हरिगोविंद विश्वकर्मा
लालकृष्ण आडवाणी का जन्मदिन बीते चार दिन हो गए, पर देश को पता ही नहीं चला। ग़ुमनामी में ही चला गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोटो शेयर न किया होता तो किसी को भी पता न चलता। इसी को वक़्त कहते हैं और हर आदमी को यह दिमाग में रखना चाहिए कि दुनिया में सिकंदर कोई नहीं बस वक़्त सिकंदर होता है.
1980, 1990 और 2000 के दशक तक उनकी तूती बोलती थी। भारतीय जनता पार्टी का हर छोटा-बड़ा नेता उन्हें जन्मदिन की बधाई देता था। फिलहाल वह अपने जीवन के अंतिम दौर में है, लेकिन पूर्ण स्वस्थ हैं।
कल्पना कीजिए, अगर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथयात्रा का आयोजन न किया होता और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उन्हें गिरफ़्तार न किया होता, तो देश में न तो हिंदू-मुस्लिम का पॉलिटिक्स शुरू होती और न ही देश का सांप्रदायिक आधार पर इस तरह ध्रुवीकरण होता, जो आज हुआ है। तब शायद भाजपा सत्तासुख भी न भोग रही होती। लेकिन आडवाणी की रथयात्रा ने भाजपा की लोकसभा में ताक़त को 1984 के 2 से 1991 में 120, 1996 में 161 और 1999 में 182 कर दिया।
आडवाणी ने देश के पॉलिटिकल लैंडस्केप ही बदल दिया
आडवाणी ने देश के पॉलिटिकल लैंडस्केप ही बदल दिया। भाजपा का विस्तार केवल और केवल आडवाणी के कारण हुआ था, इसके बावजूद उन्होंने अपने सीनियर वाजपेयी का हमेशा सम्मान किया और ख़ुद नंबर दो ही बने रहे।
2002 के गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे आरोप लगने लगे थे। विपक्ष ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी भी नाराज़ थे। उन्होंने गोवा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कहा, “राजधर्म यही है कि शासक सभी प्रजाजनों के साथ समान व्यवहार करे।” इस बयान के बाद मोदी की कुर्सी ख़तरे में थी। लेकिन तब आडवाणी ने खुलकर मोदी का बचाव किया और मोदी को राजनीतिक जीवनदान दिया।
आडवाणी संकट की घड़ी में मोदी के लिए रक्षाकवच साबित हुए
अगर उस समय आडवाणी का संरक्षण नहीं मिला होता, तो शायद मोदी का राजनीतिक सफर वहीं समाप्त हो जाता। इस तरह, आडवाणी संकट की घड़ी में मोदी के लिए रक्षाकवच साबित हुए।
यही वह क्षण था जब नरेंद्र मोदी ने ख़ुद को न केवल संभाला बल्कि अपनी राजनीतिक रणनीति को और मज़बूत किया। वाजपेयी की उपस्थिति के बावजूद आडवाणी सबसे बड़े नेता थे।
वाजपेयी की सेहत ठीक नहीं थी, लिहाज़ा, 29 जून 2002 को आडवाणी उपप्रधानमंत्री बनाए गए। वह भारत के इतिहास में 13वें उपप्रधानमंत्री थे। उस समय भी वह प्रधानमंत्री बन सकते थे, क्योंकि वाजपेयी पर अल्जाइमर का असर होने वाला था, लेकिन उन्होंने वरिष्ठता क्रम की मर्यादा को बनाए रखा। सिंतबर 2013 से देश में मोदीयुग शुरू हुआ। भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार हुआ और पार्टी को संसद के दोनों सदनों में स्पष्ट बहुमत मिल गया।
आडवाणी व 75 प्लस नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डंप कर दिया गया
उस समय अधिकतर लोगों की भावना थी कि भाजपा की नींव की ईंट रहे आडवाणी प्रधानमंत्री नहीं बन सके, तो उन्हें राष्ट्रपति बनाकर वैसे ही सम्मानित किया जाए, जैसे कांग्रेस ने प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाकर सम्मानित किया था। लेकिन मोदी युग में भाजपा में मार्गदर्शक मंडल बना दिया गया।
आडवाणी और 75 प्लस नेताओं को उसमें डंप कर दिया गया। मज़ेदार बात यह रही कि मार्गदर्शक मंडल 18 सितंबर 2025 के बाद पंचतत्व में विलीन गया। मोदी को दो-दो बार राष्ट्रपति बनाने का अवसर मिला, लेकिन एक बार भी उन्होंने अपने गुरु के नाम पर विचार नहीं किया। इस तरह आडवाणी का नाम देश के इतिहास पटल पर आने से वंचित रह गया, क्योंकि इतिहास उन्हीं को याद करता है जो शीर्ष पद संभालते हैं।
