खाता संख्या 160 के प्लॉट नंबर 1249 व 1251 पर 13 मंजिला हॉस्पिटल बना है। इस जमीन की प्रकृति बकास्त भुईहरी है, जिसकी खरीद-बिक्री नहीं हो सकती। लेकिन वर्ष 1945-46 में इस जमीन की खरीद-बिक्री रांची डीसी के आदेश से हुई थी। फिर छह-सात खरीदारों से होते हुए पंचवटी बिल्डर्स ने ली। पंचवटी बिल्डर्स के निदेशक रवि सरावगी ने नगर निगम से पल्स हॉस्पिटल का नक्शा पास कराया है। खबर है कि जांच कमेटी ने रिपोर्ट में इसका जिक्र नहीं किया कि आखिर जमीन में कहां हेरफेर हुई है। अब देखना है कि ईडी कबतक जांच रिपोर्ट का खुलासा करता है, इसपर भुईंहर परिवार की निगाहें टिकी हुई हैं.

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आदिवासी व सरकारी जमीन पर रांची नगर निगम ने बिल्डिंग निर्माण का परमिशन कैसे दिया…?

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नारायण विश्वकर्मा

अगर आपसे पैसा, पहुंच-पैरवी है तो रांची नगर निगम से फर्जी कागजात के आधार पर भी नक्शा पास हो जाएगा. आदिवासी और सरकारी जमीन तो रसूखदारों के साफ्ट टारगेट में रहता है. मोरहाबादी मौजा के बरियातू इलाके में अधिकतर जमीन आदिवासी या भुईंहरी जमीन पर रसूखदारों ने गलत ढंग से नक्शा पास कराकर अस्पताल और प्रतिष्ठान खड़े कर लिए. लेकिन नगर निगम के अधिकारियों की इनपर नजरें इनायत रही.

नगर निगम ने 3 माह पूर्व दिया है परमिशन

रांची नगर निगम के नगर आयुक्त द्वारा सरकारी और बेलगान आदिवासी खातों की जमीनों पर बिल्डिंग बनाने का परमिशन दिया गया है. 12 मार्च 2022 को गोपाल अग्रवाल और श्रीमती किरण पोद्दार को नगर निगम ने परमिशन दिया. दोनों ने 14 जून 2021 को नगर निगम में आवेदन दिया था. जिस जमीन पर बिल्डिंग बनाने का परमिशन दिया गया है, वो गैर मजरुआ आम और बेलगान आदिवासी की जमीन है. सरकारी जमीन के अगल-बगल में बेलगान आदिवासी जमीन है. रसूखदारों ने आदिवासी प्लॉट और सरकारी जमीन को मिलाकर चहारदीवारी खड़ी कर ली है.

बेलगान आदिवासी जमीन पर कैसे मिला परमिशन?

बता दें कि खाता सं-80 में प्लॉट नं- 1163, 1164, 1166, 1169 और 1170 की जमीन पर रांची नगर निगम के नगर आयुक्त ने बिल्डिंग डेवलपमेंट के लिए परमिशन दिया है. उपलब्ध कागजात के अनुसार खाता सं-80 के खतियान के सभी प्लॉट महरंग मुंडा वगैरह के हैं. प्लॉट नं-1163, मालिक महरंग मुंडा, रकबा 21 कट्ठा, प्लॉट सं-1166, मालिक जूना मुंडा, रकबा-5 डिसमिल, (बेलगान) प्लॉट नं-1169, मालिक जूना मुंडा, रकबा-4 डिसमिल (बेलगान) और प्लॉट नं-1170, मालिक जगराम मुंडा, रकबा-4 डिसमिल (बेलगान) जमीन आदिवासी खतियानी है. इनमें 1163 प्लॉट बेलगान नहीं है. वहीं खतियान में प्लॉट नं-1164, रकबा-16 डिसमिल जमीन का जिक्र नहीं है, क्योंकि यह जमीन गैर मजरुआ आम है और ये नक्शे के इसे सार्वजनिक रास्ता बताया गया है.

जानिए…कैसे हड़प ली गई आदिवासी जमीन

उल्लेखनीय है कि जिस जमीन पर नगर निगम से बिल्डिंग डेवलप के लिए मंजूरी मिली है, उसके पंजी-ii में सिर्फ खाता सं- 80 के प्लॉट नं-1163 में 5 कट्ठा 10 छटांक (लगभग 9 डिसमिल से अधिक) अंकित है. शेष प्लॉट नं- 1164, 1166, 1169 और 1170 में शून्य दर्शाया गया है. पंजी-ii में जमीन मालिक गोपाल अग्रवाल, पिता स्व.अरुण लाल अग्रवाल और श्रीमती किरण पोद्दार पति पुरुषोत्तम पोद्दार के नाम दर्ज है. इसमें गैर मजरुआ आम की 16 डिसमिल जमीन (रास्ता) जमीन को मिला दें तो 25 डिसमिल जमीन पर इन दोनों का कब्जा है. इसका मतलब बेलगान आदिवासी जमीन (5 कट्ठा 10 छटांक) पर ही नगर निगम ने बिल्डिंग डेवलप के लिए सेंक्शन किया है. दूसरी तरफ इन दोनों के अलावा इसके ठीक बगल में संजय जैन, पिता राजकुमार जैन ने म्यूटेशन के बड़गाई अंचल में आवेदन किया है, जिसका केस सं-2978/2021-2022, 11 दिसंबर 2021 से लंबित है. इसका खाता-सं-80, 1162-1163, रकबा 7.85 डिसमिल है. खतियान में यह जमीन आदिवासी खतियानधारक महरंग मुंडा का है, जिसका रकबा क्रमश: 53 और 21 डिसमिल है. इस जमीन को सच्चिदानंद लाल, पिता स्व. मधुसूदन अग्रवाल ने संजय जैन के हाथों बेच दिया है. दोनों जमीन की चहारदीवारी के बीचोंबीच 16 डिसमिल जमीन (रास्ता) है.

