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Friday, October 2, 2026
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देश में दिमागी नक्सलियों को गिनते-गिनते सिस्टम थक जाएगा, पर गिनती कभी खत्म नहीं होगी

अर्बन नक्सल की जगह पीएम ने जेन जी के लिए दिमागी नक्सल के नाम से नया शब्द खोज लिया है…!

नारायण विश्वकर्मा
लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के दिमागी नक्सली वाले बयान पर घिरने के बाद उन्हें मीडिया में खूब ट्रोल किया जा रहा है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता पी. चिदंबरम ने पलट कर कह दिया कि मुझे दिमागी नक्सली होने पर गर्व है. इस पर संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू तुरंत सफाई दी. पीएम ने विपक्षी नेताओं को दिमागी नक्सली नहीं कहा. उनके मुताबिक माओवादियों-अलगाववादियों का समर्थन करने व संविधान को नकारनेवाले दिमागी नक्सली हैं.
अब जरा दिमागी नक्सलियों को लेकर पीएम के बयान पर गौर फरमाएं. पीएम ने कहा कि देश में जंगलों से हथियारबंद नक्सलियों को खत्म करने में सफल रहा है, लेकिन दिमागी नक्सली सोच रखनेवाले लोग वर्षों तक सत्ता के गलियारों में जगह बनाते रहे और सरकारी समितियों में सलाहकार की भूमिका निभाकर नीति निर्माण को प्रभावित करते रहे.
संसदीय कार्यमंत्री की सफाई थोडे दिमाग वाला भी समझ गया.  पीएम के बयान को पी. चिदंबरम ने पीएम के बयान को खूब बढ़िया से समझा है. इसके बाद ही उनकी त्वरित टिप्पणी आई. जबकि किरेन रिजिजू ने लीपापोती करने की कोशिश की है. इससे पूर्व सत्ता के गलियारे में कौन था रिजिजू जी ? वही कांग्रेस है न…जो आज विपक्ष की भूमिका में सत्तापक्ष के नीति निर्माण पर प्रहार कर रही है. याद रहे… देश में अगर बंददिमाग-बददिमाग वाले हैं तो कुछ दिमागवाले भी हैं. ऐसे लोग अब खुले दिमाग से सरकार से सवाल पूूूूछ रहे हैं. ये सदियों से होता आया है. इसे रोकने की ताकत हुकूमत में नहीं है. 
सच कहा जाए तो अर्बन नक्सल की जगह पीएम ने जेन जी के लिए दिमागी नक्सल के नाम से नया शब्द खोज लिया है. लेकिन जंतर मंतर से जो क्रांति का अंकूर फूटा है, उसे विपक्ष का साथ मिल रहा है. यह हुकूमत के लिए नाकाबिले बर्दाश्त है. लेकिन अब देश का माहौल 2019 वाला नहीं है. 2024-2025 से देश में दिमागी नक्सलियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि गिनते-गिनते सरकार के कैलकुलेटर जवाब दे जाएंगे। दिमागी नक्सलियों को गिनना अब संभव नहीं रह गया है. यही सत्तापक्ष के लिए मुसीबत बनने लगा है.
वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वाल पर दिमागी नक्सलियों को लेकर हुकूमत से कई सवाल पूछे गए हैं. वे कहते हैं- पिछले पांच साल से मैं सोच रहा था कि जिस आदमी के भीतर व्यवस्था के प्रति गुस्सा हो, जिसके साथ अन्याय हुआ हो, जो सत्ता और संस्थाओं से सवाल करता हो, लेकिन बंदूक न उठाए, सड़क पर हिंसा न करे और कानून का रास्ता न छोड़े, उसे आखिर किस श्रेणी में रखा जाए? अब प्रधानमंत्री जी ने वह श्रेणी बता दी है। कोई बताए कि इस देश में ऐसा कौन है जिसे कभी न कभी व्यवस्था ने परेशान नहीं किया ?
उन्होंने अपने लेख में कहा है किसी की नौकरी गई, किसी की जमीन फंसी, किसी का कारोबार डूबा, किसी की शिकायत पर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, किसी को सरकारी दफ्तरों ने दौड़ाया, किसी को अदालत में सालों इंतजार करना पड़ा और किसी को लगा कि सत्ता के सामने उसकी कोई हैसियत ही नहीं है। करोड़ों लोगों के भीतर व्यवस्था को लेकर कोई न कोई शिकायत है। हताशा है. निराशा है.
किसी ने उस हताशा में बंदूक उठा ली तो वह नक्सली हो गया, लेकिन जिसने बंदूक नहीं उठाई, जिसने अपने गुस्से को भीतर दबाए रखा, लेकिन बोलकर, लिखकर, प्रदर्शन करके और अदालत जाकर अपना विरोध दर्ज कराया, उसका क्या करेंगे ? उसे दिमागी नक्सली कह देंगे ?
वे कहते हैं कि मेरे हाथ में न बंदूक है, न कोई हथियार। मेरे पास कानून है और दिमाग है। प्रधानमंत्री जी के शब्दकोश में व्यवस्था से पीड़ित, व्यवस्था से नाराज, सरकार की नीतियों से असहमत, अपने अधिकार के लिए लड़ने वाला और कानून के रास्ते पर चलने वाला आदमी दिमागी नक्सली है, तो इस देश में हर वह आदमी दिमागी रूप से नक्सली है जो व्यवस्था की नीति से पीड़ित है।

