नारायण विश्वकर्मा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को लगता है कि वे जो भी कहेंगे वही ब्रह्मवाक्य होगा और लोग उसका अनुसरण करेंगे. ये उनका सबसे बड़ा भ्रम है. लेकिन वे अपने एजेंडे को कभी नहीं छोड़ते. आरएसएस झारखंड में लंबे समय से सरना-सनातन एक है का नारा देते आ रहा है पर, झारखंड में तमाम आदिवासी संगठनों ने इसे सिरे से नकारा है. हालांकि भाजपा के अधिकतर आदिवासी नेता इस मामले में गोलमोल जवाब देकर इसपर बात करने से अक्सर परहेज करते हैं. दरअसल, धार्मिक दृष्टिकोण से सरना धर्मावलंबी आदिवासी और हिन्दू एक नहीं है और यह तथ्य ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक दृष्टि से भी पूरी तरीके से प्रमाणित है.
झारखण्ड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की ने सरना धर्म को धर्म नहीं बल्कि पूजा पद्धति बताने पर भागवत को जमकर लताड़ा. श्री तिर्की ने सवाल उठाया है कि आखिर मोहन भागवत यह तय करनेवाले कौन होते हैं कि सरना आदिवासियों की धार्मिक पहचान है या नहीं. उन्होंने कहा कि इस बयान के सामने आते ही आदिवासी समाज में आक्रोश है. सरना धर्मकोड आदिवासियों की धार्मिक पहचान से जुड़ा मामला है न कि केवल किसी पूजा पद्धति से.

सरना धर्म कोड दिलाने की बात क्यों नहीं करते मोहन भागवत ! : बंधु तिर्की
श्री तिर्की ने माना है कि सरना धर्म कोड आदिवासियों की सबसे बड़ी जरूरत है क्योंकि यह उनकी पहचान और संवैधानिक अधिकार से सीधे जुड़ा हुआ है. सरना हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है और हम इसे हर हाल में लेकर रहेंगे. मोहन भागवत कोई इतने बड़े ज्ञानी या विद्वान नहीं हैं कि आदिवासियों की पहचान पर वे फैसला सुनायें.
उन्होंने कहा कि संघ प्रमुख आदिवासियों के शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के साथ ही हसदेव और सिंगरौली के आदिवासियों के मुद्दे पर क्यों नहीं बोलते? श्री तिर्की ने कहा कि संघ प्रमुख को आदिवासियों की यदि इतनी ही चिंता है तो उन्हें छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल और मध्य प्रदेश के सिंगरौली क्षेत्र के साथ ही असम सहित पूरे देश के आदिवासियों के मुद्दे पर बात करनी चाहिये. जिस प्रकार से हसदेव जंगल को उजाड़ा जा रहा है और आदिवासियों के अधिकारों का सीधा-सीधा हनन हुआ है वह उनपर आघात है.
श्री तिर्की ने कहा कि सरना धर्मकोड के अभाव में आदिवासियों को अन्य धर्म में शामिल किया जाता है जो पूरी तरीके से गलत है. यह उनकी पहचान पर संकट होने के साथ-साथ उनके संवैधानिक अधिकारों पर भी आघात है.
हालांकि रांची के दौरे में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जो बातें अपने समर्थकों के बीच कही है, उनमें कुछ भी नया नहीं, वही घिसा-पिटा तर्क है जिसे आदिवासी समाज हमेशा से नकारता रहा है. ‘सरना-सनातन’ एक होने की बातें, दूसरी सभी धर्मो के प्रति सम्मान करने की सीख. एक तीसरी बात जो उन्होंने कही, वह यह कि आदिवासी जल, जंगल, जमीन का ट्रस्टी है और उसकी सहमति, भागीदारी और जवाबदेही जरूरी है.

भागवत के सुर में सुर मिलाना झारखंड के भाजपाई नेताओं की मजबूरी
भागवत के सरना-सनातन के सुर में सुर मिलाना झारखंड के भाजपाई नेताओं की मजबूरी है. खासकर झारखंड भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं में शुमार बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा और पार्टी में नये-नये शामिल हुए चंपई सोरेन आदिवासी समाज की संस्कृति व धार्मिक भावनाओं को अच्छी तरह से जानने-समझने के बावजूद भागवत के विचारों को प्राथमिकता देते हैं.
मूल रूप से प्रकृति पूजक आदिवासी समाज किसी कीमत पर भागवत को आदिवासी संस्कृति का ज्ञाता नहीं मान सकते. अगर ऐसा होता तो, आदिवासी संगठन उनके विचार पर अपनी मुहर जरूर लगाते. जैसे भागवत का यह कहना कि उनके पूर्वज भी जंगलों में रहा करते थे और खेती किया करते थे.