नगर निगम तत्काल परमिशन रद्द करे: कृष्णा मुंडा

इस मामले में भुईंहरदार कृष्णा मुंडा ने बताया कि करीब 35 साल पूर्व जैन बंधुओं ने बागवानी के नाम पर हमारे पुरखों से यह जमीन ली थी. उसने कहा कि हमारे सभी गोतिया ने कभी इसपर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि जमीन की हकीकत उन्हें मालूम नहीं थी. इसके बाद कृष्णा ने खतियान निकलवाया, तब मालूम चला कि उक्त सभी हड़पे गए प्लॉटों के खतियानधारक उनके पुरखे हैं. उसने बताया कि प्रदीप मुंडा, सूरज मुंडा, हरि मुंडा, मांगा मुंडा (कृष्णा मुंडा के पिता) छोटू मुंडा और छट्ठू मुंडा के दादाओं के नाम से जमीन खतियान में दर्ज है. लेकिन रसूखदारों ने अंचल कार्यालय की मदद से जमीन हड़प ली है. उसने बताया कि गरीबी-भुखमरी के कारण हमारे परिवार कोर्ट-कचहरी नहीं जा सके. उसने बताया कि अंचल कार्यालय में पहुंच-पैरवी और पैसेवालों की पूछ है. इसी का फायदा उठाकर रसूखदारों ने हमें जमीन से बेदखल करने में अबतक कामयाब हैं. उसने कहा कि पर अब हमारे परिवार के सभी सदस्य सतर्क हो गए हैं. भले नगर निगम ने बिल्डिंग डेवलप के लिए रसूखदारों को सेंक्शन कर दिया है, पर अपने पुरखों की जमीन बचाने के लिए हमलोग किसी भी हद तक जा सकते हैं. वह नगर निगम के अधिकारियों से सवाल किया है कि आखिर परमिशन से पूर्व जमीन का इतिहास क्यों नहीं जाना गया? बड़गाई अंचल कार्यालय की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कमिश्नर को प्रतिवेदन में बताया गया कि 16 डिसमिल जमीन गैर मजरुआ आम है, जो रास्ता है, और वाद अस्वीकृत है, तो फिर वहां चहारदीवारी क्यों है? और किसके कब्जे में है, यह क्यों नहीं बताया गया?

क्या रसूखदार सब कुछ मेनैज कर लेंगे…?

ऐसा लगता है आदिवासी खतियानी जमीन अब सिर्फ कागज के  टुकड़े रह गए हैं. अब इसका कोई मोल नहीं है. राजस्व विभाग के अफसरों ने इसे बेमोल कर दिया है. रांची में जमीन के कागजात का दुरूस्त नहीं होना, झारखंड के लिए अभिशाप बना हुआ है. 1927 में शुरु हुए सर्वे का अंतिम प्रकाशन 1935 में हुआ। इसके बाद किसी भी जिले का पूर्ण सर्वे नहीं हुआ। रांची में 1978 में सर्वे की अधिसूचना जारी हुई, लेकिन सर्वे पूरा नहीं हुआ। इसका अफसरों ने खूब फायदा उठाया. सत्ताधीशों से इसमें सुधार की उम्र्मीद अब बेमानी लगती है. खैर…! देखना है कि कृष्णा मुंडा के परिवार को इंसाफ मिलेगा या फिर सदा की तरह रसूखदार सब कुछ मेनैज कर लेंगे?

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बड़गाई अंचल का साथ मिला तो, रसूखदारों ने आदिवासी व सरकारी जमीन भी हथिया ली

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नारायण विश्वकर्मा

राजधानी के पॉश इलाके में गैरआदिवासियों ने भुईंहरी-आदिवासी कायमी ही नहीं, गैरमजरुआ आम जमीन भी हथिया ली. बड़गाई अंचल कार्यालय ने इस काम में बखूबी उनका साथ दिया. फर्जी कागजात के आधार पर रसूखदारों को रांची नगर निगम से बिल्डिंग बनाने का परमिशन भी मिल गया है. पहले एक झलक ऊपर की तस्वीर को देखें…आदिवासी जमीन पर लंबे समय से जैन बंधु का कब्जा है. कुछ साल पहले इस जमीन पर अस्थायी रूप से टीन का शेड बनाकर स्कूटी और पार्ट्स का गोदाम बनाया गया है. यह जमीन भुईंहरी जमीन पर आबाद लॉ विस्टा अपार्टमेंट (जैन बंधु) के पीछे की ओर है. अब इसके ठीक नीचे की तस्वीर देखें…यह जांच प्रतिवेदन है, जिसे बड़गाई सीओ ने दक्षिणी छोटानागपुर के आयुक्त नितिन मदन कुलकर्णी के सचिव को भेजा है. कमिश्नर ने सोशल एक्टिविस्ट इंद्रदेव लाल से प्राप्त आवेदन पर बड़गाई सीओ से जवाब मांगा था.   

