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Thursday, July 18, 2024
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ऑपरेशन लोटस के जरिए झारखंड सरकार को अस्थिर करने की मुहिम जारी, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद हेमंत सोरेन की मुश्किलें बढ़ीं

भाजपा की दिल्ली लॉबी चंपाई सोरेन की नाराजगी का फायदा उठाने की फिराक में

कोल्हान में घूम रहे हैं भाजपा के मैनेजर, कई विधायकों पर डोरे डालने की हो रही है कोशिश 

नारायण विश्वकर्मा

रांची :  हेमंत सोरेन सरकार के विश्वास मत जीतने के बाद एक बार फिर ऑपरेशन लोटस असफल भले हो गया है, लेकिन सरकार पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. 3 जुलाई को चंपाई सोरेन के भारी मन से सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा के प्रदेश प्रभारी व असम के सीएम हिमंता विश्वसरमा रेस हो गए थे. चंपाई के प्रति उमड़ी भाजपा की सहानुभूति से झामुमो के अंदर खलबली मच गई थी. इसके बाद आनन-फानन में हेमंत सोरेन ने 7 जुलाई की जगह 5 जुलाई को ही शपथ लेने में अपनी भलाई समझी. सूत्र बताते हैं कि भाजपा की दिल्ली लॉबी चंपाई सोरेन की नाराजगी का फायदा उठाने की फिराक में थी. लेकिन ऐन वक्त पर राजनीतिक दांवपेंच फेल हो गया. इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. सोमवार को ईडी ने झारखंड हाईकोर्ट के सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद हेमंत सोरेन सरकार को सकते में ला दिया है. हालांकि झामुमो ने इसका खंडन करते हुए कहा है कि जैसा हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया है वैसा ही फैसला सुप्रीम कोर्ट भी दे देगा. लेकिन ये अनुमान लगाना कठिन है.

हेमंत सोरेन को खनन घोटाले में कहीं फिर से घेरने की तैयारी तो नहीं…!

प्रदेश भाजपा की ओर से कहा याद दिलाया गया है कि झामुमो यह कैसे भूल रहा है कि झारखंड हाईकोर्ट की डबल बेंच में चीफ जस्टिस ने पिछले 3 मई को (केस संख्या WPCr 68 /2024) अपनी टिप्पणी में कहा था कि हेमंत सोरेन के खिलाफ जमीन लूट के प्रथम दृष्टया प्रमाण मिलते हैं। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने ईडी की प्रारंभिक कार्रवाई को उचित ठहराया था। भाजपा ने यह भी याद दिलाया कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्णय है कि जमानत के समय की गई टिप्पणियां किसी केस के मेरिट का आधार नहीं हो सकता। हेमंत सोरेन ने अपने दिल्ली आवास से 36 लाख रुपए की रिकवरी को लेकर जो तर्क दिया है उसमें कानूनी पेंच है। इसी मामले को आधार बनाकर ईडी सुप्रीम कोर्ट में बहस कर सकती है. खबर यह भी है कि हेमंत सोरेन को खनन घोटाले में फिर से घेरने की तैयारी की जा रही है. हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा खनन घोटाले में अभी जेल में है, जिसमें हेमंत सोरेन के तार जुड़े हुए हैं. सूत्र बताते हैं कि ईडी उस फाइल को फिर से खंगालने का काम में लग गई है.

आखिर हाईकोर्ट से ईडी को एक दिन की भी मोहलत क्यों नहीं मिली…?

बता दें कि जमीन घोटाले में गिरफ्तार हेमंत सोरेन को झारखंड हाईकोर्ट ने 28 जून का जमानत दे दी थी। जमानत देने के साथ ही कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा था कि जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन के खिलाफ सीधे तौर कोई सबूत नहीं दिख रहे हैं। उस समय ईडी द्वारा हेमंत सोरेन की जमानत को रोकने के लिए 24 घंटे की मांगी गई मोहलत को कोर्ट ने खारिज कर दिया था और हेमंत सोरेन जेल से बाहर आ गये। उनके जेल से बाहर आने के बाद भाजपा के रांची से लेकर दिल्ली तक के शीर्ष नेताओं को झटका लगा था. इसके बाद ही ईडी को हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा. इससे पूर्व ऑपरेशन लोटस की टीम ने चंपाई सोरेन पर डोरे डालने की कोशिश की. लेकिन समय रहते चंपाई सोरेन को मना लिया गया और सरकार में उन्हें दो नंबर की पोजिशन दे दी गई पर, घोषित रूप से डिप्टी सीएम का पद अभी तक नहीं दिया गया है.

