राष्ट्रपति के सम्मान के बहाने ममता बनर्जी को आदिवासी विरोधी बताकर आदिवासी कार्ड खेलने में भाजपा हो गई फेल
नारायण विश्वकर्मा
प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बीच चली जुबानी जंग और उसके बाद उत्पन्न प्रशासनिक विवाद में प्रधानमंत्री की इंट्री ने इस मामले को बेवजह तूल देने की कोशिश की गई. इस मामले में सीएम ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर देश की सर्वोच्च संवैधानिक कुर्सी का अपमान करने का आरोप लगाया तो टीएमसी सरकार ने पीएम के बयान का मखौल उड़ा दिया. अगर हम पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं को देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कई महत्वपूर्ण अवसरों पर स्वयं भाजपा सरकार ने राष्ट्रपति को वह केंद्रीय स्थान नहीं दिया, जिसकी अपेक्षा संविधान और परंपरा दोनों करते हैं।

प्रोटोकॉल के उल्लंघन के अपने रुख का बचाव करते हुए ममता ने कहा कि सिलीगुड़ी के मेयर गौतम देब बागडोगरा में मुर्मू का स्वागत करने के लिए मौजूद थे। मैं धरने पर बैठी हूं और लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रही हूं। मैं कैसे जा सकती हूँ? मुझे तो धरने से पहले आपके आने की सूचना भी नहीं थी। यह मेरी प्राथमिकता है क्योंकि इसमें लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन शामिल है.
ममता ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के लिए कथित तौर पर उनकी आलोचना करने के लिए मोदी पर भी जमकर हमला बोला। अपने दावे को पुष्ट करने के लिए ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री की एक बड़ी तस्वीर दिखाई, जिसमें वह भाजपा के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी के साथ एक कार्यक्रम में बैठे हुए थे और राष्ट्रपति उनके बगल में खड़ी थीं। दरअसल, लोकतंत्र में नैतिकता का अर्थ केवल विरोधियों पर आरोप लगाना नहीं होता। नैतिकता का अर्थ यह भी है कि जो मानदंड आप दूसरों के लिए तय करते हैं, उन्हें स्वयं भी समान रूप से लागू करें।
प. बंगाल में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्र हर स्तर पर ममता बनर्जी को घेरने की फिराक में है. भाजपा ने इस मामले को बड़े राजनीतिक अभियान की तरह पेश किया। भाजपा के कई बड़े नेताओं ने इसे आदिवासी सम्मान और संवैधानिक गरिमा से जोड़ने की कोशिश की. लेकिन तृणमूल कांग्रेस और विपक्ष के कई नेताओं ने राष्ट्रपति को खुद बार-बार अपमान करने और उन्हें उचित सम्मान नहीं देने की याद दिला कर भाजपा को बैकफुट पर ला दिया.

ममता ने तस्वीर दिखा कर पीएम को घेरा
ममता बनर्जी ने भाजपा नेतृत्व को आईना दिखाते हुए वह तस्वीर पेश कर दी जिससे भाजपा को मिर्ची लगी. इसपर अभी तक भाजपा की ओर से कोई सफाई नहीं आई कि आखिर राष्ट्रपति के साथ ऐसा सलूक क्यों किया गया? वह तस्वीर मार्च 2024 में राष्ट्रपति मुर्मू द्वारा आडवाणी को उनके नई दिल्ली स्थित आवास पर देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, भारत रत्न से सम्मानित करने के कार्यक्रम की है। तस्वीर में दिख रहा है कि प्रधानमंत्री बैठे हैं जबकि राष्ट्रपति खड़े हैं। ममता बनर्जी ने तस्वीर पोस्ट करते हुए कहा कि हम ऐसा कभी नहीं करते। राष्ट्रपति का अपमान करने की संस्कृति भाजपा की है, हमारी नहीं.
हालांकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस मामले को जिस तरह सार्वजनिक किया है, वैसा इतिहास में शायद ही किसी राष्ट्रपति ने किया हो. आमतौर पर ऐसे विवाद सार्वजनिक नहीं होते. अधिकारियों या अनौपचारिक मध्यस्थों के जरिए चुपचाप हल निकाल लिया जाता है, लेकिन राष्ट्रपति मुर्मू ने इस बारे में भाषण दिया. यह उनकी गरिमा के प्रतिकूल प्रतीत होता है. उन्होंने इस मुद्दे को व्यक्तिगत बना दिया, जब उन्होंने कहा कि ममता मेरी छोटी बहन जैसी है. मुझे नहीं पता वे मुझसे क्यों नाराज़ हैं. अगर आप भारत की राष्ट्रपति हैं और छोटी बहन से नाराज़ हैं, तो बेहतर यही है कि आप उन्हें फोन कर लेती. अब तक तो यही परंपरा रही है.

टीएमसी का आरोप…राष्ट्रपति का चुनावी राजनीति में मोहरे की तरह हो रहा इस्तेमाल
ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति की हर बात का अपना जवाब दिया है. मुख्यमंत्री के समर्थकों ने यह भी कहा है कि राष्ट्रपति को चुनावी राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. उनका कहना है कि राष्ट्रपति का खुद को “बंगाल की बेटी” कहना और प्रधानमंत्री का उनके आदिवासी पृष्ठभूमि का ज़िक्र करना इन सबका मकसद यह दिखाना है कि ममता बनर्जी ने एक महत्वपूर्ण आदिवासी नेता का अपमान किया और इस तरह सभी आदिवासियों का अपमान किया है. राष्ट्रपति को समझना चाहिए था कि अगर आप चुनाव से पहले किसी विपक्षी दल की सरकार वाले राज्य में जा रहे हैं, तो बेहतर है कि मुख्यमंत्री के साथ अपने मतभेद को व्यक्तिगत बनाकर सार्वजनिक न करें क्योंकि इसका राजनीतिक इस्तेमाल हो सकता है.
टीएमसी की ओर से कहा गया कि भाजपा प. बंगाल विधानसभा चुनावों में राष्ट्रपति के अपमान को चुनावी मुद्दा इसलिए बना रही है क्योंकि भाजपा के पास जनहित के अन्य कोई मुद्दे नहीं हैं, प. बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच राष्ट्रपति की बार-बार यात्राएं उचित नहीं है। राष्ट्रपति का प. बंगाल में अपमान हो और उस पर राजनीति की जा सके, क्या इसी उद्देश्य के चलते राष्ट्रपति को प. बंगाल के दौरे पर भेजा जा रहा है? टीएमसी ने सवाल बार-बार उठाया कि मणिपुर में आदिवासी महिलाओं को निर्वस्त्र किए जाने पर राष्ट्रपति चुप क्यों रहीं? उद्योगपतियों ने आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को निगल लिया है, बावजूद इसके राष्ट्रपति खुली आंखों से इन अत्याचारों को क्यों सहन कर रही हैं?
हरियाणा में दो बार सीएम गैरहाजिर रहे, तब राष्ट्रपति-पीएम चुप क्यों रहे?
याद करा दें कि जब द्रौपदी मुर्मू हरियाणा में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हुर्इं, तो उस राज्य के भाजपा मुख्यमंत्री कम से कम दो बार अनुपस्थित रहे। तब भी आदिवासी महिला राष्ट्रपति का अपमान हुआ था, लेकिन इस मामले में राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री मोदी को बुरा नहीं लगा क्योंकि वहां डबल इंजन की सरकार है. भाजपा के अपने कोई विचार नहीं हैं। वह उस समय जो भी मुद्दा मिलता है, उसे उठाती है और चुनाव समाप्त होने तक उस पर स्यापा मचाती रहती है। सच कहा जाए तो मोदी के अमृत काल में राष्ट्रपति भवन की गरिमा धूमिल हुई है.
झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, प. बंगाल, मणिपुर व अन्य आदिवासी-दलित बहुल राज्यों में आदिवासी मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। भाजपा को लगा कि वह चुनाव में इस मामले को उछाल कर वोटरों को लुभा सकते हैं, लेकिन भाजपा की यह चाल सफल नहीं सकी.