मोदी की राजनीतिक यात्रा में आडवाणी का कितना योगदान रहा। इस पर भी नज़र डालना ज़रूरी है। 1996 में मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल और शंकरसिंह वाघेला की लड़ाई के बाद मोदी को गुजरात के बाहर वनवास पर भेज दिया गया। वह पांच साल से ज़्यादा समय तक अपने गृह राज्य से बाहर रहे।
26 जनवरी 2001 के दिन ही गुजरात में महाविनाशकारी भूकंप आया 20 हज़ार से ज़्यादा लोगों को लील गया। पुनर्वास के कार्य में केशुभाई ने शिथिलता बरती। लिहाज़ा, असंतोष भड़कने लगा था। तब वनवास पर चल रहे मोदी को गुजरात भेजने का फ़ैसला आडवाणी ने लिया। केशुभाई, सुरेशभाई मेहता और राजेंद्र सिंह राणा ने मोदी का खुलकर विरोध किया। वल्लभभाई कथिरिया और काशीराम राणा भी विरोध कर रहे थे।
ऐसी विपरीत परिस्थिति में आडवाणी एक बार फिर मोदी के समर्थन में खड़े हुए और उनके निर्देश पर भाजपा हाईकमान ने सभी नेताओं को मोदी का समर्थन और सहयोग करने का सख़्त आदेश देकर मोदी की राह आसान कर दी। आडवाणी के आदेश पर ही तत्कालीन वित्तमंत्री वजूभाई वाला ने राजकोट की भाजपा की सेफ सीट मोदी के लिए खाली कर दी। मोदी वहीं से पहला विधानसभा चुनाव जीते।
बहरहाल, गुजरात दंगों के बाद राज्य का ध्रुवीकरण हो गया था और दिसंबर 2002 के चुनाव में भाजपा को फिर स्पष्ट बहुतम मिला और अमित शाह की भी राजनीतिक पारी शुरू हुई। इसके बाद वक़्त ने ग़ज़ब की करवट ली।
विपरीत परिस्थितियों में मोदी को आडवाणी ने गुजरात में सीएम बनाकर राजनीतिक जीवनदान दिया था
वही नरेंद्र मोदी, जिन्हें आडवाणी ने गुजरात में मुख्यमंत्री बनाकर राजनीतिक जीवनदान दिया था, आगे चलकर भाजपा और देश के सबसे शक्तिशाली नेता बने। 2014 में जब मोदी की लहर पूरे देश में छा गई, तब आडवाणी हाशिए पर चले गए। आडवाणी भारतीय राजनीति का वह नाम हैं, जिन्होंने विचार, संगठन और अनुशासन को राजनीति का मूल बनाया। उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का साधन मानते हैं। बाद के वर्षों में यह चर्चा भी चली कि उन्हें राष्ट्रपति बनाया जा सकता है, लेकिन मोदी सरकार ने उन्हें उस सम्मान से भी दूर रखा।
आडवाणी ने ज़िंदगी में पार्टी, संगठन और विचार के लिए सब कुछ दिया, परंतु अंतिम क्षणों में उन्हें वह सम्मान नहीं दिया गया, जिसके वह हक़दार थे। हां, 2024 में ज़रूर आडवाणी को भारत रत्न दे दिया गया।
8 नवंबर 1927 को कराची (अब पाकिस्तान) में कृष्णचंद आडवाणी और ज्ञानदेवी के घर में जन्मे आडवाणी का बचपन और प्रारंभिक शिक्षा पाकिस्तान सिंध प्रांत की राजधानी कराची के सेंट पैट्रिक हाईस्कूल में हुई। 1947 में भारत विभाजन के बाद उनका परिवार मुंबई आ गया और उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से क़ानून की डिग्री प्राप्त की। बचपन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए थे। किशोरावस्था में उन्होंने स्वयंसेवक के रूप में शाखाओं में भाग लेना शुरू किया और प्रचारक के रूप में काम किया। यहीं से उनके राजनीतिक और वैचारिक जीवन की नींव पड़ी।
श्यामा मुखर्जी ने आडवाणी के संगठन कौशल को पहचाना
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आडवाणी के उनके संगठन कौशल को पहचाना। यही वजह है जब 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई, तो आडवाणी ने उसी समय पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने संघ के अनुशासन और संगठन की शैली को राजनीति में लाने का काम किया। 1957 से 1967 तक उन्होंने दिल्ली और राजस्थान में जनसंघ के संगठन को मज़बूत किया। उनकी मेहनत और निष्ठा के कारण वे पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार के रूप में उभरे। 1970 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और जल्द ही संसद में उनका वक्तृत्व कौशल और विचारधारा के प्रति दृढ़ता प्रसिद्ध हो गई।
