गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया
गुमला : – गुमला जिला मुख्यालय स्थित गुमला शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में श्री बड़ा दुर्गा मंदिर का अपना विशिष्ट स्थान है। यहां मां शेरावाली – मां दुर्गा की आराधना केवल नवरात्र और दशहरा का धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही ऐतिहासिक आस्था, विश्वास, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। हर वर्ष शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ ही श्री बड़ा दुर्गा मंदिर और आसपास का पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण से गूंजेमन हो उठता है। पूरे जिले से श्रद्धालु मां भवानी के दर्शन, पूजा-अर्चना और आशीर्वाद के लिए पहुंचते हैं।
बड़ा दुर्गा मंदिर का इतिहास गुमला शहर में माँ दुर्गा पूजा ( त्योहार ) के विकास की कहानी से जुड़ा है। स्थानीय बड़ा बुजुर्गों के अनुसार, गुमला में दुर्गा पूजा की सार्वजनिक परंपरा का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव सन् 1921 में बंगाली समुदाय की ओर से शुरू हुई पूजा थी। इसके लगभग दस वर्ष बाद,सन् 1931 में अधिवक्ता टोहन प्रसाद के नेतृत्व में स्थानीय सनातनी हिंदू समाज ने श्री बड़ा दुर्गा मंदिर में मां दुर्गा की भाव्य और आकर्षक प्रतिमा स्थापित कर भक्ति भाव से पूजा अर्चना शुरू की। इस प्रकार श्रीबड़ा दुर्गा मंदिर गुमला की सार्वजनिक मां सती और शक्ति की स्थापना कर माँ दुर्गा पूजा ( त्योहार ) के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
इतिहास की पृष्ठभूमि : तब गुमला आज जैसा शहर नहीं था
बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में गुमला आज की तरह विकसित शहरी केंद्र भी नहीं था। यहां की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे आकार ले रही थीं। इसी दौर में अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं ने शहर के सार्वजनिक जीवन को समृद्ध करना शुरू किया।
दैनिक हिन्दुस्तान की 9 सितंबर सन् 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, गुमला में सन् 1921 में बंगाली समुदाय ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। यह आयोजन जशपुर रोड स्थित दुर्गाबाड़ी में होता हैं। इसके बाद सन् 1931 में अधिवक्ता टोहन प्रसाद के नेतृत्व में स्थानीय हिंदू धर्मावलंबियों ने श्री बड़ा दुर्गा मंदिर में पूजा अर्चना शुरू की। टाइम्स ऑफ इंडिया की सन् 2012 की रिपोर्ट भी दुर्गाबाड़ी की सन् 1921 की परंपरा और बड़ा दुर्गा मंदिर की सन् 1931 में शुरू हुई पूजा का अलग-अलग उल्लेख करती है
सन् 1931 : बड़ा दुर्गा मंदिर की पूजा परंपरा का महत्वपूर्ण पड़ाव
यह शुरुआत उस समय के सामाजिक परिवेश में महत्वपूर्ण थी। उक्त पूजा के आयोजन ने गुमला जिले के लोगों को एक साझा धार्मिक मंच दिया, जहां सामूहिक भागीदारी के माध्यम से परंपरा को आगे बढ़ाया जा सके। समय के साथ श्री बड़ा दुर्गा मंदिर की पूजा अर्चना स्थानीय धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनती गई।
हालांकि, उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से श्री बड़ा दुर्गा मंदिर के पहले भवन की निर्माण-तिथि, मूल वास्तुशैली, शुरुआती स्थापित मूर्ति के स्वरूप और स्थापना के समय हुए खर्च का पूरा विवरण प्रमाणित नहीं होता। इसलिए इन विषयों पर निश्चित दावा करने के बजाय श्री बड़ा दुर्गा मंदिर समिति के अभिलेखों और पुराने स्थानीय दस्तावेजों से जानकारी जुटाना आवश्यक है।
मां दुर्गा की आराधना और शारदीय नवरात्र
श्री बड़ा दुर्गा मंदिर की पहचान मां दुर्गा की पूजा से है। शारदीय नवरात्र इस परंपरा का सबसे प्रमुख समय होता है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं के लिए मां दुर्गा की आराधना और पूजा अर्चना विशेष महत्व रखती है। पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और दशहरा से जुड़ी गतिविधियां पूरे क्षेत्र का वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं।
दुर्गा पूजा का धार्मिक आधार महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय की कथा से जुड़ा है। यह कथा बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अहंकार पर धर्म की विजय का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालुओं के लिए मां दुर्गा शक्ति, साहस और संरक्षण की प्रतीक हैं।
