नई दिल्ली, मार्च 2025: भारतीय राजनीति में एक बड़ा सवाल उठने लगा है—“मोदी के बाद कौन?” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सितंबर 2025 में 75 वर्ष के होने जा रहे हैं। 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 75 वर्ष की आयु पूरी कर चुके वरिष्ठ नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर सक्रिय राजनीति से अलग कर दिया था। ऐसे में मोदी के 75 वर्ष के होने के बाद उनकी भूमिका को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं।
क्या भाजपा की ‘रिटायरमेंट पॉलिसी’ मोदी पर लागू होगी?
भाजपा की अनौपचारिक ’75 वर्ष की रिटायरमेंट पॉलिसी’ 2019 में आडवाणी, जोशी और सुमित्रा महाजन जैसे वरिष्ठ नेताओं पर लागू हुई थी, जिनका टिकट काट दिया गया था। अब सवाल उठता है कि क्या यही नीति मोदी पर भी लागू होगी? और यदि हां, तो उनका उत्तराधिकारी कौन होगा?
संभावित दावेदार और उनकी चुनौतियां
1. योगी आदित्यनाथ: कट्टर हिंदुत्व छवि बाधा?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा के सबसे चर्चित और लोकप्रिय नेताओं में शामिल हैं। उनकी हिंदुत्ववादी छवि भाजपा के कोर वोट बैंक को मजबूत करती है, लेकिन यह छवि संघ और भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के संतुलित दृष्टिकोण से मेल नहीं खाती।
2. नितिन गडकरी: स्वतंत्र शैली नुकसानदेह?
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का कामकाज और प्रशासनिक दक्षता प्रशंसनीय रही है। वे संघ के करीबी माने जाते हैं, लेकिन मोदी-शाह की भाजपा के लिए उनकी स्वतंत्र कार्यशैली समस्या बन सकती है। इसके अलावा, वे चुनावी राजनीति के लिहाज से उतने प्रभावी नहीं माने जाते।
3. राजनाथ सिंह: उम्र और लोकप्रियता बनी बाधा?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं, लेकिन वे 73 वर्ष के हो चुके हैं। भाजपा की अनौपचारिक 75 वर्ष की नीति उनके खिलाफ जा सकती है। इसके अलावा, उनकी लोकप्रियता और करिश्माई नेतृत्व में भी कमी देखी जाती है।
क्या कोई युवा नेता संभालेगा कमान?
4. हिमंत बिस्वा सरमा और ज्योतिरादित्य सिंधिया
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे युवा नेता तेजी से उभर रहे हैं। हालांकि, सरमा पूर्वोत्तर भारत से बाहर ज्यादा प्रभाव नहीं रखते, और सिंधिया की लोकप्रियता मध्य प्रदेश तक सीमित है।
5. एस. जयशंकर: प्रशासनिक अनुभव, लेकिन राजनीतिक आधार कमजोर
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की विदेश नीति और प्रशासनिक दक्षता सराहनीय है, लेकिन उनका जनाधार कमजोर है और वे जमीनी राजनीति से दूर रहे हैं। ऐसे में उनकी दावेदारी कमजोर पड़ सकती है।
भविष्य की रणनीति: नया चेहरा या अनुभवी नेतृत्व?
भाजपा ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में नए नेताओं को कमान सौंपने की परंपरा शुरू की है। संभव है कि मोदी के बाद भी पार्टी इसी रणनीति पर चले और किसी नए लेकिन प्रभावी नेता को आगे लाए।
निष्कर्ष: मोदी के बाद भाजपा की राह आसान नहीं
भले ही मोदी के बाद कौन? का सवाल अभी अनसुलझा है, लेकिन यह साफ है कि भाजपा को ऐसा नेतृत्व चाहिए, जो प्रशासनिक कुशलता, चुनावी जीत की गारंटी और राष्ट्रीय स्तर पर करिश्माई छवि बनाए रख सके। फिलहाल, इस सवाल का जवाब समय ही बताएगा।
News – Muskan