राष्ट्रपति ने बंगाल की ट्रेनी डाक्टर पर भी दिया था बयान
याद करें जब प. बंगाल में ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए जघन्य अपराध के 20 दिनों बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बड़े बयान ने देश को चौंका दिया था. राष्ट्रपति ने कहा था कि निर्भया कांड के 12 सालों में अनगिनत रेपों को समाज भूल चुका है. यह सामूहिक भूलने की बीमारी सही नहीं है. इतिहास का सामना करने से डरनेवाले समाज सामूहिक स्मृति लोप का सहारा लेते हैं. अब भारत के लिए इतिहास का सामना करने का समय आ गया है. उनका बयान उस समय आया था जब 25 अगस्त को भाजपा ने बंगाल बंद का आह्वान किया था. उस ऐसा लगा था कि बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है.
मणिपुर की हिंसा पर मौन क्यों रही?
इस मामले में विपक्ष और प. बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का यह आरोप था कि राष्ट्रपति का बयान उस समय क्यों नहीं आया जब मणिपुर को हिंसा की भट्ठी में झोंक दिया गया था. राष्ट्रपति के बंगाल पर दिए गए बयान को मणिपुर हिंसा से जोड़कर देखा जा रहा था. उस दौरान मणिपुर के सीएम का वह शर्मनाक बयान आया था कि इस तरह की तमाम घटनाएं यहां होती रहती हैं. वहीं दूसरी ओर वहां की पूर्व राज्यपाल अनुसुइया उइके राष्ट्रपति से मिलकर नम आंखों से वहां के बेकाबू हालात के बारे में बताया था. मीडिया से उन्होंने कहा था कि मैंने जिंदगी में ऐसी इतनी हिंसा नहीं देखी. ऐसी जघन्य घटनाओं पर केंद्र से मार्मिक अपील की थी कि मणिपुर के हालात बदतर है, वहां कानून-व्यवस्था बेकाबू है. सख्त कदम उठाने की जरूरत है. इसके बावजूद राष्ट्रपति के रोंगटे खड़े नहीं हुए. इसके लिए मणिपुर की आदिवासी जमात शायद ही उन्हें माफ करे. सैकड़ों भुक्तभोगियों ने मणिपुर के सीएम को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की गुहार लगाई पर राष्ट्रपति का दिल नहीं पसीजा. इसके अलावाहाथरस, उन्नाव और अंकिता भंडारी जैसे जघन्य दुष्कर्म हत्याकांड पर राष्ट्रपति खामोश रहीं.

सीएम हेमंत सोरेन ने मणिपुर हिंसा पर राष्ट्रपति को पत्र भेज कर आदिवासी बहनों की सुरक्षा की गुहार लगाई थी
मणिपुर हिंसा से व्यथित झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने 22 जुलाई 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम मार्मिक चिट्ठी लिखी. बंगाल के संदर्भ में राष्ट्रपति के बयान आने के बाद हेमंत सोरेन के उस पत्र के मार्मिक पहलुओं पर हमें गौर करना चाहिए. हेमंत सोरेन ने मणिपुर हिंसा पर राष्ट्रपति को चुप्पी तोड़ने का आग्रह किया था. पत्र में उन्होंने कहा था कि क्रूरता के सामने चुप्पी साधना भी भयानक अपराध है. झारखंड के मुख्यमंत्री और देश के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मणिपुर घटना को लेकर काफी व्यथित और चिंतित हूं. सीएम ने लिखा था कि दो दिन पहले मणिपुर का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ, जिसमें महिलाओं के साथ ऐसी बर्बरता दिखी है, जिसके बारे में जिक्र भी नहीं किया जा सकता. इस वीडियो ने हम सभी को व्याकुल कर दिया है.
मणिपुर हिंसा पर कोई आधिकारिक बयान क्यों नहीं आया?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में कहा था कि मणिपुर में आदिवासी महिलाओं के साथ जिस तरह से बर्बरतापूर्ण व्यवहार हुआ, वह अत्यंत चिंतनीय और निंदनीय है. इस घटना ने पूरे देश को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है. भारत के संविधान में देशवासियों को प्राप्त सम्मान के अधिकार को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है. राष्ट्रपति से मुख्यमंत्री ने पत्र में आग्रह किया था कि मणिपुर और देश के सामने संकट की इस घड़ी में हम आपको आशा और प्रेरणा के अंतिम स्रोत के रूप में देखते हैं जो इस कठिन समय में मणिपुर के लोगों को रोशनी दिखा सकतीं हैं. हमें अपने साथी आदिवासी भाइयों और बहनों के साथ हो रहे बर्बर व्यवहार को रोकना होगा.
