26.8 C
Ranchi
Saturday, March 7, 2026
Advertisement
HomeNationalगरीब का बेटा है...ट्रंप के लिए कुछ भी करेगा...पर दिल से करेगा...!

गरीब का बेटा है…ट्रंप के लिए कुछ भी करेगा…पर दिल से करेगा…!

फंस गया बेचारा, गरीब का बेटा, चारों तरफ़ से बल्कि ऊपर और नीचे से भी! जब भी संकट आता है, गरीब के इस बेटे पर ही आता है, जो बेचारा इतना गरीब है, इतना ज्यादा गरीब है कि दिन में बारह बार की बजाय छह बार ही कपड़े बदल पाता है! गरीबी है ही ऐसी भयंकर चीज और आखिर गरीब के बेटे की गरीबी है तो फिर अकल्पनीय तो होगी ही!

पहले ट्रंप ने गरीब के इस बेटे को ‘माई डियर फ्रेंड’, ‘माय ग्रेटेस्ट फ्रेंड’ कहकर खूब छकाया। बार-बार उल्लू बनाया। हर तरफ से इसे फींचा। पचास से ज्यादा बार कहा कि व्यापार का लालच देकर मैंने भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई रुकवाई है। गरीब का बेटा, बेचारा इतना गरीब है, इतना अधिक गरीब है कि इससे इनकार नहीं कर पाया, जवाब नहीं दे पाया, क्योंकि इसके मुंह में उस समय चालीस हजार रुपए किलो का मशरूम भरा हुआ था।

कभी ऐसा भी हुआ कि जब वह मोरिंगा (सहजन) के पराठे खा रहा था, तब ट्रंप ने ऐसी बेहूदा बात कही! पराठे खाता या जवाब देता! वैसे भी झूठा, झूठे को कैसे कहता कि तू झूठा है और कहता तो मानता भी कौन, इसलिए वह पराठे और अचार का स्वाद लेता रहा! कभी वह सबसे महंगा मियाज़ाकी आम चूस रहा था, तब ट्रंप ने ऐसा कहा।

इस आम को चूसने का आनंद ही और है! उसे चूसना छोड़कर डंकेवाला ऐसे लफड़े में क्यों पड़ता! आम की बेकद्री क्यों करता, आम की बेइज्ज़ती देश की बेइज्ज़ती होती, भारतीय संस्कृति की यानी हिंदू संस्कृति की बेकद्री होती! गरीब के बेटे ने ट्रंप को जवाब न देकर आम चूस कर खाना बेहतर समझा! बेशक आम का रस उसके कुर्ते टपकता रहा मगर इससे क्या! वह चूसता रहा, चूसता रहा, चूसते-चूसते बोला नहीं जाता! कहा नहीं‌ जाता कुछ! बिलकुल नहीं! सच में भी नहीं! ज़बान स्वाद लेने में रम गई तो रम गई!

ट्रंप की बदतमीजी खूब रास आई

कभी ऐसा भी हुआ कि ट्रंप ने जब बदतमीजी की, तब वह पांचवीं ड्रेस बदल रहा था! गरीब का बच्चा है तो पूरा का पूरा संस्कारी! कपड़े बदलना छोड़कर जवाब कैसे देता? फिर ट्रंप उम्र में उससे बड़ा भी है, अमीर भी है, अमीर देश का राष्ट्रपति भी है! भारतीय संस्कृति कहती है कि अपने बुजुर्ग कुछ भी कहे पलटकर जवाब नहीं दिया जाता! इसलिए गरीब के बेटे ने उत्तर नहीं दिया! इस तरह संस्कृति की लाज रखी!

पहले तो ट्रंप ने टैरिफ पर भी महीनों तंग किया

फिर उसी ट्रंप ने टैरिफ पर भी महीनों तंग किया। गज़ब ही किया भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया! गरीब का बेटा, बेचारा तब भी बोल नहीं पाया क्योंकि वह उस समय योग का भोग कर रहा था! ट्रंप की तरह वह खाली नहीं बैठा था, जो सुबह-शाम बोलता ही रहता है क्योंकि वह न आम चूस कर खाता है, न काट कर खाना जानता है। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद! गरीब का बेटा है, इसलिए स्वाद का महत्व जानता है!

वह चुप रहा। इधर-उधर देखता-झांकता रहा, जिधर देखना था, उधर उसने जानबूझकर नहीं देखा। जिधर मुंह खोलना था, उधर नहीं खोला, विपरीत दिशा में खोला। ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के अवसर पर आंय-बांय-शांय बोलने के लिए खोला- वह भी टेलीप्रॉंम्प्टर सामने रखकर! सुनते हैं कि वह जब कभी ट्रंप से बात करता है तो भी टेलीप्रॉम्पटर सामने ही रखकर करता है। अब तो गरीब के बेटे का टेलीप्रॉंप्टर इतना होशियार हो गया है कि वह खुद ही गरीब के बेटे की ओर से जवाब दे देता है!

ट्रंप के आने से पहले जो टैरिफ साढ़े तीन से घटकर 2.93 फीसदी रह गया था, उसे 18 प्रतिशत करवाकर इसने अपने वजन से भी मोटी फूलमाला पहनीं। ताली बजवाई। अपनों से मनवाया कि देखा, मैं था तो मामला 18 प्रतिशत पर निबट गया! कोई और होता तो उसकी टें बोल जाती! उसने यह छुपाया कि भारत से 18 प्रतिशत टैरिफ वसूल करनेवाला ट्रंप गरीब के बेटे से यह कबूल करवा चुका है कि उसके देश के माल पर वह एक प्रतिशत भी टैरिफ नहीं देगा और यह वायदा भी ले लिया कि भारत, रूस से तेल नहीं खरीदेगा, अमेरिका से ही खरीदेगा! गरीब का बेटा इधर -उधर करने की कोशिश करेगा, दायें-बांये करवट लेने की कोशिश करेगा, तो ट्रंपवा बारह बजाना भी जानता है, जबकि गरीब का बेटा ग्यारह तक बजवाने को तैयार है। ज़्यादा मजबूरी हो तो वह साढ़े ग्यारह भी बजवा सकता है मगर वह बारह बजवाने से बचना चाहता है मगर क्या करे, आखिर वह है तो गरीब का ही बेटा! ट्रंप बारह बजाएगा तो बारह बजवा लेगा!

