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Thursday, October 1, 2026
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स्टीरियो टाइप भाषण से अब अवाम ऊब चुका है:  महामानव…ने अर्बन नक्सल की जगह ‘दिमागी नक्सल’ जैसे नए शब्द के सहारे अपनी भड़ास जरूर निकाली

नारायण  विश्वकर्मा
लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 1 घण्टे का उबाऊ और झूठों से भरा का यह 13वां भाषण था. वैसे स्टीरियो टाइप भाषण का पू्र्वानुमान अब लोगों को पहले से हो जाता है. कुछ लोगोंं ने यह भी अनुमान लगाया होगा कि संसद के मानसूून सत्र की कमी शायद वह लाल किले से पूरा करेंगे, अलबत्ता… अर्बन नक्सल की जगह ‘दिमागी नक्सल’ जैसे नए शब्द गढ़ कर विपक्ष और खासकर जंतर मंतर की भीड़ को अराजक तत्व से जोड़कर अपनी भड़ास जरूर निकाल ली.

भाषण के शुरुआत में ही पीएम मोदी ने साफ कर दिया कि वे पिछले 12 सालों के अपने शासनकाल रिपोर्ट कार्ड पेश करने नहीं आए हैं और न ही हाल-फिलहाल के सालों में उनका कुछ खास करने का इरादा है।

पीएम का पूरा भाषण संकल्प, संकल्प से सिद्धि, सामर्थ्य, आत्मनिर्भर, शक्ति, साहस, पराक्रम, परिश्रम, नई ताकत, नई उमंग, श्रेष्ठ भारत, भव्य भारत, स्टार्टअप, नवाचार जैसे रेटोरिक से भरा था। ऐसे भाषणों को ही राशन समझ कर हजम करना होगा.

मोदी के भाषण मे हमेशा बङे-बङे भारी शब्दों का उपयोग किया जाता है, जिसका असल में धरातल पर कोई मतलब नहीं होता लेकिन उनके जैसे शिक्षा से वंचित लोग सोचते हैं कि कुछ अच्छा ही बोला होगा. इस बात पर ताली भी बजानी चाहिए और तारीफ भी करनी चाहिए।

उन्होंने अपने भाषण में ‘विकसित भारत’ बनाने की तारीख 2024 से बढ़ा कर 2047 कर दी है। यानी नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार 2047 में ही कुछ करने वाले हैं. 

प्रधानमंत्री और भाजपा जिस वादे के साथ 2014 में सत्ता में आए थे असल में 12 साल बाद भी उन वादों के बारे में बताने के लिए इनके पास कोई ठोस जवाब आज भी नहीं है।

इसलिए 2014 के अपने वादे काला धन वापस आएगा, नमामि गंगे योजना, मेक इन इंडिया जैसे लॉलीपॉप योजनाओं पर एक शब्द नहीं बोला।

भारत निर्यात के मामले में बेहद फिसड्डी 

पीएस ने एक घण्टे के भाषण में ‘आत्मनिर्भर भारत’ शब्द का प्रयोग लगभग पचास बार किया होगा लेकिन भारत की स्थिति आत्मनिर्भरता के बारे में इतनी पतली है कि उसकी कोई सीमा नहीं है। 

नरेंद्र मोदी आत्मनिर्भरता जैसे झूठ को इतनी बार दोहरा चुके हैं फिर भी सच प्रतीत नहीं होता. हकीकत में भारत निर्यात के मामले में बेहद फिसड्डी साबित हो चुका है। आंकड़े इसकी गवाही देते हैं.

भाषण के बीच में ही AI और गूगल का इस्तेमाल कर नरेंद्र मोदी के भाषण को क्रॉस चेक करने से पता चलता है कि लाल किले की प्राचीर से खुला और साफ झूठ परोसने वाले भारत के पहले और ओजस्वी भाषणबाज प्रधानमंत्री साबित कर चुके हैं.

नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि भारत का उत्पाद विश्वभर में पहुंच रहा है। लेकिन मौजूद आंकड़े बताते हैं कि भाजपा सरकार आने के बाद चीन, सऊदी अरब, यूएई, स्विट्जरलैंड और अमेरिका से कई सौ फीसदी आयात बढ़ा है। 

चीन से भारत का आयात बढ़ा है। इसमें कोई विवाद नहीं। 2020-21 में $65.21 बिलियन से 2024-25 में $113.45 बिलियन हुआ। अलबत्ता हर चीनी आयात को “भारत की आत्मनिर्भरता खत्म” कहना अर्थशास्त्र का थोड़ा कार्टून वर्जन लगता है.

