नारायण विश्वकर्मा
बिहार-झारखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म बनानेवाले प्रख्यात फिल्मकार प्रकाश झा की राजनीति फिल्म का एक संवाद है…राजनीति में मुर्दे गाड़े नहीं जाते, उन्हें जिंदा रखा जाता है ताकि टाइम आने पर वो बोल सकें। झारखंड के परिप्रेक्ष्य में इस संवाद को कुछ यूं बोला जा सकता है…राजनीति में मुद्दे भी जिंदा रखे जाते हैं ताकि टाइम आने पर जनमानस में उसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सके. झारखंड की राजनीति में 20 साल बाद एक बार फिर 1932 के खतियान के मुद्दे को बड़ी चतुराई से उछाला गया है. यहां दिलचस्प बात ये है कि इसी साल विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाने को लेकर कानूनी पेंच में फंसने की बात कही थी. इसके बावजूद इस जटिल मुद्दे को हथियार बनाकर सियासी चाल चल दी गई है.
दिल्ली यात्रा का क्या सबब है?
इधर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दिल्ली के अचानक दौरे पर सत्ता के गलियारे में कानाफूसी शुरू हो चुकी है. 15 सितंबर के घटनाक्रम को तेजी से बदले हैं. पहले राज्यपाल से मुलाकात और फिर उसके बाद दिल्ली की रवानगी. इस मुलाकात के घंटे भर भी नहीं बीते थे कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दिल्ली कूच कर गए. सूत्र बताते हैं कि 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति के मामले को लेकर कांग्रेस सहित दूसरे नेता सकते में हैं. कहा यह भी जा रहा है मंत्रिमंडल में बदलाव हो सकता है या फिर इस नीति के विरोध में कांग्रेस कोटे के कई नेता जो नाराज चल रहे हैं, उनमें से कुछ इस्तीफा भी दे सकते हैं. इस डैमेज को कंट्रोल करना हेमंत सोरेन के लिए टेढ़ी खीर भी साबित हो सकती है.
सीएम क्यों और कैसे पलट गए?
सवाल उठता है कि आखिर क्या कारण था कि 24 मार्च 22 को विधानसभा में बजट सत्र के दौरान हेमंत सोरेन ने कहा था राज्य में खतियान आधारित नियोजन नीति नहीं बनाई जा सकती है. जब भी खतियान आधारित नियोजन नीति बनेगी कोर्ट उसे खारिज कर देगा. सीएम ने कहा कि राज्य में जल्द ही नियोजन नीति बनेगी जो यहां की जनभावनाओं के अनुरूप होगी. इसके बावजूद सीएम अचानक क्यों पलटी मार गए? सरयू राय का कहना कि वर्तमान समय में 1932 का खतियान मांगना उचित नहीं है. पुराने खतियान मांगनेवाले को यह भी सोचना चाहिए कि 1932 का खतियान मांग रहे हैं. उस समय तो झारखंड था ही नहीं. अंग्रेज थे.1932 में यह हिस्सा (झारखंड) ओडिशा था जो 1956 में बंगाल में समाहित हो गया. उसके बाद बिहार में आ गया.
गीता कोड़ा के विरोध के मायने?
कांग्रेस की सांसद गीता कोड़ा और मधु कोड़ा का कहना है कि उन्हें 1932 के खतियान का विरोध नहीं है लेकिन कोल्हान में सर्वे का काम 1964 में हुआ है. यही हाल तो धनबाद बोकारो जमशेदपुर और रांची जिले का है. इन जिलों में बिहार के करीब 75 प्रतिशत लोग बसे हुए हैं. चूंकि इन जिलों में कई सार्वजनिक उपक्रम हैं. इसके कारण विभिन्न प्रांतों के लोग बहुतायत में बसे हुए हैं. उनकी दूसरी युवापीढ़ी की जन्मभूमि और कर्मभूमि यहीं है. वे कहां जाएंगे? झारखंड के ऐसे इलाकों की आबादी ढाई करोड़ से अधिक होगी. वे क्या करेंगे? ये बड़ा सवाल है. सवाल तो ये भी है कि किसी भी सरकार ने डोमिसाइल लागू करने से पूर्व सर्वदलीय बैठक तक नहीं बुलाती. जब सीएम ने विधानसभा में यह कहा कि बहुत जल्द नियोजन नीति बनाई जाएगी. इस नीति में 1932 का खतियान तो नहीं शामिल था. राजनीतिक दलों के अपने वोट बैंक हैं. वे अपना नफा-नुकसान देखकर ही विरोध या समर्थन करेंगे. वैसे जानकारों का मानना है कि झारखंड में नियोजन नीति का एक बार फिर बंटाधार होना तय है.
