नारायण विश्वकर्मा
गिरिडीह : झारखंड की राजनीति मुख्य रूप से आदिवासी-मूलवासी समुदायों के ईर्द-गिर्द ही घूमती रही है. झारखंड गठन के बाद से ही इन्हीं समुदायों ने लोकसभा या विधानसभा में अधिकतर सांसद-विधायक भेजने का काम किया है. झारखंड में इनके बिना सरकार गठन की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन पहली बार झारखंड के क्षितिज पर एक नये तरीके की राजनीति ने करवट ली है. साल भर के अंदर लोकसभा चुनाव में एक नवोदित राजनीतिक शक्ति के रूप में झारखंडी भाषा खातियानी संघर्ष समिति (जेबीकेएसएस) तेजी से राजनीतिक क्षितिज पर उभरी है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भाजपा, कांग्रेस, झामुमो, आजसू और राजद के लिए जेबीकेएसएस विधानसभा चुनाव में कड़ी चुनौती पेश कर सकती है. इसका अनुमान सभी मुख्य राजनीतिक दलों को भी है. लोकसभा चुनाव में जेबीकेएसएस के सुप्रीमो जयराम महतो टाइगर ने झारखंड में एकदम नये तरीके की राजनीति करने का दंभ भरा है. जिस तरह के वे बयान देते हैं, अगर वाकई में वह धरातल पर उतरा तो, झारखंड की राजनीतिक दिशा और दशा में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है. झारखंड में लोकसभा चुनाव में मुकाबला, दो ध्रुवों एनडीए-इंडिया गठबंधन के बीच होने के बावजूद सभी सबकी नजर जेबीकेएसएस पर टिकी रही. जिन्होंने इस बार राज्य की आठ लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए. जेबीकेएसएस को दल के रूप में अभी मान्यता नहीं मिलने की वजह से उनके प्रत्याशी राज्य की 8 लोकसभा सीट पर निर्दलीय के रूप में लड़ाई को त्रिकोणीय बना कर झारखंड से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक धुरंधरों को चकित जरूर किया है.

दिल्ली की गोद में बैठनेवाले नेताओं पर भरोसा नहीं रहा
दरअसल, आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को कुड़मी महतो जाति का अगुआ माना जा रहा है. आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो ने 2013-14 में झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा देने को लेकर लंबा आंदोलन किया और इसे धार देने के लिए बरही से बहरागोड़ा तक मानव श्रृंखला बनाकर लाखों झारखंडियों में भरोसा भी जगाया था. लेकिन पिछले दस सालों में वे कोई करिश्मा नहीं कर सके. वहीं 2005 में विधानसभा चुनाव में उस समय के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा ने कुर्मी कार्ड के सहारे सत्ता पाने की कोशिश की थी, लेकिन कुड़मी जातियों ने उनपर भरोसा नहीं किया और विधानसभा में खंडित जनादेश मिला. लेकिन जयराम की प्रखर व मुखर राजनीति को देख-समझ कर झारखंडी अवाम की सोच में बदलाव आने के संकेत मिले हैं. जानकार मानते हैं कि दिल्ली की गोद में बैठनेवाले नेताओं से झारखंड का कभी भला नहीं हो सकता. यहां के क्षेत्रीय छत्रप ही झारखंड में लंबी लकीर खींच सकते हैं. जयराम ने अपनी कार्यशैली से झारखंड के एक बड़े वर्ग का ध्यान अपनी तरफ खींचने में जरूर कामयाब रहे हैं. जिस तरह से राज्य की राजनीति में ओबीसी समुदाय की कुड़मी महतो जाति में जयराम महतो और जेबीकेएसएस की पकड़ बढ़ी है, उससे आनेवाले दिनों में उन महतो नेताओं को परेशानी हो सकती है जो, खुद को महतो समाज का अगुआ समझते हैं. दरअसल, जयराम महतो और उनके साथियों ने जिस तरह से अपना परफॉरमेंस दिया है, उससे राज्य के कई दूसरे दलों के दिग्गजों को विधानसभा चुनाव में पसीने छूट सकते हैं.
जयराम ने युवा वर्ग में नई चेतना का संचार किया
राजनीतिक फलक पर तेजी से जेबीकेएसएस के युवातुर्क जयराम महतो, देवेंद्रनाथ महतो, मनोज यादव, संजय मेहता सहित कई युवा नेताओं ने संघर्ष कर युवा वर्ग में नई चेतना का संचार किया है. राज्य में राजनीतिक रूप से बेहद सजग ओबीसी समुदाय कुड़मी महतो के युवाओं के बीच जयराम महतो का काफी क्रेज है. मूल रूप से भोजपुरी-मगही भाषा का विरोध और खतियान आधारित स्थानीय नीति, नियोजन नीति को लेकर जयराम ने छात्र आंदोलन से अपनी पहचान बना चुके हैं. चंद महीनों में उन्हें मिली लोकप्रियता को लेकर झामुमो और कांग्रेस के नेता राज्य की राजनीति में जयराम महतो की मजबूती में सुदेश महतो की कमजोरी देखते हैं. उनका मानना है कि जयराम के राजनीतिक उत्थान और उसके मजबूत होने से महतो समाज के सबसे बड़े नेता सुदेश महतो का राजनीतिक कद घटेगा और परोक्ष रूप से भाजपा ही कमजोर होगी. वहीं भाजपा-आजसू नेताओं का मानना है कि चंद दिनों के धरना-प्रदर्शन और आंदोलन के बल पर जयराम महतो सुदेश महतो के राजनीतिक कद-काठी की बराबरी नहीं कर सकते. खैर ये तो आनेवाला समय बताएगा, पर लोकसभा में एक नई पार्टी के रूप में उभरी जेबीकेएसएस ने जनमानस में अपनी अमिट छाप जरूर छोड़ दी है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.

