भोजपुरी फिल्म के पितामह बीपी शाहाबादी व गिरिडीह के मशहूर केडिया बंधु भी पुरस्कारों के हकदार हैं, इनपर नजरें इनायत होनी चाहिए
– कमलनयन – (वरिष्ठ पत्रकार)
भारत सरकार द्वारा दिये जानेवाले देश के सर्वोच्च नागिरक पद्म पुरस्कारों को लेकर कई दशकों से भेदभाव का आरोप लगाए जाते रहे हैं. मोदी सरकार में भी सलेक्टिव एप्रोच को अधिक तरजीह दी जा रही है. तीन श्रेणीयों में दिये जाने वाले पुरस्कारों में इस वर्ष 2026 के लिए पांच हस्तियों को पदम विभूषण 13 हस्तियों का पद्म भूषण और 113 हस्तियों को पद्मश्री के लिए नमित किया गया। इनमें 16 महिलाएं भी हैं, जिनका विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान रहा है।
77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इसकी घोषणा की गई है. यह पुरस्कार प्रत्येक वर्ष कला-संस्कृति, फिल्म- अध्यात्म, उद्योग-व्यापार, शिक्षा-साहित्य, कृषि-विज्ञान, लोक संस्कृति सहित अन्य क्षेत्रों में एकल एवं युगल को असाधारण उपलब्धियों सहित विशिष्ट सेवा के लिए प्रति वर्ष प्रदान किये जाते हैं।
इस वर्ष पद्मभूषण पुरस्कार के लिए अपने जीवन के बहुमूल्य पांच दशक तक झारखंडी अस्मिता के लिए निरन्तर संघर्षरत रहे. झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक,पृथक राज्य आंदोलन के अगुआ झारखंड के दिशोमगुरु शिबू सोरेन को भी मरणोपरांत दिये जाने की घोषणा हुई है. झारखंडियों को लगा था कि शिबू सोरेन को भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान ने नवाजा जाएगा, लेकिन लोगों को निराशा हाथ लगी.

हेेेेेमंत, सुदिव्य और डा. सरफराज ने कहा- गुरुजी झारखंडी आवाम के दिलों में भारत रत्न के समान रचे-बसे हैं
पद्म पुरुस्कारों की घोषणा के बाद से ही झारखण्ड के सियासी एंव अन्य क्षेत्रों में उठ रहे सवालों और लोगों की परस्पर चर्चा के बीच शिबू सोरेन के सुपुत्र राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और नगर विकास, कला-संस्कति मंत्री सुदिव्य कुमार ने ट्वीट कर और राज्यसभा सांसद डा. सरफराज अहमद ने केन्द्र सरकार का आभार जताते हुए कहा कि सम्मान तो सम्मान है। लेकिन अपनी भावनाओं को स्पष्ट करते हुए साफ किया कि दिशोम गुरु झारखंडी आवाम के दिलों में भारत रत्न के समान रचे-बसे है।
शिबू सोरेन (गुरुजी) झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे, छह बार सांसद रहे, केन्द्र में कोयला मंत्री रहे। बीते वर्ष उनके निधन के बाद से ही गुरुजी को भारत रत्न दिये जाने की मांग होती रही है। राज्य विधानसभा से इस आशय का प्रस्ताव पारित किया गया था।