रघुवर की स्थानीय नीति भी फ्लॉप रही
झारखंड का ये भी दुर्भाग्य है कि 20 साल तक बीजेपी के अलावा, जेएमएम-कांग्रेस-आरजेडी की भी सरकार रही, लेकिन स्थानीय नीति पर कोई फैसला नहीं हो पाया। रघुवर दास ने 1985 को कट ऑफ डेट मान कर नीति बनाई. साल 2014 जब रघुवर दास के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन की सरकार बनी, तो रघुवर सरकार ने 2018 में राज्य की स्थानीयता की नीति घोषित कर दी। जिसमें 1985 के समय से राज्य में रहनेवाले सभी लोगों को स्थानीय माना गया। इस कट ऑफ डेट का जेएमएम समेत अन्य दलों ने विरोध किया। वहीं 2019 में सत्ता में आने पर सीएम हेमंत सोरेन ने इसमें बदलाव का ऐलान कर दिया। हालांकि 1985 के कट ऑफ डेट के बावजूद जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1932 का खतियान मांगा जाता था.

लोबिन हेम्ब्रम का आक्रामक रुख
पिछले पांच सितंबर को विश्वासमत प्रस्ताव के दौरान 1932 के खतियान लागू करने की बात कही थी. अब इस मुद्दे को उभारकर सतह पर ला दिया गया है। झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष रवीन्द्र नाथ महतो ने कहा है कि असली झारखंडी वही है जिसका 1932 के खतियान में नाम है। 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाने को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के भीतर भी काफी दबाव था। मोर्चा के एक वरिष्ठ विधायक लोबिन हेम्ब्रम ने इसे लेकर आक्रामक तेवर अख्तियार कर रखा है। वे इसपर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की खिंचाई से भी बाज नहीं आ रहे थे।
सार्वजनिक उपक्रमों के खुलने से कई जिलों की स्थिति बदली
उल्लेखनीय है कि 1971 में कोयले के राष्ट्रीयकरण के पहले यहां खदानों का निजी मालिक हुआ करते थे। उन्होंने ही यूपी और बिहार से खदानों में काम करने के लिए लोगों को बुलाया, जो यहां बसते चले गए। फिर 1952 में सिंदरी उर्वरक कारखाना शुरू होने के बाद यहां काम करने के लिए बाहरी लोग आए और यहीं बस गए। शहरी क्षेत्रों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है। जमशेदपुर में तो पूरा शहर ही टाटा स्टील का हो जाएगा, क्योंकि 1932 में जमशेदपुर शहर की करीब 24 हजार बीघा जमीन का रैयतदार टाटा स्टील था। अगर 1932 का खतियान लागू हुआ तो शहर की पूरी जमीन का स्वामित्व टाटा स्टील का हो जाएगा। बस संथालपरगना में 1932 के खतियान को आधार नहीं बनाया जा सकेगा, क्योंकि वहां अंतिम सर्वे 1908 में हुआ था। जबकि राज्य के 80 फीसदी क्षेत्रों में 1932 में केडेस्ट्रल सर्वे हुआ था।
विस्थापन व पुनर्वास नीति अभी तक नहीं बनी
1932 के खतियान को आधार बनाने का मतलब यह है कि उस समय जिन लोगों का नाम खतियान में था, वे और उनके वंशज ही स्थानीय कहलाएंगे। उस समय जिनके पास जमीन थी, उसकी हजारों बार खरीद-बिक्री हो चुकी है। उदाहरण के तौर पर 1932 में अगर रांची जिले में 10 हजार रैयत थे तो आज उनकी संख्या एक लाख पार कर गई। अब तो सरकार के पास भी यह आंकड़ा नहीं है कि 1932 में जो जमीन थी, उसके कितने टुकड़े हो चुके हैं। जो लोग वर्षों से झारखंड में रह रहे हैं, लेकिन खतियान में नाम नहीं है, वे कई तरह की सरकारी सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे। मसलन स्थानीय के लिए आरक्षित नौकरी या शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में नौकरी के लिए आवेदन नहीं दे पाएंगे। स्थानीय के लिए शुरू होने वाली योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाएंगे। वैसे इस राज्य का दुर्भाग्य है 22 साल में डोमिसाइल नीति के अलावा सीएनटी एक्ट, विस्थापन नीति और पुनर्वास नीति अभी तक नहीं बन पायी है. इस पर सरकार कब गौर करेगी, ये भी सबसे बड़ा सवाल है.
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