गुमला – झारखंड के गुमला जिले के आदिवासी किसानों के लिए एक नई उम्मीद की किरण दिखाते हुए, गुमला कृषि विज्ञान केंद्र विकास भारती बिशुनपुर ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर (राजस्थान) के सहयोग से अनुसूचित जनजातीय घटक 2024-25 के अंतर्गत एक विशेष परियोजना चलाई है।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य आदिवासी किसानों की स्थायी आजीविका को सुनिश्चित करना और सरसों उत्पादन में वृद्धि करना है। इस परियोजना के तहत जिले के चार प्रखंडों – बिशुनपुर, घाघरा, चैनपुर और जारी के 100 किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान की गई है।
परियोजना के मुख्य बिंदु
1. सरसों की एकल खेती को बढ़ावा देना
आदिवासी किसान परंपरागत रूप से मिश्रित खेती करते हैं, जिसमें सरसों की पैदावार सीमित रहती है। इस परियोजना के माध्यम से उन्हें सरसों की एकल खेती अपनाने और इससे अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
2. क्रिटिकल इनपुट और तकनीकी सहायता
किसानों को खेती के लिए जरूरी सामग्री जैसे बीज, यूरिया, डीएपी और एमओपी प्रदान की गई। साथ ही, उन्हें बाह्य भ्रमण कार्यक्रम और छोटे कृषि उपकरण भी दिए गए। इससे उन्हें आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने में मदद मिली।
3. उच्च गुणवत्ता वाले बीज का उपयोग
इस परियोजना में किसानों को बिरसा भाभा मस्टर्ड-1 (BBM-1) नामक उन्नत सरसों का बीज दिया गया। यह बीज 42% तक तेल उत्पादन करता है और 115-120 दिनों में तैयार हो जाता है। औसत उत्पादन क्षमता 17-18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि अधिकतम उत्पादन 24-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकता है।
आदिवासी किसानों के लिए प्रशिक्षण और लाभ
1. सरसों उत्पादन तकनीक में सुधार
किसानों को प्रशिक्षित किया गया कि कैसे वे कम संसाधनों का उपयोग करके अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इसमें मिट्टी के नमूनों का परीक्षण और मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण जैसी गतिविधियां भी शामिल थीं।
2. उत्पादन क्षमता में वृद्धि
परंपरागत रूप से, किसान 3 किलो सरसों से 1 किलो तेल निकालते थे। लेकिन BBM-1 किस्म के बीज का उपयोग करने से यह अनुपात 2.5 किलो सरसों से 1 किलो तेल हो गया। इस बदलाव से किसानों की आय में सीधा इजाफा होगा।
3. आर्थिक स्थिति में सुधार
सरसों की खेती में वृद्धि से न केवल किसानों की आजीविका बेहतर होगी, बल्कि उनके आर्थिक हालात में भी सुधार आएगा। इससे आदिवासी किसानों की कृषि पर निर्भरता को और मजबूत बनाया जा सकता है।
परियोजना के दीर्घकालिक प्रभाव
1. स्थायी आजीविका का निर्माण
यह पहल न केवल किसानों की मौजूदा आय को बढ़ाने में मदद करेगी, बल्कि उन्हें लंबे समय तक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी।
2. मृदा स्वास्थ्य में सुधार
मिट्टी के नमूनों की जांच और मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण से किसान अपनी भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बेहतर तरीके से काम कर सकेंगे।
3. सरसों उत्पादन में झारखंड का योगदान बढ़ेगा
इस परियोजना के सफल क्रियान्वयन से झारखंड राज्य सरसों उत्पादन में एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है।
विशेषज्ञों और अधिकारियों की भूमिका
1. वरीय वैज्ञानिकों का योगदान
गुमला कृषि विज्ञान केंद्र के वरीय वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार और मृदा वैज्ञानिक डॉ. नीरज कुमार वैश्य ने किसानों को तकनीकी जानकारी और जरूरी प्रशिक्षण प्रदान किया।
2. क्रिटिकल इनपुट वितरण
परियोजना के तहत आवश्यक सामग्री वितरण के दौरान संस्था के संयुक्त सचिव श्री महेंद्र भगत ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहकर किसानों का मनोबल बढ़ाया।
3. किसानों का उत्साहवर्धन
इस पहल में किसानों को प्रोत्साहित किया गया कि वे आधुनिक तकनीकों को अपनाएं और अपनी खेती में बदलाव लाएं।
सरसों उत्पादन वृद्धि: समाज और पर्यावरण के लिए लाभकारी
1. पर्यावरणीय लाभ
सरसों की खेती मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है और फसलों के बीच संतुलन बनाती है। इससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है।
2. सामाजिक और आर्थिक विकास
सरसों उत्पादन में वृद्धि से क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और समाज में समृद्धि आएगी। यह पहल आदिवासी किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगी।
गुमला कृषि विज्ञान केंद्र और ICAR द्वारा संचालित यह परियोजना आदिवासी किसानों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है। सरसों उत्पादन में सुधार और आधुनिक तकनीकों का उपयोग उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगा।
यह पहल एक सफल उदाहरण है कि कैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीकी समर्थन से ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और आजीविका में सुधार किया जा सकता है। किसानों और सरकार को इस परियोजना से प्रेरणा लेते हुए और भी ऐसे कदम उठाने चाहिए, जो पूरे देश में समृद्धि लाएं।
न्यूज़ – गणपत लाल चौरसिया
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