दिमागी नक्सली को सजा भी नहीं दे सकते

आपने हथियार वाले नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई की बात की है। बिल्कुल कीजिए। हिंसा का समर्थन कौन करेगा? लेकिन एक बात समझिए, हर असहमति को नक्सलवाद का नाम दे देने से लोगों के भीतर की आग बुझती नहीं है। उलटे आदमी को लगता है कि उसकी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं है और उसकी आवाज को सवाल का जवाब देने के बजाय एक लेबल दे दिया गया है।  दिमागी नक्सली को आप सजा भी नहीं दे सकते।
दिमागी नक्सलियों को गिनते-गिनते
 सिस्टम थक जाएगा, गिनती खत्म नहीं होगी।
मन के भीतर चली गोली पर कौन-सी धारा लगाएंगे ?
एक दूसरे फेसबुकिया रूपम गंगवार का कहना है कि हुकूमत दिमाग मुक्त भारत चाहता है. पहले नक्सल था। वह जंगल में मिलता था। फिर अर्बन नक्सल आया-वह विश्वविद्यालय, सेमिनार और किताबों के आसपास आइडेंटिफाई होता था। फिर टुकड़े-टुकड़े गैंग, खान मार्केट गैंग, आंदोलनजीवी जैसी राजनीतिक प्रजातियों की खोज हुईं।

मुमकिन है आनेवाले दिनों में नया सरकारी नारा सुनाई दे- “दिमाग मुक्त भारत”

क्योंकि दिमाग बड़ी बदतमीज चीज है। उसे GDP बताइए तो वह प्रति व्यक्ति आय पूछ देता है। उसे एक्सप्रेसवे दिखाइए तो वह टूटी सड़क का हिसाब मांगता है। उसे विश्वगुरु बताइए तो वह शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट खोल लेता है। उसे पांच ट्रिलियन डॉलर का सपना दिखाइए तो वह नौकरी की वैकेंसी पूछ बैठता है। उसे अमृतकाल कहिए तो वह पूछता है—अमृत किसके गिलास में है? इतनी बदतमीजी कोई दिमाग ही कर सकता है।

इसीलिए संभव है कि आने वाले दिनों में देश में नया सरकारी नारा सुनाई दे—

“दिमाग मुक्त भारत।” स्कूलों में बच्चों को चेतावनी दी जाएगी—

“बेटा, पढ़ो जरूर, लेकिन इतना मत पढ़ लेना कि सवाल पूछने लगो।” पत्रकारिता तो पहले से ही आसान की जा चुकी है अब और आसान हो जाएगी। पत्रकार का काम पूछना नहीं, पूछने से बच निकलना होगा।

“महंगाई क्यों बढ़ी?”

खतरनाक प्रश्न।

“प्रधानमंत्री आज कितने बजे उठे?”

राष्ट्रनिर्माण।

“बेरोजगारी का क्या हुआ?”

दिमागी नक्सलवाद।

“प्रधानमंत्री ने नाश्ता कैसे और कब किया ?”

सकारात्मक पत्रकारिता।

मतलब लड़ाई अब हथियार से नहीं, दिमाग से है।

और दिमाग का इलाज मुश्किल है।

उसे जेल में डालिए, विचार बाहर घूमता रहता है।

किताब हटाइए, PDF आ जाती है।

अखबार दबाइए, मोबाइल खुल जाता है।

पोस्ट हटाइए, स्क्रीनशॉट बच जाता है।

इसलिए नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी होनी चाहिए—

सोचना व्यक्ति के लिए लाभदायक, लेकिन सत्ता के लिए हानिकारक होता है।

दिमाग का प्रयोग सीमित मात्रा में करें।

सरकारी दावे सुनते समय उसे बंद रखें।

चुनाव के समय केवल उंगली चलाएं, दिमाग नहीं।

क्योंकि लोकतंत्र के इस नए संस्करण में शायद नागरिकों की दो ही श्रेणियां बचेंगी

– जो हर बात पर हां में सिर हिलाता है, वह राष्ट्रवादी।

– और जिसके सिर के अंदर कुछ हिलता है—वह “दिमागी नक्सल”!

 CJP के बाद एक नई पार्टी बनने की संभावना, जिसका नाम होगा- DNP यानी ‘दिमागी नक्सल पार्टी’

एक जागरूक दिमाग यह कहता है PM care fund दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला था, जिसका पैसा बीजेपी ने अपने हेड क्वार्टर बनाने में, नौकरशाही, न्यायपालिका को डराने धमकाने, मीडिया को खरीदने में लगाया है, सांसदों-विधायकों की खरीद फरोख्त में लगया है. कोई सवाल पूछे तो उसे अर्बन नक्सल बोल दो. ये जो फर्जी डिग्री लिए नेता बने हुए है. चोरी से सत्ता पर बैठे हैं. धीरे-धीरे लोग अब इनको पहचाने लगे हैं.

दरअसल, 12 साल से नये-नये जुमले गढ़ने और हिंदू-मुस्लिम कर समाज में जहर फैला कर बांटने के अलावा इन्होंने और किया ही क्या है। हां इनकी एक महान उपलब्धि अवश्य है और वो है अंधभक्त और दो कॉर्पोरेट घराने।

 


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