इस बीच गरीब का बेटा जमीन पर औंधी पड़ी अपनी इमेज को उठाने की कोशिश करता रहा। इमेज उठ पाती, इससे पहले ही उसका नाम एपस्टीन फाइल में आ गया। मौज-मजे की दुनिया के सरदार के साथ उसका नाम जुड़ गया। विदेशी के साथ कई देसी ऐपस्टीन फाइलें भी सोशल मीडिया पर खुलने लगीं।

इधर एपस्टीन तो, संंसद में नरवणे किताब ने परेशान किया

इधर ये फ़ाइलें खुली पड़ी थीं, उधर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवाणे की किताब का अंश सामने आ गया, जिससे पता चला कि जब देश की सीमा की तरफ चीनी सेना बढ़ती आ रही थी, तब गरीब के बेटे की गरीबी इतनी बढ़ गई थी कि उसे समझ में नहीं आया कि मुकाबला करने को कहे या कहे कि छोड़ो यार अपना पड़ोसी है, कुछ जमीन कब्जा भी ले तो क्या फर्क पड़ता है! संसद में इस पर सवाल उठे तो रक्षामंत्री और गृहमंत्री पूछते पाये गए कि वह किताब है कहां, किताब है कहां, जिसमें यह सब लिखा है!

गरीब के बेटे को पता नहीं था कि यह किताब तब आनलाइन बिक रही थी! अगले दिन किताब संसद में और संसद से बाहर भी सामने आ गई! गरीब का बेटा फिर फंस गया। इतना परेशान हो गया कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए लोकसभा में आने से डर गया कि कहीं वह किताब उसे न थमा दी जाए! लोगों ने उसे कायर कहा, भगोड़ा कहा. मगर वह भागने से नहीं डरा! निर्भय होकर भागा! गरीब के बेटे को अमीर के बेटे ने फंसा दिया था।

फिर यूजीसी मामले में स्वर्णभक्त नाराज हुए 

उधर यूजीसी वाले मामले में गरीब के बेटे की सुबह शाम-आरती उतारने वाले सवर्ण भक्त उससे नाराज़ हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश की मगर गरीब के बेटे से वे फिर भी खुश नहीं हुए! सारा किये-धरे पर पानी फिर गया। उधर गरीब के बेटे के अमीर दोस्त अडानी पर धोखाधड़ी का जो मामला अमेरिका में सुस्त पड़ा था, वह गरमा गया।

गरीब के किसी बेटे ने एक साथ इतनी मुसीबतें कभी न सुनी होंगी, न झेली होंगी। उसका सब गुड़ गोबर हुआ जा रहा है। जिन रामलला को गरीब का बेटा ऊंगली पकड़कर राम मंदिर लाया था, जिसने इतना महान काम पांच सौ साल बाद किया था, वे रामलला भी उसके काम नहीं आए।

केदारनाथ और कन्याकुमारी में कैमरे की गवाही में की गई तपस्या भी काम नहीं आई। तपस्या में कमी आखिर रह गई! जिसने करोड़ों फूंक कर देवता समान अपनी छवि बनाई थी, वह काम न आई।

आईटी सेल का पसीना बहाना भी काम नहीं आया!

गोदी मीडिया की गोद में भी आराम नहीं मिला! चित्र-विचित्र वेष में मंदिर-मंदिर जाने से पुण्य की इतनी कमाई नहीं हुई! रंग-बिरंगे साफे पहनना भी काम न आया! गली-गली में गुंडे छोड़ना भी काम न आया! झूठ बोलो, बार बार झूठ बोलो, ज़ोर-ज़ोर से झूठ बोलो, जिस भी विषय पर झूठ बोल सको, बोलो, कांग्रेस को कहे, गरीब के बेटे के ये सुवचन भी काम न आए! पौने बारह साल में दस हजार बार स्व मुखारविंद से झूठ दर झूठ बोलना भी काम नहीं आया!

चौकीदारी भी काम नहीं आई। अडानी-अंबानी का साया भी काम न आया। यहां तक कि नान बायोलॉजिकल होना भी काम न आया! व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के एम ए, पीएचडी भी काम नहीं आए! आईटी सेल काम नहीं आया! गुजरात के नरसंहार के अपराधियों को जज बदलकर बचाना काम न आया! हिंदू हृदय सम्राट होना तक काम न आया!

उधर, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल के चुनाव सर पर हैं और इधर शिराजा बिखर रहा है। अब चुनाव आयोग का, एसआईआर का भरोसा है। सीबीआई-ईडी भी कितने काम आ पाएगी, मालूम नहीं। हिंदू मुस्लिम भी लगता है काम नहीं आएगा! वंदे मातरम कितना काम आता है, यह देखना बाकी है। झोला तैयार है, शायद उसे उठाकर चल देना काम आ जाए!

-विष्णु नागर के वाल से साभार


Discover more from Jharkhand Weekly - Leading News Portal

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments

Discover more from Jharkhand Weekly - Leading News Portal

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading