-अनिल जैन
(वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली)
कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने कुछ समय पहले गुजरात में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि कांग्रेस में ऐसे कई लोग हैं जो गुप्त रूप से भाजपा के लिए काम करते हैं। उन्होंने कहा था कि ऐसे नेताओं को पहचानने और बाहर निकालने की जरूरत है। बाद में यही बात राहुल ने बिहार और मध्य प्रदेश में भी कही। लगभग ऐसी ही बात चालीस साल पहले राहुल के पिता राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से कही थी।
दिसंबर 1985 में कांग्रेस पार्टी की स्थापना के 100 साल पूरे होने पर बंबई (अब मुंबई) में आयोजित शताब्दी अधिवेशन में तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने कहा था कि कांग्रेस को सत्ता के दलालों से मुक्त कराया जाएगा। राजीव पांच साल तक प्रधानमंत्री और अपनी हत्या होने तक करीब साढ़े छह साल तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, लेकिन सत्ता के किसी भी दलाल को कांग्रेस से बाहर नहीं कर सके। अलबत्ता अरुण नेहरू जैसे सत्ता के दुर्दांत दलाल जरूर उनके विश्वासपात्र सलाहकार बनकर उनसे उलटे-सीधे फैसले करवाते रहे।
अरुण नेहरू की कारस्तानियों से कांग्रेस हल्कान रही
शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे झुकते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के जरिये पलटने और फिर हिंदू कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने के लिए अयोध्या में ताला खुलवाने जैसे विवादास्पद फैसले अरुण नेहरू की ही देन थे, जिनका खमियाजा कांग्रेस ने 1989 के चुनाव में भी भुगता और आज तक भुगत रही है। बाद में अरुण नेहरू जनता दल और विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में भी मंत्री रहे और उस सरकार के गिरने के बाद भाजपा में शामिल होकर अखबारों में कॉलम लिखने लगे थे, जिसमें वे कांग्रेस के खिलाफ खूब जहर उगलते थे।
अरुण नेहरू के अलावा दूसरे तमाम सत्ता के दलाल पार्टी में जमे रहे-राजीव गांधी के जीवनकाल में और उनके बाद भी। उनका कांग्रेस से बाहर निकलने का सिलसिला 2013 से शुरू हुआ, जब उन्हें लग गया कि अब कांग्रेस सत्ता से बाहर होने वाली है। तब से लेकर अब तक सत्ता के दलालों का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का सिलसिला बना हुआ है।
राजीव गांधी अपने विरोधियों को बाहर करने की हिम्मत नहीं जुटा सके
पिछले बारह वर्षों के दौरान करीब एक दर्जन पूर्व मुख्यमंत्री, दो दर्जन से ज्यादा पूर्व केंद्रीय मंत्री, असंख्य पूर्व सांसद-विधायक और अन्य छोटे-बड़े नेता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए हैं, जिनमें से ज्यादातर गले में भगवा पट्टा डाले हुए सत्ता सुख भोग रहे हैं। इसे उनकी ‘घर वापसी’ भी कह सकते हैं। इसके अलावा भी कई नेता ऐसे हैं जो अभी कांग्रेस में बने हुए हैं लेकिन काम भाजपा के लिए कर रहे हैं। ऐसे ही लोगों की ओर राहुल गांधी ने गुजरात, बिहार और मध्य प्रदेश में इशारा किया था।
सवाल है कि क्या राहुल ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखाने का साहस कर पाएंगे? राजीव गांधी ने जब सत्ता के दलालों को पार्टी से बाहर करने की बात कही थी तब तो कांग्रेस अभूतपूर्व बहुमत के साथ सत्ता में थी। देश के तीन चौथाई से ज्यादा राज्यों में भी उसकी सरकारें थीं। राजीव गांधी प्रधानमंत्री होने के साथ ही पार्टी के भी अध्यक्ष थे और पार्टी पर उनका पूरी तरह नियंत्रण था। इसके बावजूद वे किसी भी नेता की सत्ता के दलाल के तौर पर शिनाख्त कर उसे पार्टी से बाहर नहीं कर पाए थे।
अब तो शीर्ष नेतृत्व की संगठन पर पकड़ बेहद कमजोर है
अब तो हालात बिल्कुल अलग हैं। चूंकि पार्टी पिछले एक दशक से केंद्र सहित ज्यादातर राज्यों में सत्ता से तो बाहर है, इसलिए शीर्ष नेतृत्व की पार्टी संगठन पर पकड़ भी बेहद कमजोर है। नेतृत्व की इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए पार्टी में कई लोग हैं जो अलग-अलग स्तरों पर विभिन्न तरीकों से पार्टी की जड़ें खोदने का काम खुल कर करते हैं और मौका आने पर पार्टी नेतृत्व को आंखें भी दिखाते हैं। इस समय पार्टी का एक समूह ऐसा ही कर रहा है।
जैसे ही राहुल गांधी ने भाजपा के दलालों को पहचानने और उन्हें कांग्रेस से बाहर करने की बात कही, वैसे ही पार्टी के कुछ बुद्धिजीवीनुमा लोगों ने उत्तर प्रदेश और बिहार में इंडिया गठबंधन को तोड़ने और भाजपा की राह आसान करने के लिए एक अभियान शुरू कर दिया है।
इस अभियान के तहत पचास साल पुराने आपातकाल का औचित्य साबित करने की कोशिश की जा रही है। सब जानते हैं कि आपातकाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के इको सिस्टम का प्रिय मुद्दा है, जिसके सहारे वे मौके-बेमौके कांग्रेस पर हमला करते रहते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि आपातकाल का औचित्य साबित करने का जो अभियान शुरू हुआ है, उससे किसे फायदा होगा!
‘आरएसएस एंड संस’ कांग्रेस के चरित्र हनन के प्रयास में
पिछले दस सालों के दौरान ‘आरएसएस एंड संस’ के तत्वावधान में गांधी और नेहरू का पर्याप्त रूप से चरित्र हनन हो चुका है और वामपंथियों को तो वे पहले ही देश का शत्रु घोषित कर चुके हैं। अब बचे हैं समाजवादी आंदोलन के प्रतीक पुरुष जयप्रकाश नारायण (जेपी) तथा डॉक्टर राममनोहर लोहिया, जिनका चरित्र हनन वह खुद नहीं करना चाहते, इसलिए उनके रणनीतिकारों ने यह जिम्मा भी आपातकाल के इन नवजात कांग्रेसी आशिकों को सौंपा है। इस जिम्मेदारी को भी कांग्रेस से जुडी यह मंडली पूरे उत्साह से निभाने में जुटी है।
दलीय राजनीति से दूर जो समाजवादी कार्यकर्ता, लेखक और पत्रकार मौजूदा सरकार के तानाशाहीपूर्ण कृत्यों के विरोध में कांग्रेस का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सहयोग कर रहे हैं, उन्हें चिढ़ाने और उकसाने के लिए जेपी-लोहिया जैसे भारत छोड़ो आंदोलन के महानायकों और भारतीय समाजवादी आंदोलन के शिखर पुरुषों को बिना किसी सबूत के सीआईए का एजेंट, देशद्रोही और इजरायल का समर्थक बताया जा रहा है।
कांग्रेस की गलतियों का फायदा बीजेपी ने उठाया
लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति आलोचना से परे नहीं हो सकता। किसी बात के लिए महात्मा गांधी की भी आलोचना हो सकती है और नेहरू-पटेल व जेपी-लोहिया की भी, लेकिन उसका कोई तार्किक आधार तो होना चाहिए। मगर आपातकाल के इन नवजात आशिकों को इससे कोई मतलब नहीं। इन्हें किसी ने रटा दिया है कि 1967 में लोहिया ने और 1974 में जेपी ने आरएसएस और जनसंघ की मदद लेकर इन्हें राजनीतिक वैधता प्रदान की जिससे ये ताकतवर हो गए और आज देश भर में सत्ता पर काबिज हैं।
इन लोगों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि 1984 में दो सीटों पर सिमटने के बाद भाजपा को मिली ताकत के लिए कौन जिम्मेदार है? शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकने, हिंदू कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए अयोध्या का ताला खुलवाने और मंडल आयोग की सिफारिशों का विरोध करने जैसे आत्मघाती फैसलों के लिए कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए क्या जेपी और लोहिया आए थे?
आपातकाल के नवप्रसूत आशिक बेशर्मी से आपातकाल के महिमामंडन में जुटे हैं
अपनी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ 1974 में शुरू हुए आंदोलन को कुचलने के लिए देश पर आपातकाल थोपने वाली इंदिरा गांधी ने 1980 में सत्ता में वापसी करने के बाद आपातकाल लागू करने को अपनी गलती मान लिया था। आपातकाल के दौरान हुईं ज्यादतियों के लिए भी उन्होंने खेद जताया था। उनके बाद हुए कांग्रेस के तीन अन्य प्रधानमंत्रियों और 22 साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी ने भी आपातकाल को गलत माना, लेकिन कांग्रेस के भीतर रातों-रात पैदा हुए आपातकाल के नवप्रसूत आशिक पूरी बेशर्मी के साथ आपातकाल के महिमामंडन में जुटे हैं।
इन लोगों के बारे में एक तथ्य यह है कि ये लोग मौजूदा अघोषित आंदोलन के बारे में कभी मुंह नहीं खोलते बल्कि पुराने आपातकाल का औचित्य साबित कर प्रकारांतर से मौजूदा अघोषित आपातकाल को भी सही मानते हैं। राहुल गांधी पिछले लंबे समय से कांग्रेस का खोया हुआ जनाधार हासिल करने के लिए सामाजिक न्याय के मुद्दे को शिद्दत से उठा रहे हैं। वे सांप्रदायिक ताकतों और सरकार की मदद से देश के संसाधनों को लूट रहे बेईमान उद्योग घरानों को सीधे-सीधे ललकार रहे हैं। मगर इन मुद्दों में कांग्रेस के इन आपातकाल प्रेमियों की कोई रूचि नहीं है। वजह साफ है कि ये कहीं और से निर्देशित होते हुए आपातकाल की जय-जयकार और जेपी-लोहिया के लिए धिक्कार मंत्र का जाप कर रहे हैं।
इन लोगों का यह अभियान सीधे-सीधे राहुल गांधी को चुनौती है। अब राहुल को तय करना होगा कि वे कांग्रेस में घुसे इन नागपुरी फिदायीन हमलावरों की चुनौती से कैसे निबटते हैं?
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