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Wednesday, June 10, 2026
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बिहार के दो महान समाजवादियों ने अपने पुत्रों को पैराशूट ड्रॉपिंग करा कर अपनी सारी राजनीतिक पूंजी की आहुति दे दी

पटना : उपेंद्र कुशवाहा को यह यकीन था कि सम्राट चौधरी भले चाहे कुछ भी हो जाएं, बिहार के कुशवाहा उन्हें ही अपना नेता मानेंगे। लेकिन अभी जब विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए की ओर से उनके बेटे दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया गया तब यह साफ हो गया कि भाजपा केवल सम्राट चौधरी को कुशवाहों का नेता बनाना चाहती है। उनकी राह में आने वाले उपेंद्र कुशवाहा जैसे खर-पतवारों को दूर करने के लिए ही भाजपा ने उनके बेटे को बेटिकट कर दिया है।

पिछले कुछ साल से उपेंद्र की राजनीति पूरी तरह बीजेपी की कृपा पर टिकी है। बीजेपी ने लोकसभा का टिकट दिया, उन्हें राज्यसभा भेजा। विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को सीटें दी। बेटे को दो बार मंत्री बनाया। अब वे चाहते थे कि उनके बेटे को विधान परिषद भेजा जाए, ताकि दीपक की कुर्सी सलामत रहे। बीजेपी ने इस बार उनकी इस ख्वाहिश को लगभग ठुकरा दिया है। अब वे नीतीश और निशांत को न्याय दिलाने की बात कर रहे हैं।

मंत्री बनने के बाद दीपक प्रकाश ने अपने लिए एक बेहतरीन सोशल मीडिया टीम बनाई और खुद को एक आधुनिक, सक्षम और हाईटेक मंत्री के रूप में प्रचारित कराया। जाति के नाम पर भी कई लोग उनके समर्थन में रहे। मगर उनकी पार्टी के चार में से तीन विधायकों ने एक वक्त पार्टी से नाराजगी दिखाई, चौथी खुद उनकी मां थीं। नाराजगी की एक बड़ी वजह उन्हें मंत्री बनाना था। बाद में राजनीतिक दांवपेंच में दक्ष उनके पिता ने नाराज तीन में से एक विधायक को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी को टूट से बचा लिया।

दीपक के पिता उपेंद्र कुशवाहा राजनीति में विचारों के पोषक माने जाते हैं। सोबर, मुद्दों की बात करने वाले राजनेता। मगर महत्वाकांक्षी और धैर्यहीन। इसलिए कहीं किसी जगह टिके नहीं। थोड़ी स्थितियां विपरीत हुई, विदा हो गए। पार्टियां बदलीं, अपनी पार्टी बनाते रहे। मगर जो उनका सपना था उसे पूरा कर नहीं पाए। कुशवाहा जाति के सिरमौर नेता समझे जाते थे, मगर उनसे कम अनुभवी और कम समझदार सम्राट चौधरी आज सिर्फ इसलिए बिहार के मुख्यमंत्री हैं, क्योंकि उन्हें हड़बड़ी नहीं थी।

अब उपेंद्र नहीं, सम्राट कुशवाहा जाति के नेता 

 बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा के हर परिवारवादी फैसले का अब तक समर्थन किया। एक तरह से उन्हें राजनीतिक रूप से लाचार बना दिया। अब वे तेवर दिखा रहे हैं, मगर उनके पांवों के नीचे कितनी जमीन बची है? अब वे कुशवाहा जाति के नेता भी नहीं। बीजेपी शायद उन्हें विलय करने कह रही है। उपेंद्र कुशवाहा जानते हैं, जिस तरह नीतीश ने राज्यसभा जाकर अपनी राजनीतिक मौत पर खुद हस्ताक्षर किया, उन्हें भी यही करने के लिया मजबूर किया जा रहा है। वैसे भी अब उपेंद्र भाजपा के लिए किसी खास जरूरत के नहीं। मगर इन सबके बीच सवाल राजनीतिक सुचिता का भी है। जिसे उपेंद्र कुशवाहा ने पूरी तरह त्याग दिया है। ऐसे में वे ज्यादा बगावत करेंगे तो एक और आनंद मोहन बनकर रह जाएंगे, जो अपने बेटे के मंत्री न बनने के बाद बागी हुए हैं।

