पीरटांड़-डुमरी और टुंडी के धनकटनी आंदोलन ने उन्हें बड़े आदिवासी नेता के रूप में उभारा…जनमानस के लिए वे जीवन भर लड़ते रहे, ना झुके-ना टूटे
कमलनयन
गिरिडीह : झारखंड पृथक राज्य आंदोलन, नशापान उन्मूलन और महाजनी प्रथा के खिलाफ दशकों तक अत्याचार के खिलाफ संघर्षपूर्ण आंदोलन करनेवाले जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को अपने जीवन को बहुमूल्य पांच दशक देनेवाले झारखंड में सतारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक राज्य में तीन बार मुख्य मंत्री रहे, आठ बार सांसद रहे और केन्द्र में कोयला मंत्री रहे दिशोमगुरु शिबू सोरेन का सोमवार को लम्बी बीमारी के बाद दिल्ली के एक अस्पताल में 81 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन से पूरे झारखंड में शोक का माहौल व्याप्त है।
झारखंड मूलवासी-आदिवासियों के दिलों में शिबू सोरेन “दिशोम गुरु” की छवि भगवान तुल्य है। उनके दिवंगत होने के साथ ही उत्तरी छोटानागपुर और संतालपरगना के इलाके में शोषितों-पीडितों, किसानों, आदिवासी-मूलवासी की आवाज रहे एके राय-विनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन युग का अब अंत हो गया।
रामगढ़ के नेमरा गांव में पिता सोबरन सोरेन-.माता सोना सोबरन के आंगन में जन्मे शिबू के दूसरे पुत्र वर्तमान में झारखंड की विरासत को हेमंत सोरेन संभाले हुए हैं। परिवार में सबसे पहले बड़े पुत्र दु्र्गा सोरेन, उनके निधन के बाद दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता सोरेन, तीसरे पुत्र बंसत सोरेन और हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन विधायक बनकर शिबू की विरासत को आगे बढ़ाने का काम किया है।
सत्तर के दशक में सक्रिय राजनीति में आए शिबू सोरेन ने छोटानागपुर के इलाके में मजदूरों- किसानों की आवाज रहे एके राय और विनोद बिहारी महतो के संर्पक में आने के बाद संताल के अलावा गिरिडीह और धनबाद के तोपचाची, पीरटांड़- डुमरी और टुंडी के इलाके में महाजनी शोषण और दबंग सूदखोरों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया, जिसे इलाके के लोग धनकटनी आंदोलन कहते थे।
धनकटनी आंदोलन का फैसला और उसे आंदोलन की शक्ल देना आसान का नहीं था. इस आंदोलन से ही शिबू झारखंड में अपनी राजनीतिक जमीन की नींव डाल दी. सदियों से शोषित लोगों के दिलों में शिबू सोरेन की विशेष छवि बनी और एक बड़े आदिवासी नेता के रूप में उभरे।

गिरिडीह में एक सभा के दौरान किसी से बातचीत करते हुए शिबू सोरेन
धनकटनी आंदोलन की सफलता के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी राजनीतिक पार्टी बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ
इस आंदोलन से गिरिडीह और धनबाद जिले में शिबू सोरेन एक प्रखर राजनीतिज्ञ बनकर देश का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब हुए. सच कहा जाए तो गिरिडीह के पीरटांड़- डुमरी और गिरिडीह-धनबाद की सीमा में बसे टुंडी इलाके में शोषित रैयतों को हजारों एकड़ खेतों-खलियानों पर कब्जा मिला। धनकटनी आंदोलन की सफलता के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी राजनीतिक पार्टी बनाने का मार्ग प्रशस्त हुआ.