देशरत्न राजेंद्र बाबू के साथ राष्ट्रपति भवन में देश की प्रथम भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ देखते हुए बाबू जगजीवन राम, लाल बहादुर शास्त्री और सत्येंंद्र नारायण सिंह नजर आ रहे हैं.
गुरुजी के मामले में केंंद्र ने दरियादिली नहीं दिखायी
झारखंडी जनमानस में हो रही चर्चा के बीच राज्य के वरिष्ठ पत्रकार नारायण विश्वकर्मा और शहनवाज अख्तर का कहना है कि 14O करोड़ जनसंख्या वाले देश में केन्द्र सरकार को पुरस्कारों का दायरा बढ़ाने में दरियादिली दिखानी चाहिए. पुरस्कार पाने के सही हकदारों का उचित मूल्यांकन किए जाने की जरूरत है. पत्रकार बंधुओं का मानना है कि झारखंड के परिप्रेक्ष्य में नामचीनों को पुरस्कार देने के मामले में केंद्र सरकार उदारता नहीं दिखा पायी.
झारखंड के अधिकतर बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और शिबू सोरेन के संघर्षपूर्ण राजनीतिक इतिहास की समझ रखनेवालों को लगा कि गुरुजी के कद-काठी पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था. झारखंड के जनमानस को लगता है कि गुरुजी के साथ इंसाफ नहीं हुआ. वह बिल्कुल भारत रत्न के हकदार थे.
भोजपुरी फिल्म के पितामह बीपी शहाबादी को तो भुला ही दिया गया
हालांकि पीएम मोदी की सरकार आने के बाद पद्म पुरस्कारों पानेवालों की संख्या में इजाफा हुआ है। देश भर में कई ऐसी हस्तियां जिन्होंने कल्पना नहीं की थी उन्हें किसी पुरस्कार से नवाजा जाएगा। फिर भी अप्रत्याशित रूप से नागरिक पुरस्कार प्रदान किए गए. वैसे झारखंड में भी कई हस्तियां हैं जो इन पुरस्कारों की श्रेणी के हकदार माने जा सकते हैं। इनमें भोजपुरी फिल्मों के पितामह विश्वनाथ शाहाबादी और विगत पांच दशक से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की परम्परा को विश्व फलक पर आगे बढा रहे केडिया बंधु शामिल हैं।
भारतीय समाज में लोक जीवन का चितेरा कहे जानेवाले बीपी शाहाबादी का योगदान न सिर्फ फिल्म निर्माता के रूप में है, बल्कि करोड़ों लोगों की भाषा भोजपुरी फिल्म उद्योग को स्थापित करने में उनके महत्व को भुलाना मुश्किल है. जिन्होंने संयुक्त बिहार में साठ के दशक में देशरत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो बनायी।
देशरत्न राजेंद्र बाबू ने ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ फिल्म राष्ट्रपति भवन में देखी थी
‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ फिल्म ग्रामीण परिवेश को दर्शाते हुए और नशापान के दुष्परिणामों पर आधारित फिल्म थी. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति भवन में डा. राजेन्द्र प्रसाद ने 16 एमएम कें प्रोजेक्टर पर लाल बहादुर शास्त्री, बाबू जगजीवन राम, सतेन्द्र नारायण सिंह सहित अन्य महान हस्तियों के संग फिल्म देखी थी। फिल्म देखने के बाद देश रत्न ने फिल्म निर्माता विश्वनाथ जी को “शाहाबादी” की उपाधि से नवाजा था। बाद के सालों में बीपी शाहाबादी ने दहेज प्रथा, बेमेल विवाह सहित अन्य सामाजिक कुरुतियों पर आधारित भोजपुरी, हिन्दी और बांग्ला में कई सारी रचनात्मक फिल्में बनाई, जिन्हें दर्शक आज भी देखने की इच्छा रखते हैं।

दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस (2025) में मंच पर प्रस्तुति के बाद प्रधानमंत्री नरेंद मोदी और मालद्वीप के राष्ट्रपति मो.मोइज्जू गिरिडीह के केडिया बंधुओं मोर मुकुट और मनोज केडिया (गुलाबी परिधान में दोनों भाई) के साथ.
गिरिडीह के केडिया बंधुओं पर नजरें इनायत होनी चाहिए
वहीं झारखंड के केडिया बंधु मोर मुकुट-मनोज केडिया विगत छह दशक से अपने पिता ख्याति प्राप्त तबला वादक पंडित शंभु दयाल केडिया के मार्गदर्शन में सितार- सरोद की जुगलबंदी कर रहे हैं। भारतीय संगीत की परम्परा को पूरी निष्ठा व शिद्त के साथ विश्वस्तर पर आगे बढ़ा रहे हैं।
मैहर घराने के केडिया बंधु आकाश वाणी रांची (झारखंड) के ग्रेड वन कलाकार हैं। प. रविशंकर और उस्ताद अली अकबर खां साहब की सितार सरोद की जुगलबंदी के बाद केडिया बंधु की जुगलबंदी वर्तमान में एकमात्र सफल जुगलबंदी में प्रथम स्थान के कलाकार माने जाते हैं।
भारत सरकार की संस्था आईसीसीआर द्वारा इनकी सफल जुगलबंदी की मान्यता दी गई है। देश विदेश की विभिन्न प्रख्यात संस्थाओं द्वारा इन्हें प्रदत्त अवार्ड- गोल्ड मेडल की लम्बी सूची है।
भारत के प्रायः सभी प्रसिद्ध मंचों के अलावा दुनिया भर के देशों में मंच प्रस्तुति का केडिया बंधु झारखंड और देश का मान बढ़ा रहे है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और स्वास्थ्य मंत्री अपने गिरिडीह दौरे के समय केडिया बंधु से मिलने उनके घर गए हुए थे. केंद्र सरकार की इनपर भी नजरें इनायत होनी चाहिए.
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