विधानसभा में चंपाई सोरेन के अंदाजे बयां पर उठे हैं कई सवाल

चंपाई सोरेन को सीएम पद छोड़ने का मलाल है, उनकी बातों और बॉडी लैंग्वेज से भी पता चलता है. सोमवार को हुई कैबिनेट की बैठक के बाद जब पूर्व सीएम चंपाई सोरेन मीडिया से मुखातिब हुए तो जिस अंदाज में उन्होंने अपनी बातें रखीं, वह कई तरह के संदेह पैदा करता है. मंत्री बनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि आज तो शुरुआत है। थोड़ा समय दीजिए, आगे की जानकारी भी धीरे-धीरे मिल जाएगी। जब उनसे पूछा गया कि उनके उप मुख्यमंत्री बनने की बात भी चल रही थी उसका क्या हुआ? इसपर उन्होंने गोलमोल जवाब दिया कि वह जहां भी रहते हैं वहां अच्छा ही काम करते हैं। इससे पूर्व विधानसभा के विशेष सत्र में चंपाई सोरेन ने विश्वास मत के समर्थन में बोलने के लिए सदन में जब खडे हुए थे तो, उन्होंने एक बार भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का नाम नहीं लिया। उन्होंने कहा कि मुझे कुछ दिनों के लिए गठबंधन की ओर से नेतृत्व का भी मौका मिला। पक्ष-विपक्ष दोनों ने इस राज्य में नेतृत्व किया है। इसके बावजूद जो विकास आदिवासी-मूलवासी समाज का होना चाहिए था वो नहीं हुआ है। आदिवासियों की संख्या सिर्फ संथाल में ही कम नहीं हुआ है, बल्कि रांची में भी कम हुई है।

हेमंत के जेल जाने से भाजपा को लोस चुनाव में नुकसान पहुंचा

यहां बताते चलें कि 2020 से ही हेमंत सरकार को अस्थिर करने का प्रयास चल रहा है. इस बीच ईडी जमीन घोटाले के मामले में हेमंत सोरेन को फंसाकर जेल भेजने में सफल हो गई. उस वक्त ऑपरेशन लोटस के सामने हेमंत सोरेन ने हथियार नहीं डाले और उन्होंने जेल जाना मंजूर किया. इससे हेमंत सोरेन को राजनीतिक माइलेज मिला और लोकसभा चुनाव में सभी पांचों आदिवासी सीटों पर इंडिया गठबंधन को सफलता मिली. 2019 के लोकसभा चुनाव में झामुमो को सिर्फ एक सीट (राजमहल) मिली थी. इस बार के लोकसभा चुनाव में राजमहल के अलावा दुमका और चाईबासा सीट भी झामुमो की झोली में आ गई. इसके अलावा विधानसभा उपचुनाव में गांडेय से उनकी पत्नी कल्पना सोरेन को भी जबर्दस्त जीत मिली. इसलिए हेमंत सोरेन के जेल जाने से झामुमो को फायदा मिला, जबकि भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव में मिली सफलता से कांग्रेस-झामुमो के हौसले बुलंद हैं. अब सामने विधानसभा चुनाव है. पक्ष-विपक्ष अपनी-अपनी रणनीतियां बनाने में जुटा हुआ है.

अहम सवाल…राष्ट्रपति शासन में विधानसभा चुनाव कराने की केंद्र की मंशा सफल हो पाएगी…! 

मौजूदा समय में इंडिया गठबंधन का पलड़ा भारी दिख रहा है. यही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है. दरअसल, हेमंत सोरेन के सीएम रहते विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह आसान नहीं होगी. दिल्ली के सूत्र बताते हैं कि भाजपा ईडी के भरोसे विधानसभा चुनाव के पूर्व हेमंत सोरेन को दुबारा जेल भेज कर झारखंड में राजनीतिक अस्थरिता कायम करना चाहती है, ताकि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सके. बताया गया कि भाजपा चाहती है कि झारखंड में राष्ट्रपति शासन में विधानसभा चुनाव हो. इसके लिए भाजपा के रणनीतिकार झामुमो-कांग्रेस के विधायकों के संपर्क में हैं. कहा जाता है भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व एक रणनीति के तहत ही हिमंता विश्वसरमा और शिवराज सिंह चौहान को झारखंड का प्रभारी बनाया गया है. खबर है कि कोल्हान में भाजपा के मैनेजर झामुमो के विधायकों पर डोरे डाल रहे हैं. बहरहाल, चंपाई सोरेन को मंत्री बनाकर झामुमो ने डैमेज कंट्रोल कर ऑपरेशन लोटस की धार को कुंद जरूर किया है, लेकिन इस बीच हेमंत सोरेन को सुप्रीम कोर्ट से अगर राहत नहीं मिली और उन्हें फिर जेल जाना पड़ा तो, केंद्र राष्ट्रपति शासन लगाने की कवायद कर सकती है. तबतक हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना होगा.       

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