अब यह तो सामान्य समझ की बात है कि विकसित मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल में सभी जंगल में निवास कर रहे होंगे, लेकिन सभ्यता के विकासक्रम को दौरान नागर सभ्यता की नींव पड़ी और नगर, गांव और जनपद बने और बहुसंख्यक आबादी वहां रहने लगी.
इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार ने भागवत के कथन पर कई तरह के सवाल उटा दिए हैं. कहा कि विकसित मानव सभ्यता की शुरुआत में दो समानांतर सभ्यता और संस्कृति ही बनी. एक समतल क्षेत्र की और दूसरी पहाड़-जंगलों में निवास करने वाले लोगों की. जंगल, पहाड़ों में रहनेवालों ने भी जंगल साफ कर खेत बनाये, लेकिन उतनी ही जितनी की जरूरत थी. वे खेती और वनों पर निर्भर अर्थ व्यवस्था थी. जबकि नागर सभ्यता वालों ने जंगलों का विनाश किया और अभी भी कर रहे हैं. हां, नगर से सटे वन क्षेत्र में ऋषि-मुनियों का आना जाना था. वहां वे आश्रम बना कर रहते थे.
उन्होंने कहा कि ऐसे ही एक आश्रम में प्रतापी राजा दुष्यंत चोर की तरह घुसे थे और शकुंतला को गर्भवती बना कर भाग गये थे और जब शकुंतला ने उनके दरबार में जाकर गुहार लगायी कि उनके पेट में पल रहा बच्चा उनका है, तो उन्होंने इंकार कर सभा से निकाल दिया था. वहीं विश्वामित्र अपने रक्षार्थ अयोध्या के राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को मांग कर लाये थे, ताकि वे उनके आश्रम की रक्षा उन आदिवासियों से करें जिन्हें वे राक्षस, दानव आदि कह कर पुकारते थे.

सरना और सनातन को मानने वाले एक ही हैं तो आदिवासी उनकी वर्ण व्यवस्था में शामिल क्यों नहीं हैं ? : विनोद कुमार
उन्होंने कहा कि भागवत को यह भी बताना चाहिए कि यदि सरना और सनातन को मानने वाले एक ही हैं तो आदिवासी उनकी वर्ण व्यवस्था में शामिल क्यों नहीं हैं?
सनातन को माननेवालों ने पूरे देश में भव्य मंदिरों का निर्माण किया और अब भी कर रहे हैं जहां उनके देवता रहते हैं और जो संविधान में बराबरी का दर्जा दिये जाने के बावजूद शूद्रों के लिए निषेध का क्षेत्र है, वहीं सरना धर्मावलंबियों ने या कहिये आदिवासियों ने तो कभी मंदिर नहीं बनाये, प्रकृति के साहचर्य में रहे और साल वृक्षों के नीचे प्रकृति पूजा की.
भागवत को यह भी बताना चाहिए कि यदि आदिवासियों से उन्हें इतना ही प्रेम था तो पूरे हिंदू वांगमय में वे दस्यू, राक्षस, निशाचर, वानर, अनार्य कह कर किसे संबोधित किया गया है?
अब उनकी दूसरी बात पर भी यानी सभी धर्मों और धर्मावलंबियों के प्रति प्रेम और आदर रखने की बात करें. क्योंकि वे तो मंचों से मीठे वचन बोलते हैं और पूरी राजनीति अल्पसंख्यकों के प्रति, दूसरे धर्मों के प्रति घृणा और वैमनस्य पर ही टिकी है.
मुसलमान तो उनके चिर शत्रु हैं. गोकशी के नाम पर उनकी हत्या होती है, सरेआम लिंचिंग की घटनाएं होती हैं, चर्चों में घुस कर बजरंगी तोड़-फोड़ और तांडव करते हैं. ओडिशा में ग्राहम स्टेन को परिवार सहित जला दिया जाता है. हाल में एक पादरी को पीटा गया, घसीटा गया और मुंह में गोबर ठूंस दिया गया. यही है दूसरे धर्मों के प्रति प्रेम और आदर प्रगट करने का तरीका?
भागवत का आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन का ट्रस्टी बताना नया षडयंत्र
दरअसल, भागवत का आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन का ट्रस्टी बताना एक तरह का नया षडयंत्र है. आदिवासी ट्रस्टी नहीं, जल, जंगल, जमीन पर अपना नैसर्गिक अधिकार मानते हैं. वैसे यह पूंजीवादी व्यवस्था जिसमें व्यक्तिगत संपत्ति सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है. यह अलग बात कि समाज का प्रभुवर्ग आदिवासियों से जबरन छीन कर उन्हें विस्थापन का दंश देता रहा है. उसके गांव, उसके मसना, जाहेरथान को बड़े-बड़े बांधों में डुबोता रहा है.
आदिवासी संघ के झांसे में आनेवाला नहीं
एक आदिवासी संगठन के प्रमुख ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि मोहन भागवत के विचारों का हमपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. वे पहले सरना धर्म कोड देने की मांग का समर्थन करें और इसके लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएं, लेकिन वे ऐसा कर ही नहीं सकते, क्योंकि भाजपाई नहीं चाहते.