मणिपुर हिंसा को लेकर राष्ट्रपति की खामोशी पर विपक्ष ने सवाल उठाए थे, लेकिन इस संबंध में कभी कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। आमतौर पर राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर कार्य करते हैं, और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर उनकी चुप्पी को संवैधानिक सीमाओं या सरकार के रुख से जोड़कर देखा जाता है।
नये संसद भवन के उद्घाटन में राष्ट्रपति की उपेक्षा क्यों ?
नए संसद भवन के उद्घाटन के समय संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति के पद की गरिमा को तार-तार किया गया. 28 मई 2023 के दिन नये संसद भवन का उद्घाटन हुआ. भारतीय लोकतंत्र के इस ऐतिहासिक दिन में राष्ट्रपति को आमंत्रण नहीं मिलना संसदीय परम्परा का अपमान था. कायदे से तो नए संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति को करना चाहिए था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ऐतिहासिक क्षण को अपने नाम दर्ज करना चाहते थे. हालांकि इसके पक्ष-विपक्ष में कई तर्क गढ़े गए. लेकिन अधिकतर लोगों ने यही कहा कि आदिवासी होने के कारण द्रौपदी मुर्मू को नए संसद भवन से दूर रखा गया. लेकिन संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद राष्ट्रपति ने इस पूरे प्रकरण में चुप्पी साधे रखी. यह उनकी मजबूरी थी. देश भर में इस प्रकरण में लंबी बहस छिड़ गई थी. कई संवैधानिक विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों ने सवाल उठाया कि क्या यह राष्ट्रपति पद की गरिमा को कमतर करने वाला कदम नहीं था। फिर कैसे माना जाए कि भाजपा वास्तव में राष्ट्रपति पद के सम्मान को लेकर गंभीर है.
राम मंदिर समारोह से राष्ट्रपति को क्यों दूर रखा गया ?
अयोध्या में बने राम मंदिर को भाजपा ने अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक अभियान का सबसे बड़ा प्रतीक बनाया। भूमि पूजन से लेकर प्राण प्रतिष्ठा समारोह तक हर बड़े कार्यक्रम में प्रधानमंत्री और भाजपा नेतृत्व रहा। लेकिन देश की राष्ट्रपति को उस ऐतिहासिक अवसर पर वह प्रमुख स्थान नहीं मिला, जिसकी उम्मीद की जा सकती थी।
राजनीतिक लाभ के लिए आदिवासी पहचान का इस्तेमाल करने के लिए राष्ट्रपति पद पर आदिवासी महिला का होना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संदेश हो सकता था। लेकिन अगर उसी समय आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण, खनन परियोजनाओं और विस्थापन के सवाल उठते रहें, तो यह प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाता है। इस बारे में राष्ट्रपति ने अपनी कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी? पूर्व राष्ट्रपति रामकोविंद को भी समारोह से दूर रखा गया. इससे भाजपा की मानसिकता उजागर हो गई. लेकिन सत्तापक्ष की ओर तमाम कुतर्क पेश किए गए. यही काम मेनस्ट्रीम मीडिया ने भी किया.
दरअसल, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सम्मान के बहाने ममता बनर्जी को आदिवासी विरोधी बताकर आदिवासी-दलित कार्ड खेलने का प्रयास किया जा रहा है. लेकिन राष्ट्रपति का कई बड़े अवसरों पर जिस तरह से अनादर किया गया, वह भारतीय राजनीतिक इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. सत्ता के इशारे पर राष्ट्रपति हो या राज्यपाल, इन्हें काम करना पड़ता है, यह भी इतिहास में दर्ज होता रहा है और आगे भी होता रहेगा. यही भी कटू सत्य है.
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