हड़प ली गई 16 डिसमिल सरकारी जमीन

अब जरा लाल घेरे में लिखी लाइन पर गौर फरमाएं…अंचल कार्यालय ने अपने जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट किया है कि दाखिल-खारिज वाद सं-1185/2017-18 एवं 1079/2017-18 के ऑनलाइन अभिलेख के अनुसार आवेदक राजकुमार जैन वल्द स्व. हरखचंद जैन, मौजा मोरहाबादी, खाता सं-157, प्लॉट सं-1164, रकबा 16 डिसमिल गैर मजरुआ आम दर्जा जमीन रास्ता होने के कारण अस्वीकृत किया गया है. बड़गाई सीओ ने कमिश्नर ऑफिस को 1 जून को भेजे गए पत्र से यह स्पष्ट अंकित है. इसकी गहराई से छानबीन के बाद उपलब्ध कागजात के अनुसार गैरमजरूआ आम जमीन (16 डिसमिल) के अलावा 15 डिसमिल आदिवासी कायमी जमीन भी हड़प ली गई है. जमीन के चारों ओर चहारदीवारी है. बड़गाई अंचल के सीआई से जब इस संबंध में बात की तो, उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की.

बड़गाई सीआई को कुछ नहीं मालूम

भुईंहरी जमीन पर निर्मित पल्स अस्पताल पर इस  वक्त बड़गाई अंचल सुर्खियों में है. पर सीओ मनोज कुमार का मोबाइल (9431827771) इनकमिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं है, का राग अलापता है. मैंने जब इस बाबत सीआई से यह जानना चाहा कि कमिश्नर को भेजे गए जांच प्रतिवेदन में 16 डिसमिल जमीन को गैरमजरूआ आम और रास्ता बताया गया है, जबकि वहां न रास्ते का पता है न जमीन का.   इसपर उन्होंने कहा कि ये तो हमें पता नहीं है. अगर काम हो रहा है, तो गलत हो रहा है. अंचल कार्यालय ने अबतक कार्रवाई क्यों नहीं की? इसके जवाब में सीआई ने कहा कि देखते हैं. इसके बारे में सीओ या कर्मचारी ही कुछ बता सकते हैं. मैंने कहा, सीओ का कोई और नंबर है? जवाब मिला हमें नहीं मालूम है. सीआई तमाम कार्यवाही से खुद को अलग बता रहा है. फोन पर उन्होंने कहा कि ये सब कर्मचारी से पूछिए…जब मैंने उनका नंबर मांगा तो फोन काट दिया.   

एक ही प्लॉट के दो खाते नंबर         

बड़गाई अंचल का कारनामा देखिए कि एक ही प्लॉट को दो खाते नंबर में दर्शाया दिया गया है. कमिश्नर को भेजे गए प्रतिवेदन में प्लॉट नं-1164 को खाता सं-157 का बताया गया, पर खाता नं- 80 में भी 1164 प्लॉट का जिक्र है. 18 जून 2019 को 2012 से लेकर 2019-20 तक की रसीद भी निर्गत कर दी गई है. रसीद गोपाल अग्रवाल और श्रीमती किरण पोद्दार के नाम से कटी है. रसीद के खाता सं-80 में 1164 के अलावा प्लॉट नं-1163, 1166, 1169 और 1170, रकबा 5 कट्ठा 10 छटाक दर्शायी गई है. वहीं पंजी-ii में गोपाल अग्रवाल, पिता- स्व.अरुण लाल अग्रवाल और श्रीमती किरण पोद्दार, पति पुरुषोत्तम पोद्दार, खाता सं-80 के प्लॉट नं-1163 में रकबा 5 कट्ठा 10 छटाक का जिक्र है, जबकि 1164, 1166, 1169 और 1170 में रकबा शून्य अंकित है. इसके अलावा बड़गाई अंचल में आवेदक (बायर) संजय जैन, पिता राजकुमार जैन और सेलर सच्चिदानंद लाल, पिता- स्व. मधुसूदन लाल अग्रवाल के नाम से म्यूटेशन के लिए आवेदन किया गया है. इसका केस सं- 2978/2021-2022 है. खाता सं-80 के प्लॉट नं-1162 और 1163, और रकबा 7.85 है. यह आवेदन 11 दिसंबर 2021 से लंबित हैं. जबकि प्लॉट नं-1164 को छोड़कर सभी जमीन के खतियानधारक आदिवासी कायमी परिवार हैं. उनके पास आज भी खतियान है, पर शायद वह सिर्फ कागज का टुकड़ा मात्र है. 35 साल पूर्व ही जैन बंधु ने गलत तरीके से कागजात बनवा कर उनकी जमीन हथिया ली है.

नोट: कल के अंक में पढ़ें… इस आदिवासी जमीन पर कैसे बिल्डिंग डेवलप के लिए रांची नगर निगम के आयुक्त ने परमिशन दे दिया है. इसके अलावा हम आदिवासी खतियानधारक से बातचीत के अंश भी प्रस्तुत करेंगे…!

राम भक्तों के लिए

CM को कृष्णा मुंडा की चुनौती, आदिवासियों के प्रति हमर्ददी है, तो भुईंहरी जमीन वापस दिलाकर दिखाएं…!

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नारायण विश्वकर्मा

बड़गाई अंचल कार्यालय ने दक्षिणी छोटानागपुर आयुक्त कार्यालय को दूसरी बार भी मांगी गई रिपोर्ट का समुचित जवाब नहीं दिया. ऐसा लगता है कि भुईंहरी जमीन का भूत अंचल कार्यालय को डरा रहा है. शायद इसलिए आयुक्त नितिन मदन कुलकर्णी अधूरी रिपोर्ट पर अब अंचल कार्यालय के ऊपर दबाव न बनाकर ऊपर जाने की तैयारी में हैं. बड़गाई सीओ ने आयुक्त कार्यालय को 1 जून को तीसरी बार अपनी रिपोर्ट भेजी है. सूत्र से पता चला है कि मोरहाबादी मौजा की भुईंहरी जमीन पर खड़े अरबों के प्रतिष्ठानों पर हाथ डालना अकेले अंचल कार्यालय के बूते की बात नहीं है. राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव, रांची डीसी और नगर निगम के आयुक्त को इसमें शामिल करने के बाद ही इस मामले में आगे की कार्रवाई संभव है. मुमकिन यह भी है कि सरकार इसके लिए एसआईटी गठित कर दे. क्योंकि पल्स अस्पताल के अलावा भुईंहरी जमीन पर निर्मित अन्य प्रतिष्ठानों पर भी सरकार की निगाह है. उधर, पल्स अस्पताल के एसेट के बारे में ईडी ने अभी तक सार्वजनिक रूप से कुछ भी खुलासा नहीं किया है.

एक बार फिर लॉ विस्टा अपार्टमेंट को चिन्हित किया

बता दें कि 11 मई को आयुक्त कार्यालय द्वारा बड़गाई अंचल कार्यालय से मांगे गए आधे-अधूरे प्रतिवेदन पर आयुक्त कार्यालय ने ऐतराज जताया था. बड़गाई सीओ द्वारा 25 मई को आयुक्त कार्यालय को भेजे गए प्रतिवेदन में सिर्फ ला विस्टा अपार्टमेंट को फोकस किया. इसके बाद कमिश्नर ऑफिस ने (पत्रांक 10-14/1529, 30 मई 2022) सोशल एक्टिविस्ट इंद्रदेव लाल से प्राप्त आवेदन के जांच प्रतिवेदन के क्रम में पूरक सूचनाएं उपलब्ध कराने का आदेश बड़गाई सीओ को दिया था. आयुक्त कार्यालय ने बड़गाई अंचल कार्यालय के जवाब के आलोक में (पत्रांक 465(ii) 25 मई 2022) फिर तीन बिंदुओं पर जवाब मांगा था. कमिश्नर ने अंचल कार्यालय को तीन दिनों के अंदर प्रतिवेदन उपलब्ध कराने को कहा था.

एक पखवारे के बाद भी अभिलेख का पता नहीं

रिपोर्ट तो तीन दिनों के अंदर भेज तो दी गई, पर पूछे गए पूरक प्रश्नों के जवाब को गोल कर दिया गया है. दूसरे प्रतिवेदन में अशोक कुमार जैन, अनिल कुमार जैन, विजय कुमार जैन, रमेश कुमार जैन और वरुण बक्सी (जमाबंदीदारों) को वर्ष 2018-19 तक की रसीद निर्गत करने, दाखिल-खारिज वाद संख्या और पंजी-ii की विवरणी भेजी गई है. विवरणी में खाता सं-160, 161 और 162 को भुईंहरी जमीन बताया गया है. इसमें जमाबंदीदारों के खतियान भी संलग्न किए गए हैं. बड़गाई सीओ के हस्ताक्षर से जारी पत्र के अंत में कहा गया है कि चूंकि 1 जनवरी 2016 को बड़गाई अंचल कार्यालय की स्थापना की गई है. इसलिए संबंधित अभिलेख कार्यालय में उपलब्ध नहीं है. उक्त अभिलेख की मांग जिला अभिलेखागार, रांची से अंचल कार्यालय (पत्रांक 464 (ii), 25 मई) से मांग की गई है. यही कट पेस्ट 1 जून 2022 के जवाब में भी है. 15 दिन बीतने के बावजूद अभिलेखागार से अभिलेख मिलने की खबर नहीं है.

 नोट: jharkhand weekly के website पर (13 और 31 मई 2022) के अंक में विस्तार से खबर दी गई है.

MLA बनने के बाद चमरा लिंडा ने भी साथ छोड़ा: कृष्णा मुंडा

इधर, भुईंहरदार परिवार सरकार से जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की लगातार मांग कर रहे हैं. भुईंहरदार परिवार का नेतृत्व कर रहे कृष्णा मुंडा का कहना है कि ये कितनी अजीब बात है कि भुईंहरी जमीन पर बसे पल्स अस्पताल को लेकर हुकूमत का पलड़ा अभी भी रसूखदारों की तरफ ही झुका हुआ है. इस मामले में आदिवासी विधायकों का रवैया तो और भी विचित्र है. उन्होंने कहा कि झामुमो विधायक चमरा लिंडा विधायक बनने से पूर्व भुईंहरी जमीन की जंग में हमलोगों का साथ दिया था. लेकिन विधायक बनने के बाद उसने फिर मुड़ कर नहीं देखा. ईडी प्रकरण में सबकुछ सामने आ जाने के बावजूद उसका कोई अता-पता नहीं है. उन्होंने कहा कि रघुवर सरकार ने कभी इसपर ध्यान नहीं दिया. सीएम हेमंत सोरेन चाहते तो भुईंहरी जमीन पर पूजा सिंघल का पल्स अस्पताल कभी नहीं बनता. उन्होंने हेमंत सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनमें आदिवासी के प्रति थोड़ी भी हमर्ददी है, तो हमें हमारी जमीन वापस दिलाकर दिखाएं.