श्री बड़ा दुर्गा मंदिर में पूजा की वर्तमान विधि, प्रतिदिन के अनुष्ठान, पुरोहितों की परंपरा और विसर्जन की व्यवस्था का विस्तृत प्रमाणित विवरण सार्वजनिक स्रोतों में उपलब्ध नहीं है। इनका सटीक उल्लेख करने के लिए मंदिर समिति या पुराने पुजारी से पुष्टि की जानी चाहिए।
सन् 1921 और सन् 1931 : गुमला की दुर्गा पूजा के दो अलग ऐतिहासिक पड़ाव
गुमला में दुर्गा पूजा के इतिहास को समझने के लिए इन दोनों वर्षों का अंतर स्पष्ट रखना जरूरी है।
सन् 1921 — दुर्गाबाड़ी की शुरुआत: बंगाली समुदाय ने गुमला में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा शुरू की। शुरुआती दुर्गाबाड़ी का भवन साधारण था। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, आरंभिक आयोजन में बंगाली समुदाय के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पूजा के लिए पुरोहित तथा मूर्तिकार कोलकाता से बुलाए जाते थे।
सन् 1931 — बड़ा दुर्गा मंदिर की शुरुआत: इसके बाद स्थानीय हिंदू समाज ने अधिवक्ता टोहन प्रसाद के नेतृत्व में श्री बड़ा दुर्गा मंदिर में पूजा अर्चना शुरू की।
ये दोनों घटनाएं गुमला में सार्वजनिक दुर्गा पूजा के विस्तार को दर्शाती हैं। इन्हें एक ही मंदिर की स्थापना की तारीख मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
*मंदिर का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व*
मंदिर की महत्ता केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। धार्मिक आयोजन लोगों को एक साथ आने, परंपराओं को साझा करने और सामुदायिक संबंध मजबूत करने का अवसर भी देते हैं।
गुमला में दुर्गा पूजा की परंपरा समय के साथ कई पूजा समितियों और सार्वजनिक आयोजनों तक विस्तृत हुई , 2024 की हिन्दुस्तान रिपोर्ट में शहर में 12 स्थानों पर दुर्गा पूजा आयोजित होने का उल्लेख था। यह आंकड़ा उस समय की रिपोर्ट से संबंधित है; इसे वर्तमान वर्ष की निश्चित संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
श्री बड़ा दुर्गा मंदिर इस व्यापक धार्मिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां की पूजा परंपरा गुमला के शहरी इतिहास, स्थानीय समाज की धार्मिक भागीदारी और सामूहिक आयोजन की संस्कृति को समझने में मदद करती है।
*इतिहास के वे पन्ने, जिन पर अभी शोध बाकी है*
*बड़ा दुर्गा मंदिर की ऐतिहासिक रिपोर्ट को और अधिक प्रामाणिक बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर अभी जुटाए जाने चाहिए*
सन् – 1931 में पूजा शुरू कराने वाले अधिवक्ता टोहन प्रसाद और अन्य सहयोगियों का विस्तृत परिचय क्या था?
– शुरुआती पूजा किस स्थान या भवन में आयोजित की गई थी?
– मंदिर का स्थायी भवन कब बनाया गया और समय के साथ उसमें क्या बदलाव हुए?
– शुरुआती वर्षों में मूर्ति निर्माण, पूजा सामग्री और आयोजन की व्यवस्था कैसे होती थी?
– मंदिर समिति के पास पुराने रजिस्टर, तस्वीरें, रसीदें, निमंत्रण-पत्र या अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध हैं या नहीं,,,,,??
इन सवालों के उत्तर मंदिर समिति, स्थानीय बड़े बुजुर्गों, पुराने परिवारों और समाचार पत्रों के अभिलेखों से मिल सकते हैं। इससे मंदिर के इतिहास को केवल प्रचलित जानकारी तक सीमित रखने के बजाय दस्तावेजों के आधार पर और समृद्ध किया जा सकेगा।आस्था से जुड़ा शहर का ऐतिहासिक अध्याय
श्री बड़ा दुर्गा मंदिर गुमला की धार्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इसकी पूजा परंपरा सन् 1931 से जुड़ी बताई जाती है, जबकि शहर में सार्वजनिक श्री बडा दुर्गा पूजा का इतिहास सन् 1921 की दुर्गाबाड़ी परंपरा से आगे बढ़ता है।
इन दोनों पड़ावों के बीच गुमला के सामाजिक जीवन में धार्मिक आयोजनों के विस्तार की कहानी छिपी है। समय बदला, शहर विकसित हुआ और पूजा के स्वरूप में बदलाव आए, लेकिन श्री बड़ा दुर्गा मंदिर को बड़ा मंदिर के रूप में ही सम्मानित किया जाता है और मान सम्मान देते हुए श्री बड़ा दुर्गा मंदिर को एक अलग दर्जा प्राप्त है, फलस्वरुप श्री बडा दुर्गा मंदिर के नेतृत्व में ही विसर्जन निकाला जाता है, अतः श्री बड़ा दुर्गा मंदिर में मां दुर्गा की आराधना और पूजा अर्चना आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का आधार बनी हुई है।
श्री बड़ा दुर्गा मंदिर का इतिहास केवल एक मंदिर में पूजा शुरू होने की तारीख नहीं है; यह उस शहर की कहानी है, जहां सामूहिक विश्वास ने धार्मिक परंपरा को सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनाया।









































