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Sunday, March 8, 2026
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गिरिडीह में 18वीं शताब्दी में टिकैत (राजाओं) ने अपनी रियासतों में जगतजननी की आराधना शुरू की थी

गिरिडीह, (कमलनयन) :भारतीय सनातन संस्कृति के बड़े त्योहारों में नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रों की बड़ी महिमा है। इन दिनों पूरा राष्ट्र आदि शक्ति की उपासना में लीन रहता है। इस वर्ष 22 सितंबर से चल रहे नवरात्रों में माता के गजराज पर आने के खुशी में पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा है। झारखंड के गिरिडीह इलाके में शक्ति, साधना का यह पर्व करीब दौ सौ सालों से मनाया जा रहा है।

18वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में टिकैत (राजाओं) ने अपनी रियासतों में जगतजननी की आराधना शुरू की थी। शाही खजाने सें देवी मंडपों में बड़े ही धूमधाम से मां दुर्गा पूजा का अनुष्ठान सम्पन्न होता था। इस दौरान कई इलाकों में लगने वाले मेलों में आसपास के दर्जनों गांवोँ के लोग शामिल होते थे।

सभी दुर्गा मंडपों की अलग-अलग विशेषता 

कालान्तर में लगभग दुर्गा मंडप भव्य भवनों में परिवर्तित हो गये हैं। जो स्थानीय लोगों के हर्दय में तीर्थो के समान है। सभी दुर्गा मंडपों की अपनी अलग-अलग विशेषता है, जहां भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती हैं। लोक आस्था से जुड़े देवी मंडपों में भक्त सुख-दुःख में सबसे पहले इन्हींं देवी मंडपों में आकर मत्था टेकते है और नवरात्रों में शक्ति की अधिष्ठात्री मां दुर्गा की वंदना कर मनचाही मुराद पाते हैं।

माता रानी भी अपने भक्तों की हर सकारात्मक मनोकामना पूरी करती है। क्षेत्र के लोगों के मुताबिक श्रीश्री आदि दुर्गा (बड़ी मां) पचम्बागढ़ दुर्गा मंडा, बरगंडा काली मंडा,  मंगरोडीह, बनियाडीह, भोरनडीहा, सेन्ट्रलपीठ, मोहनपुर बोड़ो, पपरवाराटांड़ सहित गिरिडीह के आसपास स्थित दुर्गा मंडपों में जगत जननी निःसंतान दम्पतियों को संतान सुख, कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर, असाध्य रोगी को स्वस्थ काया, बेरोजगारों के हाथों को काम, केस मुकदमों में सफलता सहित नाना प्रकार की पीड़ा से मुक्त कर भौतिक सुखों का आशीर्वाद देती है।

श्रीश्री आदि दुर्गा “बड़ी मईया” का अद्भुत दरबार 

गिरिडीह शहर में भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली श्रीश्री आदि दुर्गा ” बड़ी मईया” का दरबार अद्भुत है। नवरात्र के इन पावन दिनों में बड़ी मां अपने भक्तों को स्वाभाविक स्वरूपों की मुद्रा में आशीर्वाद देती है। इन दिनों दूरदराज से काफी संख्या में लोग “बड़ी माँ” के दरबार में पहुंचकर स्वाभाविक रूपों का दर्शन कर मत्था टेक कर मन्नतें मांगने आते हैं।

कहते हैं कि माता के इस दरबार की महिमा निराली है। माना जाता है कि सरल  मन से माता के मुखमंडल की आभा को निहारने वाले भक्तों को स्वतः महसूस होता है कि माता रानी स्वाभाविक मुद्रा में आशीष दे रही हैं। बड़ी माँ के दरबार की विशेषता है कि महासप्तमी से विजया दशमी तक माता के मुखमंडल के भाव बदलते हैं। आदि शक्ति बड़ी माँ अपने भक्तों को बदलते स्वरूपों का जीवंत एहसास कराती है।

महासप्तमी को ममतामयी माँ के सुन्दर सलोने रूप के मुखमंडल का भाव बेटी के अपने मायके पहुंचने के बाद जैसा होता है। महाअष्टमी और नवमी को माँ का आकर्षक व तेज मुखमंडल की आभा धैर्य के साथ जीवन जीने का संदेश देने की मुद्रा में रहता है।

विजयादशमी को माता के आलौकिक मुखमंडल की आभा अत्यंत शांत, सौम्य और अपनों से बिछुड़ने की पीड़ा दर्शाती दिखायी देती है। मानो ऐसा प्रतीत होता है माँ के निर्मल हदृय में अपने भक्तों से एक वर्ष के लिए बिछुड़ने का भाव है। और विदाई की बेला में माँ के हजारों भक्त कांधे पर विर्सजन के लिए ले जाते हैं, तो माता के सौम्य मुख मंडल पर विरह की पीड़ा स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती हैं।

उल्लेखनीय है कि आधुनिकता के इस दौर में भी श्रीश्री आदि दुर्गा मंडप में प्रतिमा गढ़ने में सांचों का उपयोग नहीं होता है। मूर्तिकार अपने हाथों से प्रतिमा गढ़कर भक्तों को जीवंत रूपों में जगत जननी के दर्शन कराते हैंl


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