जब नीतीश कुमार ने अपने पुत्र को सीधे मंत्री बनाने में संकोच नहीं किया तो कुशवाहा की क्या बात की जाए? वे सौदेबाजी की राजनीति के अगुवा और परिवारवादी राजनीति के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। कांग्रेस और लालू प्रसाद के दिखाए राह पर ये सभी चल रहे हैं। लालू प्रसाद ने तो बेटों को चुनाव लड़वाकर राजनीति में लाया लेकिन इन दो महान समाजवादियों ने अपने पुत्रों को पैराशूट ड्रॉपिंग करा कर अपनी सारी राजनीतिक पूंजी समाप्त कर दी।

लालू ने संघ को कभी तरजीह नहीं दी,पर नीतीश, उपेंद्र व जीतन उनकी गोद में जा बैठे 

असल में बिहार में दलितों और पिछड़ों की सियासत अब सिद्धांतविहीन हो चुकी है। लालू प्रसाद की राजनीति सामाजिक न्याय के सवालों से दूर होती जा रही है। लेकिन एक बड़ी बात यह है कि लालू प्रसाद आरएसएस की नफरत पर आधारित राजनीति को अभी तक चुनौती दे रहे हैं, उन्होंने अपनी हार नहीं मानी है। यह उन्हें अब भी खास बनाता है।

लेकिन नीतीश कुमार, जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा आदि नेताओं ने सामाजिक न्याय की राजनीति को तिलांजलि बहुत पहले दे दी थी और आरएसएस की गोद में जा बैठे थे। अब उनकी हालत यह है कि वे आरएसएस के पालतू जानवर बन चुके हैं।

जब पहली बार उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को मंत्री बनाया गया था तब उन्होंने यह बात बड़ी साफगोई से कही थी कि उन्हें अपनी पार्टी की चिंता थी, इसलिए अपने बेटे को मंत्री बनाया।

उन्होंने पूर्व के अनुभवों को याद करते हुए कहा था कि पूर्व में कई लोग हुए जो उनकी पार्टी के टिकट पर जीते और पाला बदल लिया। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा ने सारी आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा था कि एक बार नीतीश कुमार ने उनसे कहा था कि आदमी को एक हाथ से भोजन ग्रहण करते रहना चाहिए और दूसरे हाथ से मक्खियों को उड़ाते रहना चाहिए।

लेकिन ऐसा कहते समय उपेंद्र कुशवाहा को इस बात का अंदेशा नहीं था कि भाजपा के मन में क्या चल रहा है। वे तब भी नहीं समझे जब राजद से भाजपा में शामिल हुए सम्राट चौधरी को भाजपा ने अपना सबसे कद्दावर नेता माना। इतना कद्दावर कि भाजपा ने नीतीश कुमार के हाथ से गृह विभाग छीनकर सम्राट चौधरी को दे दिया। सम्राट चौधरी भी कुशवाहा जाति के हैं।

खैर, आज जो उपेंद्र कुशवाहा के साथ भाजपा ने किया है, वह कोई ऐसी बात नहीं है, जिसका अनुमान पूर्व में नहीं लगाया जा रहा था। इसे याद रखा जाना चाहिए कि यदि कोई मजबूत किसी कमजोर को अपने माथे पर बिठाता है तो यूं ही नहीं बिठाता।

भाजपा-आरएसएस के लिए ओबीसी नेता  राजनीतिक टूल के सिवा और कुछ नहीं

बहरहाल, उपेंद्र कुशवाहा के हश्र से दलित और पिछड़े वर्ग के नेताओं को सबक लेना चाहिए। भाजपा और आरएसएस के लिए वे केवल राजनीतिक टूल हैं, ताकि सामाजिक न्याय की राजनीति को कमजोर किया जा सके और ओबीसी को हिंदू बनाया जा सके। देर-सबेर उनका हश्र भी यही होने वाला है जो आज नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा का हुआ है।


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