डीलिस्टिंग के नाम पर आदिवासियों के बीच जहर घोलना और उन्हें बरगलाना बंद हो : बंधु तिर्की
रांची : पूर्व मंत्री एवं झारखण्ड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की ने कहा है कि डीलिस्टिंग के नाम पर आदिवासियों के सौहार्दपूर्ण संबंधों के बीच में जहर घोलने और उनके बीच दीवार खड़ी करने से जनजाति सुरक्षा मंच को बाज आना चाहिये और उसे जनजातीय समुदाय के हित में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये. श्री तिर्की ने कहा कि जिस प्रकार से आदिवासियों को बरगलाने की कोशिश की जा रही है वह दुर्भाग्यपूर्ण है. श्री तिर्की ने कहा कि झारखण्ड की मौलिक संस्कृति यही है कि यहां गांव-देहात से लेकर शहरों तक में सभी लोग परस्पर सौहार्द के साथ रहते हैं और किसी अन्य आधार पर भले ही उनके बीच में कोई भी मतभेद हो, लेकिन सरना और ईसाई धर्म के आधार पर उनके बीच में कोई भी मतभेद नहीं है. उन्होंने कहा कि धार्मिक विचारधारा भले ही अलग-अलग हों, पर आदिवासियों की संस्कृति-भाषा समान है और सभी को इसका सम्मान करना चाहिये. झारखण्ड की इस मौलिक भावना से खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को भी नहीं है.
‘डीलिस्टिंग जैसे मुद्दे का झारखण्ड में जमीनी स्तर पर कोई महत्व नहीं’
वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि ज्यों ही चुनावी हवा बहने लगी है, वैसे ही ध्रुवीकरण कर वोटों की फसलों को काटने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुषंगी इकाई वनवासी कल्याण केन्द्र के तहत गठित जनजाति सुरक्षा मंच मैदान में आ चुका है और 24 दिसम्बर को राजधानी के मोरहाबादी मैदान में रैली कर उसने डीलिस्टिंग के जिस मुद्दे को उठाया है, उसका झारखण्ड में जमीनी स्तर पर कोई महत्व नहीं है. श्री तिर्की ने जोर देकर कहा कि किसी भी मत या धर्म को मानने का अधिकार संविधान, भारत के सभी नागरिकों को देता है और किसी दूसरे धर्म से प्रभावित होकर भले कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में मतान्तरित हो जाये लेकिन वह अपनी संस्कृति से कभी नहीं कट सकता और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से आदिवासी आदिवासी ही होता है ना कि वह किसी धर्म को मानने वाला. श्री तिर्की ने कहा कि वास्तविकता की धरातल पर यदि बात की जाये तो आदिवासी वस्तुतः सरना धर्मावलंबी होते हैं लेकिन समय के प्रभाव से अनेक आदिवासियों ने ईसाई, मुस्लिम या फिर सनातन धर्म को अपनाया है और उन्हें इस बात का अधिकार है लेकिन संस्कृति आदिवासियत है और वही रहेगी न कि कुछ और.
‘धर्म के मामले में भी जनजाति सुरक्षा मंच को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये…!’
श्री तिर्की ने कहा कि यदि ईसाई धर्म पर बात होती है तो बाकी धर्म के मामले में भी जनजाति सुरक्षा मंच को अपनी स्थिति पूरी तरीके से स्पष्ट करनी चाहिये. उन्होंने जोर देकर कहा कि आदिवासियों के हित के विषय में जनजाति सुरक्षा मंच पाठ पढ़ाना बन्द करें, क्योंकि आदिवासियों को अपनी स्थिति-परिस्थिति का पूरी जानकारी है. उन्होंने कहा कि आदिवासी मूलतः आदिवासी है और यही सच्चाई है. आदिवासियों की धर्म, परंपरा, संस्कृति के मामले में उनका जुड़ाव कैसा है और अपनी संस्कृति के साथ वे कैसे रहें, इस मामले में आदिवासियों को किसी से समझने की जरूरत नहीं है. श्री तिर्की ने कहा कि जनजाति सुरक्षा मंच यदि आदिवासियों के हितों का इतना ही बड़ा संरक्षक और पैरोकार है तो उसके भी नेता ने आदिवासियों की जमीन को जमीन दलालों द्वारा लूटने, ठगने और जमीन के मामले में आदिवासियों के हित को बाहरी लोगों के द्वारा कुचलने की बात किसी ने क्यों नहीं की? श्री तिर्की ने कहा कि आदिवासियों की डेमोग्राफी में खतरनाक एवं नकारात्मक बदलाव आया है और आदिवासियों की जमीन लूटनेवाले वैसे लोग हैं जो दूसरे प्रदेशों से झारखण्ड में आये हैं. उन्होंने कहा कि इसके कारण ही आदिवासियों की ऐसी स्थिति हो गयी है कि न केवल रांची एवं अन्य नगरों बल्कि दूरदराज के क़स्बाई नगरों में भी उन्हें उज़ाड़ा जा रहा है और उनकी जमीन पर कोई दूसरा व्यक्ति बस रहा है जिसके कारण आदिवासी, उत्पीड़न और पलायन को मजबूर है. श्री तिर्की ने कहा कि आज झारखण्ड में कुल मिलाकर उन्हीं आदिवासियों का हित कुचला जा रहा है जिनके लिये झारखण्ड का निर्माण हुआ था लेकिन आदिवासियों के नाम पर उलगुलान डीलिस्टिंग महारैली में आदिवासियों के गंभीर मामलों पर एक शब्द भी नहीं बोला गया और इससे यह स्पष्ट है कि जनजाति सुरक्षा मंच के मंच पर खड़े नेताओं और परदे के पीछे खड़े नेताओं की मानसिकता और मनोस्थिति कैसी है और वे सभी आदिवासियों का कितना भला चाहते हैं?