CO FIR दर्ज कर जमीन की मापी कराए: इंद्रदेव लाल

बड़गाई अंचल कार्यालय के रवैए को लेकर नाराजगी जताते हुए सोशल एक्टिविस्ट इंद्रदेव लाल ने कहा कि जब अंचल कार्यालय यह मान रहा है कि खाता सं-160, 161 और 162 भुईंहरी खाते की जमीन है, तो फिर तमाम लोगों की जमीन की मापी कर उनपर एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कर रहा है? आखिर कौन उन्हें रोक रहा है? उन्होंने कहा कि कमिश्नर को भेजे गए दूसरे प्रतिवेदन में भी जैन बंधुओं के नाम 2018-19 तक की रसीद निर्गत करने, दाखिल-खारिज वाद संख्या और पंजी-ii की विवरणी भेजी गई है. कागजात के आधार पर अंचल कार्यालय कम से कम तमाम रसूखदारों को नोटिस तो जारी कर सकता है. क्या यह माना जाए कि जिला प्रशासन ने रसूखदारों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है? उन्होंने रांची नगर निगम की कार्यशैली पर भी उंगली उठाते हुए कहा कि पल्स अस्पताल की जमीन का फर्जी कागजात के आधार पर नक्शा पास कराया गया है. ईडी की जांच के क्रम में मीडिया के हवाले से नगर आयुक्त मुकेश कुमार के संज्ञान में भी यह मामला आ चुका है, इसके बावजूद अबतक वे नोटिस जारी करने का आदेश तक नहीं दे पाए हैं. उनका कहना है कि हेमंत सरकार को इस पूरे प्रकरण में अविलंब हस्तक्षेप करना चाहिए. क्योंकि अब इससे सरकार का इकबाल भी जुड़ गया है.

सरकार के एक्शन मोड का इंतजार

सूत्र बताते हैं कि भुईंहरी जमीन हड़प कर अरबों के प्रतिष्ठान खड़ा करनेवाले मालिकों की ऊपर तक पहुंच-पैरवी है. पल्स अस्पताल की भुईंहरी जमीन का एक सिरा दूसरे से भी जुड़ा हुआ है. पूजा सिंघल प्रकरण से सभी लोग परेशानी में पड़ गए हैं. अगर पल्स अस्पताल का मामला सामने नहीं आता, तो किसी की शामत नहीं आती. दरअसल भुईंहरी जमीन का मामला सरकार के गले की फांस बन गई है. वैसे सीएम हेमंत सोरेन ने कुछ दिन पूर्व कहा है कि सभी आदिवासी जमीन मामलों की जांच करायी जाएगी. इसकी शुरुआत बड़गाई अंचल के मोरहाबादी मौजा की जमीनों से जुड़े मामलों से की जा सकती है. क्योंकि बड़गाई अंचल द्वारा कमिश्नर ऑफिस को भेजी गई रिपोर्ट से यह तो स्पष्ट हो ही चुका है कि रसूखदारों ने भुईंहरी जमीनों को हड़प कर अपने प्रतिष्ठान आबाद किए हैं. अब देखना है कि इस पूरे प्रकरण में सरकार कब एक्शन मोड में आती है?

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सरयू राय का पल्स अस्पताल सरकारों को सौंपने का सुझाव, पर भुईंहरी जमीन की वापसी पर सवाल नहीं उठाया…!

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नारायण विश्वकर्मा

सरकार की कार्यशैली पर बेबाक टिप्पणी करनेवाले निर्दलीय विधायक सरयू राय ने एक दैनिक अखबार में पल्स अस्पताल के बारे में सरकार पर तंज कसते हुए कहा है कि राज्य व केंद्र मिलकर अस्पताल को अधिग्रहण कर ले. उनका सुझाव है कि इस अस्पताल का नाम बदलकर प्रवर्तन अस्पताल कर दें और इसे रिम्स का एक सुपर स्पेशलिस्ट अंग बना दें. सरयू राय के इस वक्तव्य पर सत्तापक्ष और विपक्ष ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, पर तमाम आदिवासी विधायकों और आदिवासी संगठनों की चुप्पी आदिवासी समाज को जरूर चुभ रहा है. विपक्ष शासन-प्रशासन से ये क्यों नहीं पूछ रहा है कि जब जांच रिपोर्ट मिल गई है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है? दो साल पूर्व स्वयं सीएम हेमंत सोरेन ने जांच की सिफारिश की थी. जांच रिपोर्ट मिले एक पखवारा गुजर गया है, इसके बावजूद विपक्ष के मुंह में दही क्यों जम गया है?       

सरयू राय दो साल तक चुप क्यों रहे?

सरयू राय ने देर से ही सही पर पल्स अस्पताल को लेकर अपनी जुबान तो खोली. फिर भी बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते. 2016 में पल्स अस्पताल बनना शुरू हुआ था. उस वक्त वो पूर्व सरकार में मंत्री थे. पूर्ववर्ती सरकार के गलत कार्यों पर वो उंगली उठाते रहे हैं. वो आज भी रघुवर दास के कारनामों की जांच के लिए अब भी सीएम से गुहार लगाते रहते हैं. पूजा सिंघल के मनरेगा घोटाले में मिली क्लीन चिट पर भी उन्होंने उंगली उठायी है. ईडी प्रकरण में पल्स अस्पताल का नाम उजागर होने के बाद भुईंहरी जमीन का मामला भी सुर्खियों में आ गया है. पूर्ववर्ती सरकार को पता था कि पूजा सिंघल अपने पद और पावर का इस्तेमाल कर अपने पति अभिषेक झा के साथ भुईंहरी जमीन खरीदी है और उसपर भव्य अस्पताल का निर्माण कराया जा रहा है. 13 फरवरी 2020 को सरकार के संज्ञान में आने के बाद भी सत्तापक्ष और विपक्ष की ओर से जांच रिपोर्ट में देरी को लेकर कभी सवाल नहीं उठाए गए.

