घाटशिला उपचुनाव: किसका पलड़ा है भारी? चंपई-बाबूलाल की प्रतिष्ठा दांंव पर
विनोद कुमार
झारखंड के घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में 11 नवंबर को होने वाला उपचुनाव में जनता के मुद्दे गौण हैं और प्रमुख दलों के प्रत्याशी और नेता अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता और पूर्व मंत्री रामदास सोरेन के निधन से रिक्त हुए सीट पर हेमंत सोरेन ने उन्हीं के पुत्र सोमेश चंद्र सोरेन को प्रत्याशी बनाया है, तो भाजपा ने यहां से चंपई सोरेन के सुपुत्र बाबूलाल सोरेन को प्रत्याशी बनाया है।
एक समय चंपई सोरेन झामुमो के कद्दावर नेता थे और झामुमो के प्रमुख दिवंगत शिबू सोरेन गुरुजी के विश्वस्त सहयोगी भी। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के पहले वे झामुमो छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे। इस लिहाज से देखें तो यह दोनों प्रत्याशियों की प्रतिष्ठा की लड़ाई तो है ही, हेमंत सोरेन और चंपई सोरेन तथा चंपई सोरेन के बगलगीर भाजपा के शीर्ष संथाल नेता बाबूलाल मरांडी के लिए भी प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है।
बाबूलाल और चंपई सोरेन के होते विधानसभा चुनाव में भाजपा एसटी के लिए आरक्षित तमाम सीटें, एक सरायकेला को छोड़, हार गई थी। सराईकेला में चंपई सोरेन किसी तरह अपनी सीट बचा पाए थे। अब इस चुनाव में यदि भाजपा को जीत नहीं दिला सके, तो इन दोनों नेताओं की भारी फजीहत होगी।
जहां तक हेमंत सोरेन का सवाल है, यह उनके लिए भी प्रतिष्ठा की लड़ाई है। वे प्रचंड बहुमत से जीत कर सत्ता में आए हैं। कुल 56 विधायकों के समर्थन से वे मुख्यमंत्री बने हैं। यदि यह सीट वे हार भी गए तो सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता दिखता, लेकिन सत्ता में आने के दस-ग्यारह महीने के अंदर हुए इस उपचुनाव में यदि वे हार जाते हैं तो भाजपा को यह कहने का मौका मिल जायेगा कि वे आदिवासियों के भीतर अपने जनाधार को खो रहे हैं।
हेमंत सोरेन व चंपई सोरेन इधर लगातार ऐसे मुद्दे भाजपा की मदद से कुछ सामाजिक संगठन और सत्तापक्ष के भीतर के ही कुछ नेता राज्य में चलाते रहे हैं जिनमें आदिवासी जनता हेमंत सोरेन के खिलाफ खड़ी दिखाई देती है। चाहे वह सीरम टोला के फ्लाई ओवर का मामला हो या नगड़ी की खेतिहर आदिवासी जमीन पर रिम्स-टू के निर्माण का मामला हो या फिर पेसा कानून को राज्य में लागू करने के लिए होने वाले आंदोलन हों। इसलिए घाटशिला उपचुनाव में जीत दर्ज करना हेमंत सोरेन के लिए बेहद जरूरी है।
जयराम ने मुकाबले को रोचक बनाया
इसी तरह यह उपचुनाव दो कुड़मी नेताओं– जयराम महतो और सुदेश महतो के लिए भी प्रतिष्ठा की लड़ाई है। सुदेश की ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) तो एनडीए की ही घटक है, लेकिन झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के नेता जयराम महतो ने यहां अपना प्रत्याशी दिया है।
करीबन ढ़ाई लाख वोटरों वाले इस क्षेत्र में कुड़मी/कुर्मी वोटरों की संख्या ज्यादा नहीं, करीबन 20-22 हजार के करीब है। लेकिन पिछले चुनाव में महज 22 हजार वोटों के अंतर से रामदास सोरेन जीते थे। उस वक्त हेमंत जेल से जननायक की तरह बाहर आए थे और उनकी लोकप्रियता बुलंदी पर थी। इस वक्त ऐसी स्थिति नहीं, इसलिए ये कुड़मी वोट महत्वपूर्ण हैं।
जयराम की कोशिश यह होगी कि यह उनके प्रत्याशी को मिले, जबकि सुदेश चाहेंगे कि ज्यादा से ज्यादा वे भाजपा की तरफ ले जाएं और वे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को दिखा पाएं कि कुड़मी वोटरों पर उनकी ही पकड़ बनी हुई है। फिर भले ही पिछले चुनाव में जयराम महज एक सीट पर जीत कर भी यह दिखाने में कामयाब रहे थे कि सुदेश की पकड़ कुड़मी वोटरों पर नहीं रही। तो, अपनी-अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई में जनता के मुद्दे किसे याद रहे।
