मनोज कुमार झा
आख़िरकार देश को वह ऐतिहासिक क्षण प्राप्त हुआ जिसका इंतज़ार शायद वैश्विक अर्थशास्त्री, नीति आयोग, राशिफल विशेषज्ञ और टीवी डिबेट एंकर- सभी मिलकर कर रहे थे. पांच राज्यों के चुनाव समाप्त होते ही राष्ट्र को संयम, त्याग और मितव्ययिता का संदेश प्राप्त हुआ.
लोकतंत्र का यह सौंदर्य अद्भुत है कि जनता पहले कई सप्ताह तक विकास, राष्ट्रवाद, सभ्यता-संकट और भावनात्मक ध्रुवीकरण के महास्नान में भाग लेती है, फिर मतदान समाप्त होते ही उसे बताया जाता है कि अब पेट्रोल कम जलाइए, तेल कम खाइए, सोना मत खरीदिए, विदेश मत जाइए और घर बैठकर काम कीजिए.
हरिशंकर परसाई होते तो शायद लिखते कि यह वही देश है जहां जनता से त्याग की अपील उतनी ही सहजता से की जाती है जितनी सहजता से नेता उद्घाटन करते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि उद्घाटन का फीता सरकार काटती है और त्याग का बिल जनता भरती है.
राष्ट्रीय संकट भी शायद अब चुनाव आयोग की अनुमति से ही देश में प्रवेश करते हैं
मैं तो प्रधानमंत्री की इन चिंताओं को ढाई महीने बाद हासिल कर पुलकित हो बैठा. वरना असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी के चुनावों ने ऐसा आभास करवा दिया था मानो युद्ध, महंगाई और वैश्विक संकटों को कोई अदृश्य कवच भारत की सीमाओं से बाहर रोके हुए हो. अब जाकर समझ आया कि प्रधानमंत्री जी गायब नहीं थे; वे बस लोकतंत्र की पवित्र प्रक्रिया पूरी होने का इंतज़ार कर रहे थे. राष्ट्रीय संकट भी शायद अब चुनाव आयोग की अनुमति से ही देश में प्रवेश करते हैं.
यह जानकर भी गहरा संतोष हुआ कि देश की आर्थिक चुनौतियां अचानक चुनाव परिणाम आने के बाद ही गंभीर हुई हैं. उससे पहले शायद महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार और तेल की कीमतें आदर्श आचार संहिता का सम्मान कर रही थीं. शरद जोशी होते तो शायद लिखते- ‘हमारे यहां समस्याएं भी बहुत संस्कारी होती हैं; चुनाव तक चुपचाप कोने में बैठी रहती हैं.’
प्रधानमंत्री ने नागरिकों से अपील की है कि पेट्रोल-डीज़ल कम इस्तेमाल करें, मेट्रो में चलें, कार पूल करें. यह सलाह निश्चित ही उन लोगों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक होगी जो पहले से ही बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण अपनी मोटर साइकिल को घर में किसी पारिवारिक विरासत की तरह खड़ी करके देखते हैं.
देश का मध्यमवर्ग पिछले कई वर्षों से अनौपचारिक रूप से इस ‘राष्ट्रीय सेवा’ में लगा हुआ है; फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसे सरकारी मान्यता भी मिल गई है.
पहले लोग मजबूरी में कम पेट्रोल भरवाते थे, अब राष्ट्रहित में कम भरवाएंगे. इस प्रकार आर्थिक विवशता को नैतिक उपलब्धि में बदल देने की कला शायद भारतीय शासन-व्यवस्था की सबसे बड़ी प्रशासनिक उपलब्धि है.
वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने का रोचक सुझाव
वर्क फ्रॉम होम को फिर से बढ़ावा देने का सुझाव भी कम रोचक नहीं है. यही व्यवस्था कुछ समय पहले ‘ऑफिस संस्कृति’ और उत्पादकता के लिए खतरा बताई जा रही थी. कर्मचारियों को समझाया गया था कि राष्ट्र निर्माण केवल दफ़्तर की कुर्सी पर बैठकर ही संभव है. लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही व्यवस्था राष्ट्रभक्ति का उपकरण बन गई.
श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ का कोई पात्र शायद इस पर टिप्पणी करता- ‘व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह हर फैसले को परिस्थिति नहीं, राष्ट्रहित साबित कर देती है.’
सबसे भावुक अपील सोना खरीदने को लेकर आई. भारतीय परिवारों से कहा गया कि वे कम-से-कम एक वर्ष तक विवाहों में सोना खरीदने से बचें. यह अपील केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक तपस्या की भी मांग करती है. भारतीय परिवारों में सोना धातु कम, सामाजिक आत्मविश्वास अधिक होता है.