अस्पताल जिसे मिले, हमें हमारी जमीन चाहिए: कृष्णा मुंडा

इस मामले में भुईंहरदार कृष्णा मुंडा ने कहा कि माननीय केंद्र और राज्य सरकार को पल्स अस्पताल सौंपने की बात कर रहे हैं. लेकिन वो हमारी जमीन लौटाने की बात क्यों नहीं कर रहे हैं? आखिर पूजा सिंघल का भव्य अस्पताल भुईंहरी जमीन पर ही तो खड़ा है. अस्पताल किसी को भी मिले, हमें हमारी जमीन वापस चाहिए. उन्होंने कहा कि अबुआ राज में हमारे घर की महिलाएं हड़िया बेचती हैं और रेजा-कुली का काम करती हैं. पुरुष रिक्शा चलाकर किसी तरह से अपना पेट भर रहे हैं और हमारी जमीन से लोग मालामाल हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि हमारा परिवार आज आर्थिक रूप से मजबूत होता तो हमलोग भी अदालत में फरियाद करते और अपनी जमीन रसूखदारों से छीन लेते. जल जंगल और जमीन बचाने का ढोंग कर आदिवासी सीएम हेमंत सोरेन ने इधर जांच का आदेश दिया और उधर पूजा सिंघल को अपने बगल में बिठा लिया. उन्होंने कहा कि रघुवर राज में भुईंहरी जमीन पर अस्पताल की नींव पड़ी और हेमंत राज में अस्पताल तैयार हो गया. क्या यही हेमंत सरकार का इंसाफ है?

जेएमएम विधायक चमरा लिंडा खामोश क्यों हैं?

दरअसल,आदिवासी विधायकों और आदिवासी संगठनों ने भी भुईंहरी जमीन की लड़ाई में कभी खुलकर सामने नहीं आए. जेएमएम के विधायक चमरा लिंडा कभी भुईंहरी जमीन को लेकर मुखर थे. 2015 में चमरा लिंडा ने विधानसभा में भुईंहरी जमीन का मामला उठाया था. सवाल पूछा था कि क्या डीड नंबर 4572- 26 जुलाई 2014 को, डीड नंबर 5703-15 सितंबर 2014, डीड नंबर 4571-26 जुलाई 2014, डीड नंबर 4108 और 21 जुलाई 2014 को बकास्त भुईंहरी पहनाई भूमि को निबंधित कैसे कर दिया गया? इसके जवाब में कहा गया कि प्रश्नगत निबंधित भूमि रांची शहर के मौजा बरियातू, थाना नंबर 193, खाता 184, प्लॉट 677, रकबा 0.54 एकड़ भूमि आर.एस. खतियान में बकास्त भुइहरी पहनाई दर्ज है। पूरे मामले पर जांचोपरांत कार्रवाई की बात कही गई थी। 7 साल बाद भी किसी को नहीं पता कि भुईंहरी जमीन की अगर जांच हुई तो किसे पकड़ा गया? किस पर कार्रवाई हुई? कहां है वो जांच की फाइल? ऐसे तमाम किस्से रांची के कई अंचलों में देखे-सुने जा सकते हैं।

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पल्स डायग्नोस्टिक सेंटर की करोड़ों की जमीन का एक रुपए में हुआ था एग्रीमेंट…!

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नारायण विश्वकर्मा

रांची : भुईंहरी जमीन पर निर्मित पल्स अस्पताल की जमीन की जांच को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, न ही रांची जिला प्रशासन को कोई कड़ा निर्देश जारी किया गया है. सरकार का रुख साफ नहीं होने से आदिवासी संगठनों में कुलबुलाहट है. ईडी अभी अपने स्तर से इस मामले की तहकीकात कर रहा है. जिला प्रशासन को जांच रिपोर्ट मिल जाने के बाद भी उसे सार्वजनिक नहीं करना, कई तरह के संदेह को जन्म दे रहा है. दूसरी तरफ पल्स अस्पताल के पास ही पल्स डायग्नोस्टिक सेंटर को लेकर ईडी की छानबीन शुरू होने से झामुमो का एक कद्दावर नेता इन दिनों सकते में हैं. झामुमो के अंदरखाने खुसफुसाहट होने लगी है. दरअसल, ईडी की चल रही छापामारी से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के काफी क्लोज रहनेवाले ब्यूरोक्रेट्स और उनके खास सिपहसालारों की बेचैनी बढ़ी हुई है.

बिनोद पाण्डेय का पूजा कनेक्शन…!

सूत्र बताते हैं कि पल्स डायग्नोस्टिक सेंटर में निलंबित आईएएस और जेल में बंद पूजा सिंघल का पैसा लगा हुआ है और ये पैसा मनरेगा घपले की कमाई का है. इस एंगल से ईडी जांच कर रहा है, पर पल्स डायग्नोस्टिक सेंटर की जमीन किसकी है? किसने किसको बेची? और किसने खरीदी? ईडी को इसकी जांच करनी चाहिए, तब जांच का दायरा जेएमएम कार्यालय तक पहुंच सकता है. सूत्र बताते हैं कि यह जमीन कोलकाता के किसी बंगाली परिवार का है, जिसे जेएमएम के वरिष्ठ नेता बिनोद पाण्डेय से मात्र एक रुपए में एग्रीमेंट हुआ था. किसके नाम से डीड है. जमीन का सौदा कैसे और किसके साथ, किस रूप में हुआ, इसकी जानकारी बड़गाई अंचल कार्यालय और रजिस्ट्री आफिस से पता किया जा सकता है. बताया गया कि इस जमीन को खरीदने के लिए जेल में बंद बाहुबली अनिल शर्मा ने भी कोशिश की थी. लेकिन जमीन मिली बिनोद पाण्डेय को. बताया गया कि बिल्डर विमल कुमार उर्फ मिट्ठू पाण्डेय, बबलू पाण्डेय (मनोज पाण्डेय) और बिनोद पाण्डेय की इसमें हिस्सेदारी है. इसमें किसकी कितनी हिस्सेदारी है, यह जांच होने पर पता चल पाएगा. ईडी अगर इसकी गहन जांच करेगा तो, जमीन की हकीकत का पता चल पाएगा, क्योंकि इसी बिल्डिंग में पूजा सिंघल का पल्स डायग्नोस्टिक सेंटर है.

