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Sunday, March 8, 2026
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गाल पर एक तमाचे के लायक?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने खिलाफ स्वप्रचारित लगभग दिमागी हालत की खराबी की आड़ में एक नौजवान डाॅक्टर युवती के चेहरे पर लगा हिजाब असभ्यता बल्कि अश्लीलता की मुद्रा में हटाने की कोशिश की। वह राष्ट्रीय शर्म की घटना है। बहादुर युवती बिहार सरकार की नौकरी लेने से इंकार कर अपने भाई के पास चली गई। सामान्य परिस्थिति में यदि कोई भी व्यक्ति किसी युवती के चेहरे से हिजाब हटाकर उसकी शक्ल देखना चाहे। तो वह तो एक तरह से स्त्री के शील पर ही हमला करना हुआ। उसके साथ की गई बदतमीजी हुई। ऐसे व्यक्ति को तो उस युवती द्वारा एक चांटा रसीद करना चाहिए। उसके बाद और जो भी दुर्दशा की जा सके। वह भी जरूर हो।

पूरे प्रकरण में राजनीतिक चखचख बाजार में जाकर मुझे कुछ समझना नहीं है। मैं अपनी टिप्पणी संविधान की उन व्याख्याओं के तहत लाना चाहता हूं। जो हिजाब पहनने को लेकर अब सेवानिवृत्त हो चुके सुप्रीम कोर्ट के जज सुधांशु धूलिया ने अक्टूबर 2022 के अपने नायाब फैसले में दी थी। हालांकि दूसरे जज हेमंत गुप्ता ने उस स्कूल का समर्थन किया जो कर्नाटक के उडुपी जिले के कुंडापुर में है। स्कूल ने मुस्लिम लड़कियों को हिजाब उतारकर ही आने का हुक्म जारी किया था। कर्नाटक सरकार और वहां के हाई कोर्ट ने भी स्कूल प्रबंधन का साथ दिया। सुप्रीम कोर्ट के जज हेमंत गुप्ता ने भी वही किया। जस्टिस सुधांशु धूलिया ने हिजाब पहनने के अधिकार की आड़ में संविधान की परंपरागत मान्यताओं में क्रांतिकारी बदलाव और व्याख्या कर दी। उनके तर्क लाजवाब हैं। मुस्लिम समाज, कर्नाटक हाई कोर्ट सबके द्वारा यही समझा समझाया जाता रहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत ही अल्पसंख्क समाज की लड़कियों को अपने धार्मिक आचरणों से संबंधित क्रियाकलापों को मानने का अधिकार है। जस्टिस धूलिया ने अद्भुत तर्क किया कि लड़कियों द्वारा हिजाब पहनना केवल धार्मिक आचरण के नजरिए से देखना संकीर्ण दृष्टि फलक है। लड़कियां इंसान पहले हैं। हर नागरिक को संविधान के तहत अनुच्छेद 21 में प्राण और दैहिक आजादी का संरक्षण मिला हुआ है। दैहिक आजादी में निजता का अधिकार है। वस्त्र पहनना निजता के अधिकार में शामिल है। उसे किसी संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए ही व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित रखते हुए वंचित किया जा सकता है अथवा नहीं। धूलिया ने यह भी कहा कि सभी नागरिकों को अनुच्छेद 19 (क) के तहत पूरा अधिकार है कि वह किस तरह अपने आपको उपस्थित या अभिव्यक्त करे। उसमें वस्त्र पहनने का निजता का अधिकार अपने आप शामिल है। स्कूल प्रबंधन का कहना था कि स्कूल में न पहनें और अपने घर में बाहर बाजार में कहीं भी पहन लें। धूलिया ने यह शर्त भी खारिज की। उन्होंने कहा कि निजता का मूल अधिकार उन बच्चियों की देह की आत्मा है अर्थात् वह अधिकार ही देहात्मा है।