उनका कहना है कि अगर हमें जंगल का दावेदार माना जाता है तो इसकी सुरक्षा के लिए पहले कठोर कानून बने और उसपर अमल हो. मुझे मालूम है कि भागवत जी कुछ नहीं कर सकते हैं, तो फिर हमें अपने हाल पर रहने दें. वे रांची में आदिवासी भाजपाई नेताओं से मिलें, उन्हें लेक्चर दें…खाएं-पीएं और चले जाएं. अब आदिवासी समाज उनके झांसे में आनेवाला नहीं है. सभी आदिवासी नेता हमें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं. लेकिन अब आदिवासी वोटर उससे छिटक चुके हैं.
इसका परिणाम पिछले विधानसभा चुनाव में दिख चुका है. उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि संतालपरगना में घुसपैठिए का नरेटिव बनाकर चुनाव जीतने की कोशिश में भाजपा के धुरंधर नेताओं का समूह मुंह की खा चुके हैं. उन्हें घुसपैठिया दिखता है पर आदिवासी समुदाय की परेशानी नहीं.
जानिए…आखिर क्यों धर्मांतरण के लिए मजबूर होते हैं आदिवासी?
संघ को शुरू से धर्मांतरण पर कड़ा एतराज रहा है पर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि आखिर उनकी मजबूरी क्या है? कभी सुना नहीं गया कि संघ की टीम कभी दूर-दराज के गांवों में जाकर आदिवासियों का हालचाल लेती है. आदिवासियों के बीच सदियों से कुपोषण, अशिक्षा, अंधविश्वास जैसी कुरीतियां जड़ जमा चुकी हैं. इसे जानने-समझने की कभी कोशिश नहीं की जाती.
दुखद तो यह है कि स्थानीय प्रतिनिधियों से लेकर विधायक-सांसद तक आदिवासी समाज के बीच नहीं पहुंचते. ये लोग सिर्फ चुनाव के समय यहां पहुंचते हैं और आश्वासन का टोकरा थमाकर चल देते हैं.
दूसरी तरफ देश-विदेश की ईसाई मिशनरियां आदिवासियों के बीच पहुंचते हैं और उनकी सुध लेते हैं. उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन शैली में बदलाव लाने की कोशिश में लगे रहते हैं. उनकी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर देते हैं इससे प्रभावित होकर वे सरना से ईसाई धर्म अपना लेते हैं.
‘जहां रोजी-रोटी का जुगाड़ हो जाए, वहां धर्म क्या चीज है ?’
आदिवासी समाज का पढ़ा-लिखा एक युवक बताता है कि हमें ईसाई धर्म अपनाने से अगर रोजी-रोटी और सम्मान से जीने का हक मिल जाता है तो धर्म बदलने में क्या हर्ज है. लेकिन जबरन धर्मांतरण का आरोप बेेेेेेेेबुनियाद है. जबरन धर्मांतरण का कानून जरूर बना हुआ है, लेकिन अभी तक एक भी केस पुलिस के सामने क्यों नहीं आया? क्योंकि लोग स्वेच्छा से इसलिए ईसाई धर्म अपनाते हैं कि उनके जीवन में आमूलचूल बदलाव लाने में ईसाई मिशनरियों की बहुत बड़ी भूमिका होती है.
इसके उलट संघ प्रचारक शहरों में सिमटे रहते हैं और किसी होटल में आदिवासी नेताओं को बुलाकर लेक्चर देते हैं और चले जाते हैं. ये सिलसिला कई दशकों से कायम है. कभी टीम बनाकर आदिवासी समाज के बीच पहुंचने की परंपरा संघ की नहीं रही है, जबकि परंपराओं का ढोल खूब पीटा जाता है.
उस युवक ने यह भी बताया कि आप देखते होंगे कि जो भी सरना आदिवासी परिवार ईसाई धर्म अपनाया उसकी तकदीर बदल जाती है और उसके खपड़े के घर पक्के में बदल जाते हैं. हिंदू धर्म या संघ की विचारधारा अपनाने से हमारी बेकारी-भुखमरी या नारकीय जीवन में कोई बदलाव नहीं आ सकता.
यह सच है कि सरना धर्म माननेवाले अधिकतर आदिवासी हिंदू धर्म में अपनी आस्था नहीं रखते. अब तो भागवत के विचारों का लोग मखौल उड़ाते हैं. संघ देश के ज्वलंत मुद्दे पर चुप्पी साध लेता हैं. अभी हाल में भागवत ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरा नंद के मामले में एक शब्द नहीं बोला. न विरोध किया और न समर्थन, जबकि वे हिंदू धर्म के बहुत बड़े पैरोकार माने जाते हैं. फिर उनके विचारों से आदिवासी समाज क्यों प्रभावित होगा? ये यक्ष प्रश्न है.
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