सदियों से संजोए गए गहनों के सपने अब विदेशी मुद्रा भंडार के नाम समर्पित किए जाएंगे. कल्पना कीजिए- अब रिश्तेदार पूछेंगे, ‘बहू को क्या दिया?’ और जवाब मिलेगा- ‘राष्ट्रहित.’ संभव है जल्द ही विवाह कार्डों पर यह पंक्ति भी छपने लगे- ‘कृपया आशीर्वाद दें, सोना राष्ट्र निर्माण हेतु स्थगित किया गया है.’
अब घर में रहना राष्ट्रभक्ति है
विदेश यात्राएं सीमित करने और ‘वेड इन इंडिया (Wed in India)’ का आह्वान भी समयानुकूल है. यह अलग बात है कि जिन लोगों ने पिछले वर्षों में विदेशी दौरों को विकास का राजमार्ग बताया था, वही अब घरेलू पर्यटन को त्याग और तपस्या का प्रतीक बना रहे हैं. कुछ समय पहले विदेश यात्रा आधुनिकता थी, अब घर में रहना राष्ट्रभक्ति है. संभव है जल्द ही गोवा जाना आत्मनिर्भरता और नेपाल जाना विदेशी साज़िश घोषित कर दिया जाए.
‘वोकल फॉर लोकल’ का संदेश भी फिर लौट आया है. विचार बुरा नहीं है. समस्या केवल इतनी है कि इसे हर संकट के समय ऐसे निकाला जाता है जैसे दादी मां की वह पुरानी दवा जिसे हर बीमारी में उपयोगी माना जाता था- चाहे बुखार हो, बेरोज़गारी हो, व्यापार घाटा हो या वैश्विक मंदी. परसाई जी शायद कहते- ‘हमारे यहां नारे इसलिए अमर रहते हैं क्योंकि समस्याएं कभी मरती नहीं.’
‘उत्पादन घटे तो भी मुस्कुराइए, क्योंकि यह हरित राष्ट्रवाद का हिस्सा है’
किसानों को रासायनिक उर्वरक आधे करने और प्राकृतिक खेती अपनाने की सलाह दी गई है. यह सलाह उन किसानों तक भी पहुंचेगी जो पहले ही लागत, मौसम, कर्ज़ और बाज़ार के बीच किसी त्रासद व्यंग्य के पात्र की तरह जीवन जी रहे हैं. अब उनसे कहा जा रहा है कि उत्पादन घटे तो भी मुस्कुराइए, क्योंकि यह हरित राष्ट्रवाद का हिस्सा है. भारतीय किसान शायद दुनिया का अकेला ऐसा जीव है जिससे हर संकट में त्याग की अपेक्षा की जाती है और हर चुनाव में उम्मीद की.
और हां, खाने में तेल कम इस्तेमाल करने की सलाह भी दी गई है. प्रधानमंत्री जी ने क्या ही अनुपम नारा दिया- ‘देह-सेवा भी, देश-सेवा भी.’ मैं सोचता हूं कि क्यों न अब हर मोहल्ले में एक ‘तेल निरीक्षण दस्ता’ भी गठित कर दिया जाए, जो औचक निरीक्षण कर बताए कि किस परिवार ने राष्ट्रभक्ति से अधिक सरसों का तेल प्रयोग कर लिया. भविष्य में संभव है रसोई गैस की लौ देखकर नागरिकता का स्तर तय किया जाए.
अपीलों में ‘सरकार’ कहीं दिखाई नहीं देती. त्याग हमेशा नागरिक करेंगे
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन सारी अपीलों में ‘सरकार’ कहीं दिखाई नहीं देती. त्याग हमेशा नागरिक करेंगे. पेट्रोल जनता कम जलाएगी, सोना जनता नहीं खरीदेगी, यात्राएं जनता रोकेगी, तेल जनता बचाएगी. सत्ता का योगदान मुख्यतः नैतिक अपीलों तक सीमित रहेगा. यह एक ऐसा आर्थिक मॉडल है जिसमें कठिनाइयां निजी हैं और भाषण सार्वजनिक.
लेकिन असली प्रश्न यह नहीं है कि ये सुझाव अच्छे हैं या बुरे. कुछ सुझाव व्यावहारिक भी हो सकते हैं. असली प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रीय संकटों की समझ भी अब चुनावी कैलेंडर देखकर सक्रिय होती है? यदि परिस्थितियां इतनी गंभीर थीं, तो यह आग्रह मतदान से पहले क्यों नहीं आया? क्या राष्ट्रहित भी अब आचार संहिता हटने के बाद ही लागू होता है?
भारतीय लोकतंत्र में शायद अब एक नया मौसम जोड़ देना चाहिए; गर्मी, बारिश, सर्दी और ‘चुनाव-उपरांत त्याग काल’. चुनाव के दौरान नागरिक ‘विकास’ सुनेंगे और चुनाव के बाद ‘संयम’ का पाठ पढ़ेंगे. राष्ट्र आखिरकार आत्मनिर्भर बन ही रहा है- कम-से-कम अपने त्याग और तपस्या में.
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं.)
(द वायर से साभार)
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