ईडी बिल्डर से कर चुका है पूछताछ

बता दें कि ईडी ने पूजा सिंघल मनी लाउड्रिंग प्रकरण में पिछले दिन नगर निगम के दो इंजीनियरों और एक बिल्डर से पूछताछ हुई थी. नगर निगम की टाउन प्लानिंग शाखा के जूनियर इंजीनियर सुनील श्रीवास्तव और विवेक कुमार, बिल्डर विमल कुमार उर्फ मिट्ठू पाण्डेय और निगम के अधिकारियों से पल्स डॉयग्नोस्टिक सेंटर और पल्स अस्पताल के बारे में पूछताछ की थी. पूछताछ के बाद बिल्डर ने मीडिया को बताया था कि पल्स डॉयग्नोस्टिक सेंटर जिस बिल्डिंग में स्थित है, उसको उन्होंने ही बनाया है. ईडी ने उनसे इसी बिल्डिंग में स्थित पल्स डॉयग्नोस्टिक को बेचे गए हिस्से से संबंधित सवाल पूछे थे. इसकी खरीद-बिक्री से संबंधित दस्तावेज में इसकी कीमत का उल्लेख किया गया है. दस्तावेज में जितनी राशि का उल्लेख है, उतने में ही एक फ्लोर पल्स डॉयग्नोस्टिक को बेचा गया है.

बिनोद पाण्डेय का नाम शेल कंपनियों की लिस्ट में शामिल

बताया जाता है कि पूजा सिंघल और बिनोद पाण्डेय का 2009-10 से ही व्यावसायिक कनेक्शन हैं. जब पूजा सिंघल खूंटी में डीसी थीं, तभी पल्स डॉयग्नोस्टिक सेंटर वाली बिल्डिंग का निर्माण शुरू हुआ था. सूत्र बताते हैं कि बिनोद पाण्डेय का हावड़ा (कोलकाता) में जो होटल बना है, उसमें भी पूजा सिंघल का पैसा लगा हुआ है. इसके अलावा बिनोद पांडेय का रांची के कई इलाकों में अपार्टमेंट है. उसके कुछ व्यवसाय में फाइनेंसर की भूमिका में पूजा सिंघल का भी नाम लिया जाता है. जेएमएम के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में यह चर्चा जोरों पर है बिनोद पाण्डेय आज अगर फर्श से अर्श तक पहुंचा है तो, इसके पीछे पार्टी के रसूख का ही कमाल है. वैसे खबर है कि झारखंड हाईकोर्ट में शिव शंकर शर्मा द्वारा दायर याचिका में शेल कंपनियों के मामले में भी बिनोद पाण्डेय के नाम का जिक्र है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि पल्स डॉयग्नोस्टिक सेंटर का बिल्डर किसी जमाने में जेएमएम कार्यालय के रंग-रोगन का ठेका लिया करता था. बहरहाल, ईडी अगर पल्स डॉयग्नोस्टिक सेंटर की जमीन से जुड़े तथ्यों को खंगालने का काम करे तो और भी कई मामलों का खुलासा हो सकता है.

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RTI एक्टिविस्ट इंद्रदेव लाल डेढ़ दशक से लड़ रहे हैं भुईंहरी व आदिवासी जमीन की लड़ाई

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नारायण विश्वकर्मा
भुईंहरी जमीन पर स्थित पल्स अस्पताल का मामला सामने आने के बाद यह पता चलता है कि सरकारी तंत्र ने रसूखदारों की मिलीभगत से किस कदर आदिवासियों की जमीन को लूटा है. रांची जिले के लगभग सभी अंचल कार्यालयों में भुईंहरी जमीन का वजूद मिटा दिया गया है. भुईंहरी जमीन को लेकर बरियातू के तेतरटोली निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट इंद्रदेव लाल करीब 15 सालों से सीएमओ से लेकर अंचल कार्यालयों में गुहार लगाते रहे हैं. लेकिन इस बार जाकर उनके आवेदन पर आयुक्त कार्यालय में सुनवाई हो रही है, इससे उनका भरोसा थोड़ा बढ़ा है.
पांचों जिलों की भुईंहरी जमीन के दस्तावेज की मांग
श्री लाल ने 31 मई को आयुक्त कार्यालय में आवेदन देकर कमिश्नर से दक्षिणी छोटानागपुर के पांचों जिले रांची, खूंटी, लोहरदगा, गुमला और सिमडेगा जिलों के उपायुक्तों से भुईंहरी जमीन से जुड़ी विवरणी मंगाने का आग्रह किया है. उन्होंने इन जिलों की भुईंहरी जमीन मौजा/खेवट, खाता-प्लॉट, रकबा और भुईंहरी जमीन के खतियानधारक के नाम सहित सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने का कमिश्नर से अनुरोध किया है.
विभाग ने डेढ़ साल बाद भी जानकारी नहीं दी
इससे पूर्व इंद्रदेव लाल ने समय-समय पर आदिवासी और भुईंहरी जमीन की अद्यतन स्थिति की जानकारी के विभिन्न माध्यमों प्राप्त करने की कोशिश में हैं. पिछले साल 25 जनवरी 2021 को राजस्व सचिव के जनसूचना पदाधिकारी कार्यालय में सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जो सूचना मांगी थी, वह डेढ़ साल बाद भी नहीं मिली. उन्होंने भू-राजस्व विभाग से पूछा था कि रांची जिले की कैसरे हिंद जमीन, गैर मजरुआ आम खतियान की जमीन, विनोबा भावे भूदान यज्ञ से प्राप्त कितनी जमीन झारखंड में है, का विवरण और रांची में कितनी भुईंहरी जमीन है, का विवरण मांगा था.

