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Friday, June 26, 2026
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चंदे की लूट की कारस्तानियां सामने आने के बावजूद आरएसएस प्रमुख भागवत और प्रधानमंत्री खामोश क्यों हैं?

सच कहा जाए तो आज धर्म के व्यापारी सत्ता पर काबिज हो गये हैं। आज के टोपीबाज सनातन के नाम पर मंदिरो को लूट रहे है. सरकार मे बैठे नुमाइंदे हिंदुत्व के नाम पर सत्ता मे बने हैं. साल 2019 में भाजपा सरकार ने एक झटके में हिंदुओं के 51 पौराणिक मंदिरों पर सरकारी कब्जा कर लिया था, ‘चारधाम देवस्थानम प्रबंधन विधेयक’ लाकर जिसके खिलाफ पुरोहितों को सड़कों पर उतरना पड़ा। रामजन्म भूमि में लूट की गाथा सामने आने के बाद भी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और हमारे प्रधानमंत्री खामोश हैं.

इसके ठीक उलट, 15 अगस्त 1947 आजादी के तुरंत बाद जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की बात आई, तो नेहरू सरकार ने 1951 में बिना किसी राजनीतिक ड्रामे के सरकारी तंत्र और मंत्रियों के जरिए ट्रस्ट को जमीन और प्रशासनिक सहयोग ट्रांसफर करवाया था।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर प्राचीन भूगोल-इतिहास को उजाड़ दिया गया

​सनातनी आस्था का ढोल पीटने वाली इस सरकार ने साल 2018 से 2021 के बीच काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर वाराणसी के प्राचीन भूगोल को उजाड़कर रख दिया, जिसमें मणिकर्णिका और दशाश्वमेध घाट के आसपास के करीब 296 से अधिक ऐतिहासिक भवनों और दर्जनों स्वयंभू पौराणिक विग्रहों को मलबे में तब्दील कर दिया गया।

नेहरू जी का विजन मंदिरों पर कब्जा करना नहीं था

दरअसल, देश के प्रथम्र प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू जी का विजन मंदिरों पर कब्जा करना नहीं था, बल्कि उन्होंने ‘द होली प्लेसेज एंड रिलिजियस एंडोमेंट्स एक्ट’ बनाकर देश भर के हजारों प्राचीन मंदिरों की अरबों रुपये की संपत्तियों को भू-माफियाओं से हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया था।

जरा याद करो इतिहास, 3 फरवरी 1954 के प्रयागराज महाकुंभ को, जब प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू खुद किसी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं बल्कि एक आम सनातनी की तरह त्रिवेणी संगम में स्नान करने पहुंचे थे।

नेहरू सरकार ने उस 1954 के महाकुंभ के भव्य और सुरक्षित आयोजन के लिए अपने पहले ही दशक के बजट में ₹1,20,00,000 (1.2 करोड़ रुपये) से अधिक का भारी-भरकम फंड सीधे जारी किया था, ताकि देश के कोने-कोने से आने वाले करोड़ों सनातनी श्रद्धालुओं को कोई असुविधा न हो।

​साल 2014 से 2022 के बीच देश भर के टीवी चैनलों पर हिंदू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद के मुद्दों पर 5,000 से अधिक नफरती डिबेट्स कराई गईं ताकि जनता महंगाई और बेरोजगारी भूलकर आपस में लड़ती रहे।

जबकि नेहरू जी ने देश के खजाने का इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए नहीं, बल्कि 1950 के दशक में ही आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) का सालाना बजट लाखों रुपये तय करके खजुराहो, कोणार्क और दक्षिण भारत के 400 से अधिक अत्यंत प्राचीन और भव्य मंदिरों के जीर्णोद्धार और दोबारा निर्माण के लिए सीधा फंड जारी किया था।

नेहरू जी के इसी दूरदर्शी फैसले के कारण हमारे वे प्राचीन मंदिर आज भी पूरी दुनिया में सनातन संस्कृति का गौरव बढ़ा रहे हैं, जिन्हें बिना किसी शोर-शराबे और विवाद के सरकारी खजाने से संरक्षित किया गया था।

​आंकड़े गवाह हैं कि दक्षिण भारत के 4 लाख से अधिक हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने का झुनझुना थमाने वाली बीजेपी ने अपने 12 साल के इस कार्यकाल में एक भी बड़े मंदिर को आजाद नहीं किया, बल्कि कैग (CAG) की रिपोर्ट्स के मुताबिक मंदिरों के चढ़ावे का 15% से 20% हिस्सा आज भी प्रशासनिक खर्चों में उड़ाया जा रहा है।

दूसरी तरफ, पंडित नेहरू ने देश के प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और वेदों के वैज्ञानिक महत्व को सहेजने के लिए नेशनल म्यूजियम और नेशनल मैनुस्क्रिप्ट लाइब्रेरी की नींव रखी थी, जिसके तहत सनातनी इतिहास की लाखों दुर्लभ पांडुलिपियों को सहेजने के लिए लाखों रुपये का विशेष बजट अलॉट किया गया था।

कांग्रेस की इसी नीतिगत निष्ठा और सनातन के मूल गौरव को बिना तमाशा बनाए जिंदा रखने की नीयत के कारण ही पारंपरिक हिंदुओं ने हमेशा नेहरू जी और उनकी सरकार का दिल से सम्मान किया।

भाजपा ने सिर्फ कॉरपोरेट इवेंट्स व पीआर स्टंट्स में पैसे उढ़ाने का काम किया 

​साल 2014 से 2022 के केंद्रीय बजटों को खंगाल लीजिए, बीजेपी सरकार ने पारंपरिक संस्कृत पाठशालाओं, वेद विद्यालयों और गुरुकुलों के विकास के लिए कुल सांस्कृतिक बजट का 5% हिस्सा भी नहीं दिया, सारा पैसा सिर्फ कॉरपोरेट इवेंट्स और पीआर स्टंट्स में उड़ा दिया गया।

जबकि नेहरू सरकार के समय सनातन संस्कृति की रीढ़ माने जाने वाले संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष आयोग बनाए गए और धार्मिक मेलों व अमरनाथ यात्रा जैसी कठिन सनातनी परंपराओं के सुचारू संचालन के लिए हर साल जिला प्रशासनों को विशेष फंड्स ट्रांसफर किए जाते थे।

अब देश के हर प्रबुद्ध नागरिक को यह समझना होगा कि कौन वास्तव में सनातन की मर्यादा और उसके ऐतिहासिक गौरव को बिना ढोल पीटे सींच रहा था, और कौन सिर्फ मंदिर तोड़ने और मस्जिद के नाम पर अपनी सत्ता की गद्दी महफूज रखने का खेल खेल रहा है ? अब देखना है कि करोड़ों की उगाही करनेवालों के कारनामों के खिलाफ आखिर कोर्ट कैसे और किस तरह से इंसाफ करता है?  


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