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Sunday, March 8, 2026
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चमकीला एक अच्छा माध्यम है अपने आसपास के लोगों को समझने के लिए

आप देखिए कि कौन है जो इस फ़िल्म की तारीफ़ें कर रहा है? उनकी पहचान क्या है? वे किस जगह से आते हैं? क्यों उनके भीतर फ़िल्म को लेकर कोई सवाल नहीं है?
क्यों आपको अपने आसपास कोई ये सवाल पूछता नहीं दिख रहा कि फ़िल्म में जाति को लेकर सिर्फ़ एक संवाद क्यों है? सिर्फ़ एक….
किसी दलित व्यक्ति पर फ़िल्म बना कर आप उमकी आईडेंटिटी को एक संवाद में समेटकर कैसे छोड़ सकते हैं? कौन लोग हैं जो जाति के मुद्दे को डायल्यूट किए जाने पर भी तारीफ़ें कर रहे हैं और लिख रहे हैं कि ‘फ़िल्म बिना लाउड हुए अपनी बात कह रही है’.कौन हैं ये लोग जिनके लिए जाति पर बात करना लाउड होने की तरह है?
क्यों चमकीले की हत्या की वजह जातीय हिंसा न होकर उसके केंद्र में ‘अश्लीलता’ को रखा गया और जाति के मुद्दे को मिटा दिया गया?
क्यों जाति को गोल करके ग़रीब दिखा दिया जाता है दलित व्यक्ति को?? और जाति को ग़ायब कर दिया जाता है?
इतने बड़े जीवन को पर्दे पर उतारा गया है लेकिन क्यों कहीं जाति से जुड़ा कोई संवाद नहीं दिखता है?? क्या असल जीवन में व्यक्ति कभी बात नहीं करता अपनी जातीय पहचान पर?? अपने घर में, दोस्तों में? डायरी में? मन में. कहीं भी?? तो क्यों नहीं दिखता फिर वो पर्दे पर??
(आप फ़िल्म बना कर कोई अहसान नहीं कर रहे. और इस बहाने कम से कम फ़िल्म तो बनी जैसी बातें तो बिल्कुल न करें.)
दिलजीत ने अच्छा किरदार निभाया है लेकिन अमर सिंह चमकीले और दिलजीत की बॉडी लैंग्वेज में जो इतना फ़र्क़ दिखता है वो क्यों दिखाया है फिल्म में?? क्या चमकीला स्टेज पर वैसा ही दिखता था?? क्यों दिलजीत को अजीब क़िस्म से डिफेंसिव और हंबल दिखाने की कोशिश की है?
और फ़िल्म पर बात करते हुए भी क्यों आपके केंद्र में सिर्फ एक पुरुष है? क्यों फ़िल्म की बात करते हुए झूठ बोलकर की गई शादी और पहली पत्नी की बात नहीं आती?? क्यों फ़िल्म के ज़रिए आपके मुद्दे में ये शामिल नहीं है?? क्यों आपकी बातचीत सिर्फ दर्द, करुणा, जीवन, गाने के आगे बढ़कर जाति के मुद्दे तक नहीं आती? दलित महिला तक नहीं आती?
सवाल बहुत से हैं. और जवाब नहीं मिल रहे हैं. मैं बस हैरान हूं.
सब एक खेमे के लोग हैं. वही बनाने वाले. वही देखने वाले. बनाने वाले खुश. देखने वाले ख़ुश.
लेख आभार – इंटरनेट

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