हिजाब पहनना इस्लाम के बुनियादी आदेशों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह अल्पसंख्यक समाज द्वारा ओढ़ ली गई प्रथा तक सीमित नहीं है। धूलिया ने लिखा कि धार्मिक आधार पर कोई रीति रिवाज, हुक्मनामा या आदेश है। तो उस पर ही क्यों विचार किया जाए। एक व्यक्ति के हिजाब को लेकर धर्म को ही सामने क्यों किया जाए। लोहिया ने भी कहा था कि धर्म का काम है अच्छाई को करे, तो वह करे। यह तो हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है कि वह बुराई से लडे़ तो। कर्नाटक के स्कूल की बहादुर बच्चियां ठीक लड़ रही हैं।

व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान ने दिया है। यह कैसा अंतःकरण है जो दूसरों के द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को मान ले और कहे कि यह मेरा अंतःकरण है। धूलिया ने यह भी कहा कि डेस कोड अपनाने से ही अनुशासन कायम होता है-यह एक बकवास है। हिजाब पहनकर भी लड़कियां स्कूल में अनुशासित ही रह सकती हैं। जबरिया हिजाब पहनना या नहीं पहनने के चक्कर में कई बच्चियों की शिक्षा भी बर्बाद हुई। निजता का अधिकार तो इतना व्यापक है कि यदि हिन्दू लड़कियां हिजाब पहनना चाहें। तो उन्हें भी कैसे रोका जा सकता है? हिन्दू मर्द सलवार कुर्ता और शेरवानी पहनते हैं। टोपियां भी लगाते हैं। तब तो कोई हिन्दूवादी दृष्टिकोण उन्हें रोकने नहीं आता। हिजाब पहने देखकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कौन सा उन्माद छा गया, जो उस युवती के साथ बदतमीजी करने का उनका मन हो आया। धूलिया के कहने से यह भी स्पष्ट हुआ कि समाज में शक, संशय और संजीदगी है कि मानो हिजाब पहनना इस्लामी संस्कृति और धार्मिक आचरण का व्यावहारिक लक्षण है। इस मामले को व्यक्ति की निजी आजादी की धुरी पर क्यों नहीं समझा जा सकता? अदालतों को भी बहुत ज्यादा धार्मिक पचड़ों में पड़ने की क्या ज़रूरत है? उन्हें तो संविधान की मर्यादा समझनी और समझानी चाहिए। मजहबी दस्तूर संवैधानिक आजादी के परे नहीं हो सकते। वैसे भी संविधान में सामासिक संस्कृति को तरजीह दी गई है जिसका संकीर्ण पक्ष खारिज करने योग्य है।

जस्टिस धूलिया ने कवितामय पंक्ति भी लिखी कि सबसे अच्छा और मनोरम दृश्य तो तब होता है जब एक बालिका अपनी पीठ पर स्कूली बस्ता लादे सड़क पर चलती हुई स्कूल पहुंचे। संविधान के सेक्युलर मकसदों को सामासिक एकरूपता कैसे मिलेगी। अरुणा राय के प्रसिद्ध मुकदमे में मेरे दोस्त जस्टिस देवदत्त माधव धर्माधिकारी ने कहा है कि प्राइमरी स्कूलों से ही विद्यार्थी में धर्मों की पारस्परिकता की इज्जत करने का अदब उनकी प्रथाओं तक को लेकर उपजना चाहिए। नागरिक आजादी और निजता तथा अंतःकरण की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 में गरिमामय जीवन बिताने का दरवाजा बंद नहीं मिलना चाहिए। हेमंत गुप्ता तो शुरू से ही जिस विचारधारा के समर्थक रहे हैं। उसके कारण उन्हें रिटायरमेंट के बाद भी पद मिले। लेकिन जस्टिस धूलिया के कारण मुस्लिम बच्चियों सहित अन्य सभी धर्मों की बच्चियों को भी एक आजादी नसीब तो हुई है। जब तक सुप्रीम कोर्ट में जजों का बहुमत उनके फैसलों को उलट नहीं दे।


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