दोनों तरफ है वंशवाद
भाजपा के पास एक मुद्दा यह था कि वह झामुमो के वंशवाद पर आक्रमण करती, लेकिन चंपई के पुत्र को मैदान में उतार कर उसने यह कहने का नैतिक आधार खो दिया है कि झामुमो वंशवाद की पोषक है। हेमंत चुनाव में आदिवासियत की दुहाई दे रहे हैं और जल, जंगल, जमीन के कस्टोडियन खुद को बता रहे हैं, लेकिन लोगों को इस पर कितना यकीन आएगा, यह कहना मुश्किल है।
नगड़ी के ट्राइबल लैंड पर रिम्स-टू बनाने की उनकी जिद, पेसा कानून को लागू करने में उनकी विफलता, सारंडा वन क्षेत्र में खनन चलते रहने के पक्ष में कोर्ट में दी गयी उनकी दलीलें, माइनिंग टूरिज्म और शराब को गांव-गांव तक पहुंचाने की उनकी योजनाओं को विकास योजनाएं कहना कठिन लगता है। हां, वे घाटशिला को ‘एजूकेशन हब’ बनाने की भी बात करते हैं। लेकिन यह हवाई बातें हैं।
जिस सूबे में बुनियादी शिक्षा और स्कूली शिक्षा बदहाल हो, वहां एजुकेशन हब का अर्थ शिक्षा माफिया को बढ़ावा देना है। घाटशिला प्राकृतिक सुषमा की दृष्टि से मनोरम क्षेत्र है। साथ ही यहां की खनिज संपदा भी महत्वपूर्ण है। यूरेनियम के खदान इसी विधानसभा क्षेत्र में पड़ते हैं।
राष्ट्र के लिए यूरेनियम खदान महत्वपूर्ण है, लेकिन ये आदिवासी जनता के लिए अभिशाप बन चुके हैं। यूरेनियम खदानों से विकिरण होता है और वह मानव शरीर को तो प्रभावित करता ही, वंशानुगत प्रभाव भी डालता है। बच्चों के विकलांग होने की खबरें आती रहती हैं।
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा होती रही है। लेकिन न राज्य सरकार को चिंता है, न केंद्र सरकार को। इसकी भयावहता कितनी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां की खदानों से निकला यूरेनियम अयस्क हैदराबाद ले जाया जाता है, वहां उसे परिष्कृत कर यूरेनियम निकाल लिया जाता है और कचरा वापस लाकर इसी इलाके में डंप किया जाता है, क्योंकि वहां की सरकार इस बात के लिए रजामंद नहीं कि यूरेनियम का कचरा यहां डंप हो।
आसपास की खेती योग्य जमीन का विनाश हो रहा है और यहां से काम की तलाश में लोग दक्षिण भारत की तरफ जाते हैं। उनमें से कुछ की मौत प्रवास में ही हो जाती है और वर्ष में तीन-चार ऐसे अभागों का शव तो यहां आता ही आता है। यूरेनियम खदानों में काम करना जोखिम भरा है, लेकिन वहां काम करने वालों को ठीक मजदूरी नहीं मिलती। स्थाई काम होते भी नियमित नौकरी नहीं, ठेकेदारों के रहमो करम पर उन्हें छोड़ दिया गया है।
सुवर्णरेखा नदी के किनारे एक कारखाना था जहां हजारो लोगों को रोजगार मिला हुआ था। नाम है हिंदुस्तान काॅपर लिमिटेड। अब मरणासन्न है। करीब सौ-डेढ़ सौ लोग काम करते हैं। कोई सुध लेने वाला नहीं।
गुड़ाबांध प्रखंड नक्सल प्रभावित क्षेत्र था। नक्सल आंदोलन खत्म हो चला, यह अच्छी ही बात है। लेकिन पत्थर, बालू की अवैध लूट जारी है। उस क्षेत्र के मेरे साथी मदन मोहन बताते हैं कि रात में हाइवा ट्रकों को रेंगते आप वहां देख सकते हैं। पहाड़ों-चट्टानों से पन्ना, नीलम जैसे बेशकीमती पत्थर निकलते हैं। कुछ लोग सुनियोजित कारोबार में लगे हैं, लेकिन यदि कोई गरीब आदिवासी उस तरह का पत्थर बेचते दिख गया तो उसे पकड़ कर जेल भेज दिया जाता है।
लेकिन चलिए, सवाल आदिवासी अस्मिता और आदिवासी वोटों पर आदिवासी नेताओं की दावेदारी का है। अब इनके सामने तो मुद्दे गौण रहेंगे ही! झामुमो सहानुभूति लहर पर सवार हो कर अपनी जीत सुनिश्चित मान कर चल रही है, लेकिन लड़ाई आसान नहीं है। भाजपा ने अपनी पूरी ताकत यहां झोंक दी है।
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