जयराम महतो का युवाओं के बीच गजब का क्रेज है
जेबीकेएसएस ने जिस तरह से गिरिडीह लोस में आजसू से विजयी रहे चन्द्र प्रकाश चौधरी और मथुरा महतो जैसे स्थापित सियासतदानों को परेशान किया है. उसे भुलाना आसान नहीं होगा. चन्द्र प्रकाश चौधरी को 2019 के मुकाबले जीत के अंतर में लगभग एक लाख 65 हजार वोटों की गिरावट आई, जबकि अपने जीवन का पहला संसदीय चुनाव लड़नेवाले जयराम महतो तीसरे स्थान पर रहे. इन्हें 3 लाख 47 हजार 322 वोट प्राप्त हुए। युवा तुर्क जयराम महतो को रनर रहे इंडिया ब्लॉक के संयुक्त प्रत्याशी जेएमएम के कद्दावर नेता टुंडी के विधायक मथुरा महतो से महज 23 हजार वोट कम प्राप्त हुए। गिरिडीह में अगर आमने-सामने की टक्कर होती तो जयराम की जय भी हो सकती थी. जयराम ने सोशल मीडिया में कहा है कि पिछले छह माह से हम घूम-घूम कर बता रहे हैं कि दिल्ली से रांची, धनबाद और गिरिडीह से चुनाव लड़वाने के लिए करोड़ों रुपये के हमें भाजपा से ऑफर मिला था. वैसे जयराम महतो का युवाओं के बीच गजब का क्रेज है. उन्हें टाइगर की उपाधि से नवाजा गया है. सोशल मीडिया से लोकप्रिय हुए काफी कम समय में सभी वर्गों के दिलों में खुद के लिए भरोसे की विशेष जगह बनाने वाले टाइगर जयराम को अपने पहले चुनाव में अपने राजनीतिक विरोधियों को सकते में ला दिया है.
झारखंड की राजनीति में लंबी लकीर खींचनी है तो, सबको साथ लेकर चलना होगा
वैसे राजनीति में नेताओं के वादों-इरादों पर एतबार कर जनमानस ठगा भी जाता रहा है. जयराम ने जिस तरह से झारखंड झारखंडियों के नाम पर बाहरी-भीतरी का सोसा छोड़ा है. उससे राज्य के एक बड़े तबकों में सकारात्मक संदेश जरूर गया है. वहीं सदियों से बिहार या अन्य प्रदेशों से आकर यहां बसे लोगों लोगों को गोलबंद करने का काम आसान नहीं होगा. अखिल झारखंड के लिए दिल बड़ा करना होगा. जयराम को राजनीति में अगर लंबी लकीर खींचनी है सबको साथ लेकर चलना होगा. उन्हें कोई दूरगामी संदेश देना होगा. ये ठीक है कि झारखंड में खान-खनिजों पर जब वे बाहरियों के कब्जे को लेकर हमला बोलते हैं तो, ये सच्चाई है कि झारखंड के मिनरल्स को बेरहमी से लूटा गया है. लेकिन इसके लिए झारखंड का नेतृत्व वर्ग भी जिम्मेवार हैं. राज्य का दुर्भाग्य है कि यहां कभी भी आदिवासी-मूलवासी का कोई सर्वमान्य नेता नहीं बन सका. विजनरी लीडरशिप के अभाव में झारखंड के सपने धराशायी होते रहे और यहां के जमीनी नेता लूटतंत्र के अंग बने रहे.

क्या जयराम झारखंड के कपाल पर नई इबारत लिखेंगे?
यह सही है कि आज जयराम को सुनने के लिए हजारों के भीड़ एकत्र हो जाती है. इसके कारण ही उन्हें लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त सफलता मिली. चार-पांच माह बाद होनेवाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में जेबीकेएसएस लग गई है. उनके कार्यकर्ता बताते हैं कि लोकसभा चुनाव में मिले जनसमर्थन से हमलोगों के हौसले बुलंद हैं. झारखंड के शासक वर्ग ने हमें परेशान करने के लिए जेल में डाला. कई तरह की बाधाएं उत्पन्न करने की कोशिश की गई. मुमकिन है कि आनेवाले समय में हमें और भी परेशान किया जाएगा. लेकिन हम सतर्क और सजग हैं. उनके हर जुल्म का जवाब यहां की जनता देगी. बहरहाल, जयराम के ओजस्वी भाषण से लोग आकर्षित हो रहे हैं. वे जो कहते हैं उससे लोगों की उम्मीद बढ़ती है. लेकिन राजनीति में वादे-इरादे की परख तब होती है, जब हाथ में सत्ता की चाबी आ जाती है. वो घड़ी उसके लिए अग्निपरीक्षा की घड़ी होती है. इसपर जो खरा उतरा, उसे अवाम का साथ मिल जाता है. क्या जयराम झारखंड के कपाल पर नई इबारत लिखेंगे? विधानसभा चुनाव में इसका पता चल जाएगा.
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