पीएम का यूरिया वाला दावा अर्द्धसत्य: भारत आज भी आयातित खाद पर निर्भर है

यूरिया वाला दावा भी आधा-सच है। भारत आज भी आयातित खाद पर निर्भर है—क्योंकि घरलू उत्पादन और मांग के बीच बहुत बड़ा गैप है। लेकिन किसान को सब्सिडी के कारण नियंत्रति मूल्य पर यूरिया मिलता है। उवर्रक विभाग के अनुसार 45-केजी.यूरिया की वर्तमान एमआरपी  ₹242 है. यानी “₹3,000 की बोरी ₹350 में दे रहे हैं = आत्मनिर्भरता झूठ है. और सबसे मजेदार बात—“भारत आत्मनिर्भर है तो आयात पर अधिक निर्भर क्यों है?”

हालांकि आत्मनिर्भरता का अर्थ जीरो आयात नहीं होता। अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी जैसे देश भी आयात करते हैं. असली सवाल यह है कि क्रिटिकल डिपेंडडेंस कितनी घट रही है और घरेलू मूल्य एडिशन कितनी बढ़ रही है।

दूसरा खुला झूठ उन्होंने बोला कि जो यूरिया की बोरी सरकार को 3000 में मिलती है वह उसे किसानों को 350 रुपये में दे रहे हैं। मोदी जी जब भारत आत्मनिर्भर हो चुका है तो 3000 रुपये में यूरिया की बोरी चीन, ओमान, रूस से क्यों खरीद रहे हैं?
तीसरी अजीब बात उन्होंने बोली कि हमारे खेतों का सामान ग्लोबल मार्केट में जाना चाहिए। ग्लोबल ब्रांड बनना चाहिए, लेकिन जिस अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ नरेंद्र मोदी गलबहियां करते हैं उसी ने भारत के आम और चावल को लेने से इनकार कर दिया। इनकार ही नहीं किया बल्कि उसने फटकार भी लगाई। पचासों घटिया उत्पाद और मानक के अनुरूप प्रेस्टिसाइड न प्रयोग करने के कारण कई देशों ने भारतीय उत्पादों को लेने से इनकार कर दिया है।

चौथा झूठ बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि मेडिकल की 450 सीट से बढ़कर 850 सीटें हो गई हैं और विदेशी यूनिवर्सिटीज भारत में दिलचस्पी ले रही हैं। समस्या सिर्फ इतनी है कि यह सब सिर्फ नरेंद्र मोदी की दिव्य आंखों को ही नज़र आ रहा है।

देश की एकता के दिन भी पीएम ने आदतन अपना “दिमाग़ी नक्सल“ बोल के बँटवारा कर दिया. जो आदमी वर्तमान और भविष्य के बारे में इतना झूठ बोलता है तो अपनी पुरानी आपबीती के बारे में तो जाने क्या मन गढ़ंत कहानियाँ रची होंगी.

चायना ट्रेड डेफिसिट क्यों बना हुआ है?

बुनियादी सवाल आज भी कायम है. मसलन…मजदूर को काम चाहिए. जनता को रोजगार चाहिए. युवाओं को नौकरियां चाहिए. बच्चों को अच्छी शिक्षा चाहिए. किसानो‌ की मेहनत का फल चाहिए. यही विकसित भारत का स्वरूप होना चाहिए.

फिर वर्तमन शिक्षा और हेल्थ केयर की गुणवत्ता कैसी है? मेन्यूफैक्चरिंग में घरेलू एडिशन कितना है? चायना ट्रेड डेफिसिट क्यों बना हुआ है? अब लोग पलायन कर गांव से शहर आ रहे हैं और सच में अगर गांव में स्वास्थ्य और शिक्षा बेस्ट हो जाए तो परिवार पर आर्थिक बोझ कम हो जाएगा.

पीएम की जेब पर आयरलेंड का झंडा…!

पीएम की जेब पर आयरलेंड का झंडे वाले मुद्दे से किरकिरी हुई है. इस तस्वीर में दिख रहा रंगों का क्रम भारतीय तिरंगे के अनुसार सही नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 80वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2026) के भाषण की वास्तविक तस्वीर है, जिसमें उनकी जैकेट की पॉकेट पर लगा पॉकेट स्क्वायर (रूमाल) उलटे क्रम में लगा हुआ है। इस पहनावे में तिरंगे का क्रम गलत होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
रंगों का गलत क्रम: भारत के राष्ट्रीय ध्वज का सही क्रम हमेशा ऊपर से नीचे (या बाएं से दाएं) केसरिया, सफेद और हरा होता है. लेकिन इस फोटो में आप स्पष्ट देख सकते हैं कि बाएं से दाएं रंगों का क्रम हरा, सफेद और केसरिया दिखाई दे रहा है. आयरलैंड के ध्वज जैसा दिखना: इस उलटे क्रम (हरा, सफेद, केसरिया) के कारण यह भारतीय तिरंगे के बजाय हूबहू आयरलैंड के राष्ट्रीय ध्वज जैसा नजर आ रहा है.

 


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