1975 में जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो आडवाणी को भी जेल में डाल दिया गया, पर उनकी दृढ़ता नहीं टूटी। आपातकाल के बाद 1977 में जब जनता पार्टी बनी, तो जनसंघ का इसमें विलय हुआ। आडवाणी उस सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री बने। इस दौरान उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता बहाल करने और सेंसरशिप ख़त्म करने जैसे ऐतिहासिक क़दम उठाए।
जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद 1980 में भाजपा (BJP) की स्थापना हुई, जिसमें आडवाणी और वाजपेयी मुख्य संस्थापक रहे। वाजपेयी जहां पार्टी का उदार चेहरा थे, वहीं आडवाणी उसकी वैचारिक रीढ़ बने। उन्होंने भाजपा को “गांधीय समाजवाद” से आगे बढ़ाकर “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” की विचारधारा दी।
1986 में जब आडवाणी पार्टी अध्यक्ष बने, तब भाजपा मात्र दो लोकसभा सीटों वाली पार्टी थी। लेकिन उन्होंने संगठन को निचले स्तर तक मज़बूत किया और भाजपा को एक वैचारिक आंदोलन का रूप दिया। आडवाणी के राजनीतिक जीवन की सबसे ऐतिहासिक घटना 1990 की राम रथयात्रा रही।
बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना ने आडवाणी की छवि को विवादास्पद भी बनाया
सोमनाथ से अयोध्या तक की यह यात्रा भारतीय राजनीति में हिंदुत्व के उभार का प्रतीक बनी। उन्होंने “एक मंदिर, एक राष्ट्र” के भाव को जन-जन तक पहुंचाया। इस रथयात्रा ने भाजपा को राष्ट्रीय पहचान दी और पार्टी 1991 के चुनावों में 120 से अधिक सीटों तक पहुंच गई।
हालांकि इस यात्रा के कारण देश में साम्प्रदायिक तनाव भी बढ़ा और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना ने आडवाणी की छवि को विवादास्पद भी बनाया। बावजूद इसके, वे हमेशा कहते रहे कि उनकी राजनीति का उद्देश्य “राम” नहीं, बल्कि “राष्ट्र जागरण” था।
1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो आडवाणी गृहमंत्री के रूप में देश की सुरक्षा नीति के केंद्र में रहे। उन्होंने आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी उपायों और सीमावर्ती रणनीतियों को मजबूत किया। 2001 के संसद हमले और 2002 की परिस्थितियों में उनका प्रशासनिक कौशल सामने आया।
2004 में एनडीए की पराजय के बाद आडवाणी ने आत्ममंथन की प्रक्रिया चलाई और पार्टी को फिर से वैचारिक रूप से एकजुट किया। उन्होंने भाजपा को न केवल एक “विरोधी दल” बल्कि एक “विकल्प” के रूप में प्रस्तुत किया।
आडवाणी का पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में विचार सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। वे व्यक्तिगत रूप से सरल जीवन जीने वाले, लेकिन वैचारिक रूप से अत्यंत दृढ़ व्यक्ति हैं। उन्हें हमेशा एक अनुशासित नेता के रूप में जाना गया।
आरएसएस की कार्यशैली, संगठन का विस्तार और राष्ट्रवाद के विचार को उन्होंने भाजपा की जड़ों में बसाया। उनका वक्तृत्व कला, विचारों की स्पष्टता और संवाद क्षमता इतनी मजबूत रही कि वे भारतीय संसद के सबसे सम्मानित वक्ताओं में गिने गए।
2015 में भारत सरकार ने लालकृष्ण आडवाणी को देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 2024 में उन्हें भारत रत्न की घोषणा मिली, जो उनके सात दशकों के सार्वजनिक जीवन और राष्ट्र के प्रति समर्पण की सर्वोच्च मान्यता थी।
आज भी वे भाजपा के मार्गदर्शक मंडल में हैं और पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं के लिए एक आदर्श के रूप में देखे जाते हैं। आडवाणी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक विचार हैं, जो मानते हैं कि राजनीति राष्ट्रसेवा का माध्यम है। उन्होंने दिखाया कि संगठन और विचारधारा के प्रति निष्ठा किसी भी व्यक्ति को इतिहास में अमर बना सकती है। उनकी यात्रा कराची से दिल्ली तक केवल भौगोलिक नहीं थी, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक थी, जिसने भारत की लोकतांत्रिक राजनीति को नई दिशा दी।
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