कड़िया मुंडा बताएं कि आठ बार सांसद रहने के दौरान उन्होंने आदिवासियों के हित में ऐसा कौन सा महत्वपूर्ण काम किया है?
श्री तिर्की ने कहा कि आज की उलगुलान डीलिस्टिंग महारैली में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित करिया मुंडा को यह भी बताना चाहिये कि आठ बार सांसद रहने के दौरान उन्होंने आदिवासियों के हित में ऐसा कौन सा महत्वपूर्ण काम किया जो बताने योग्य है? उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से श्री मुंडा न केवल सांसद बल्कि केंद्रीय मंत्री एवं लोकसभा के उपाध्यक्ष रहे तो यदि वह चाहते तो, आदिवासियों के लिये बहुत कुछ कर सकते थे. वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि जनजातीय उप योजना की राशि को भी काम किया गया जिसका सीधा-सीधा नुकसान आदिवासियों को हुआ है. श्री तिर्की ने कहा कि बात-बात पर आज की रैली में पंखराज साहेब बाबा कार्तिक उरांव का नाम लेनेवाले नेताओं को यह भी बताना चाहिए कि उनके द्वारा स्थापित अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद द्वारा चलाये जा रहे 72 विद्यालयों का अनुदान भाजपा सरकार ने क्यों बंद किया? उन्होंने कहा कि आज की रैली का एकमात्र उद्देश्य आदिवासियों को तोड़कर और उनके बीच विवाद पैदा कर आरक्षण को समाप्त करने की केन्द्र की कोशिश को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देना था.
‘आदिवासियों के अधिकार में कटौती होना दुर्भाग्यपूर्ण’
श्री तिर्की ने कहा कि यदि जनजाति सुरक्षा मंच को आदिवासियों के हित की इतनी ही ज्यादा चिंता है तो उन्हें सरना धर्म कोड के मामले में भी बोलना चाहिये और यदि झारखण्ड विधानसभा से पारित सरना धर्म कोड में कुछेक त्रुटि या विसंगतियां है तो उसके मामले में उन्हें सुझाव देने के साथ ही सरना धर्म कोड को लागू करने के लिये अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिये. श्री तिर्की ने कहा कि आदिवासी जल, जंगल और जमीन से जुड़े हुए हैं, लेकिन जिस प्रकार से वन अधिकार अधिनियम को पारित करते हुए उसमें आदिवासियों के अधिकार में कटौती की गयी है वह भी दुर्भाग्यपूर्ण है. लेकिन इस मामले में भी जनजाति सुरक्षा मंच के बड़े-बड़े नेताओं ने कुछ भी नहीं बोला. पेसा नियमावली और पाँचवी अनुसूची के संदर्भ में भी जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक एवं अन्य नेताओं के द्वारा कुछ भी नहीं कहने की श्री तिर्की ने कड़ी आलोचना की और और कहा कि आदिवासी आज सारी स्थितियों और परिस्थितियों के साथ ही लालच एवं स्वार्थ में डूबे नेताओं की गतिविधियों को खामोशी से देख रहा है और समय आने पर वह इसका तीखा जवाब देगा. श्री तिर्की ने कहा कि अगले 4 फरवरी 2024 को झारखण्ड जनाधिकार मंच के बैनर तले मोरहाबादी मैदान में आदिवासी एकता महारैली का आयोजन किया जायेगा जिसमें आदिवासियों के मुद्दे पर तर्क के साथ बात की जायेगी. उन्होंने कहा कि जनजाति सुरक्षा मंच के द्वारा उठाए गए मुद्दे से आदिवासी डरने वाले नहीं है और समय आने पर इसका जवाब दिया जायेगा.
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