अंचल से कभी पोजिटिव जवाब नहीं मिलता
श्री लाल ने कहा कि भुईंहरी जमीन को लेकर रांची अंचल और सीएमओ तक से जानकारी मांगी थी, लेकिन कभी भी सही जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने बताया कि 21 नवंबर 2017 को राज्य के सीएमओ (पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास) और रांची अंचलाधिकारी से सूचना अधिकार अधिनियम के तहत बकास्त भुईंहरी जमीन के बारे में सूचना मांगी थी। मांगी गई सूचना में इंद्रदेव लाल ने जानना चाहा था कि बकास्त भुईंहरी (मुंडारी) जमीन की अंचल कार्यालय से रसीद निर्गत हो सकती है क्या? यदि बकास्त भुईंहरी जमीन पर आवासीय या व्यावसायिक भवन आदि का निर्माण करना है तो, किससे सहमति लेनी होगी? और तीसरा सवाल था कि क्या आम आदमी (आदिवासी नहीं) बकास्त भुईंहरी जमीन की रजिस्ट्री करवा सकता है? उन्होंने बताया कि जनसूचना पदाधिकारी का कमाल देखिए कि इन बातों का जवाब देने के बदले रांची अंचल के जन सूचना पदाधिकारी ने 7 दिसंबर 2017 को  अपने जवाब में लिखा कि यह मामला बड़गाई अंचल से संबंधित है। उन्होंने बताया कि कायदे से जन सूचना पदाधिकारी को मांगी गई सूचना बड़गाई अंचल को भेज देना चाहिए था, और वहां से रांची अंचल को ही बताया जाता। इसके बाद हमें सूचना दी जाती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, यानी कि रांची अंचल को पता है कि भुईंहरी जमीन के अधिकतर मामले बड़गाई अंचल से जुड़े हुए हैं।
सीएमओ से 5 साल बाद भी जवाब नहीं आया
उन्होंने बताया कि 21 नवंबर 2017 को ही सीएमओ से सूचना अधिकार अधिनियम के तहत यह जानना चाहा था कि मौजा मोरहाबादी, थाना सं- 192, खाता सं- 161, 162, 19, 156, 111, 80, 46, 84, 135, 125 और 55 जो, बकास्त भुईंहरी जमीन खतियान में दर्ज है, इसका अंचल कार्यालय, रांची शहर द्वारा रसीद निर्गत किया जा रहा है, क्या यह कानून सम्मत है?  लेकिन सीएमओ से 5 साल बाद भी जवाब नहीं आया। उन्होंने बताया कि हमें पता चला कि बड़गाई अंचल के पूर्व सीओ विनोद प्रजापति ने भुईंहरी जमीन से जुड़े रसीद निर्गत करने से इंकार कर दिया था। लेकिन उनके जाने के बाद सभी लंबित पड़ी रसीद निर्गत कर दी गई, यह जानते हुए भी भुईंहरी जमीन की रसीद नहीं काटी जा सकती है। इसके बाद ही हमने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत सूचना मांगी थी।
रसूखदारों के तार ब्यूरोक्रेट्स से जुड़े हैं
श्री लाल ने कहा कि दरअसल अखंड बिहार से लेकर झारखंड बनने के बाद से किसी भी सरकार ने आदिवासी जमीन की लूट-खसोट पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि अधिकारियों और रसूखदारों को खुला मैदान दे दिया. इसका सबसे बड़ा प्रमाण पल्स अस्पताल के आसपास की सैकड़ों एकड़ जमीन देता है. उन्होंने कहा कि पल्स अस्पताल और इसके आसपास बीसियों संस्थान-प्रतिष्ठान भुईंहरी जमीन पर आबाद हैं. दो साल पूर्व सीएम को ट्वीट कर भुईंहरी जमीन पर निर्मित पल्स अस्पताल के बारे में जानकारी दी गई थी. जब सीएम हेमंत सोरेन ने इसका संज्ञान लिया तो हमें और भुईंहरी परिवार को लगा कि अब उनके साथ इंसाफ होगा. लेकिन बहुत जल्द हमलोगों का भ्रम टूट गया. उन्होंने कहा कि ईडी की कार्रवाई के बाद थोड़ी उम्मीद जगी है, पर विश्वास करना अभी भी मुश्किल है. उनका कहना है कि रसूखदारों के नेटवर्क के तार ब्यूरोक्रेट्स के साथ मजबूती से जुड़े हुए हैं. जहां तक आदिवासी सीएम की बात है तो, इस बारे में एक मशहूर लाइन आदिवासी नेतृत्व के बारे में एकदम सटीक बैठती है….गैरों में कहां दम था...हमें तो अपनों ने लूटा...!

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