1972 में अस्तित्व में आये झारखंड मुक्ति मोर्चा को पूरे झारखंड में अपनी पहचान स्थापित करने की मुहिम में बिनोद बिहारी महतो, एके राय जैसे लोगों ने साथ दिया. बाद के दिनों में शिबू सोरेन ने संतालपरगना में अपनी राजनीतिक सक्रियता शुरू की और पहली बार 1977 में दुमका से लोकसभा का चुनाव लड़ा. लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. पुनः 1980 में दुमका से लड़े और जीते। इसके बाद 1989, 1991 और 1996 में लगातार तीन बार वह सांसद बने।
राज्य बनने बाद 2002 में भाजपा के सहयोग से राज्यसभा गये। 2004 में मनमोहन सिंह सरकार में केन्द्रीय कोयला मंत्री बने लेकिन शशिनाथ झा हत्या मामले में उम्रकैद की सजा हो गई. फिर उन्हें कोयला मंत्री पद इस्तीफा देना पड़ा। बाद में ऊपरी अदालत में उम्रकैद की सजा से दोषमुक्त हुए. 2008 में पहली बार और 2008 में ही दूसरी बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने फिर 2009 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।
शिबू सोरेन के सार्वजनिक जीवन को गहरायी से समझने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका राजनीतिक जीवन काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा, लेकिन न वह कभी झुके और न कभी टूटे. इसके बावजूद सार्वजनिक जीवन में जबतक उनके शरीर ने साथ दिया तब तक सक्रिय रहते हुए विशेषकर आदिवासियों के बीच नशापान के खिलाफ और शिक्षा के प्रति मुखर रहे। वे मानते थे कि आदिवासी-मूलवास के लिए नशा अभिशाप है. इसी बदौलत महाजनों ने हमारे खेतों-जमीनों को हड़पने के लिए नशा को बहुत बड़ा हथियार बनाए हुए है.

गुरुजी की विरासत को संभाले दो सारथी
गिरिडीह और टुंडी के इलाके से उन्हें विशेष लगाव था
गिरिडीह और टुंडी के इलाके से उन्हें विशेष लगाव था. आपातकाल के समय में टुंडी- मनियाडीह के एक घर में रहे, जो मौजूदा समय में गुरुजी आश्रम के रूप में जाना जाता है। कहते हैं कि अपनी राजदूत मोटरसाइकिल से अक्सर गिरिडीह आया करते थे. इस दौरान मनियाडीह, हरलीडीह के कतिपय पार्टी कैडरों के घर में रात्रि विश्राम करते और शाकाहारी भोजन किया करते थे। जाते समय उनका प्रिय गिरिडीह जिले के पंचबा इलाके में बने चने का सत्तू अपने साथ ले जाया करते थे.
सत्तर के दशक में संताल के अलावा गिरिडीह के पीरटांड़-टुंडी सहित अन्य उत्तरी छोटानागपुर के इलाकों में महाजनी प्रथा और नशा उन्मूलन के खिलाफ आंदोलन किया. इस दौरान उनपर कई मुकदमे दर्ज हुए। चिरूडीह में कुड़को मामले में शशिनाथ झा हत्याकांड में उन्हें में वर्षो अदालती कार्रवाई का सामना करना पड़ा। जेल गये जमानत मिली. वांरट हुआ बेल मिली . केन्द्र में कोयला मंत्री बने तो इस्तीफा देना पड़ा. मुख्यमंत्री रहते हुए 2009 में तमाड़ विस चुनाव हारे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस प्रकार पूरा सार्वजनिक जीवन उनका काफी संघर्षपूर्ण रहा लेकिन वे कभी विचलित नहीं हुए.
पीरटाड़ में पत्रकारों से बातचीत के क्रम में उन्होंने अपनी मन की भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा था कि सार्वजनिक जीवन में आने का उदेश्य महाजनी उत्पीडन, समाज में व्याप्त कुरूतियों का उन्मूलन के लिए उन्होंने संघर्ष का रास्ता अपनाया। नक्सली मसले पर उन्होंने कहा था कि कुछ युवक मुख्यधारा से भटक जरूर गये हैं. लेकिन इनका कोई भविष्य नहीं है.
बहरहाल, झारखंड के राजनीतिक पुरोधा शिबू सोरेन जैसे आंदोलनकारी नेता अब दूसरा कोई सामने आएगा, इसकी संभावना कम है, लेकिन झारखंड में ही नहीं, पूरे देश में सर्वमान्य आदिवासी नेता के रूप में शिबू सोरेन अपनी अमिट छाप जनमानस में जरूर छोड़ गए हैं. शिबू सोरेन झारखंड का नाम अमर करके चले गए हैं.
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