नारायण विश्वकर्मा
हमारे लोकतंत्र के नये मंदिर के निर्माण से दिल्ली जगमगा उठी. सेंट्रल विस्टा के निर्माण के साथ-साथ नई दिल्ली के पावर कॉरिडोर के संग ल्युटियन की दिल्ली में खासकर राजपथ (अब कर्तव्य पथ) का चेहरा, चाल और मिजाज सब बदल गया. देसवासी खुश हैं, क्योंकि हमारे प्रधान सेवक का ड्रीम प्रोजेक्ट निर्धारित समय-सीमा में पूरा हुआ. लेकिन हम आपको सेंट्रल विस्टा की जगमगाहट से दूर कोरोना कालखंड के काले इतिहास की ओर ले जाना चाहेंगे. काला इतिहास इसलिए कि जब प्रोजेक्ट के निर्माण की नींव रखी गई थी तो, वैश्विक कोरोना की त्रासदी अपने चरम पर था. अब आप पूछेंगे इससे सेंट्रल विस्टा के निर्माण से कैसा संबंध…? संबंध इसकी टाइमिंग को लेकर है.
अवाम की सलामती नहीं, अपनी जिद को प्रमुखता दी
कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव और लॉकडाउन को लेकर उस समय दिल्ली में ही चांदनी चौक रीडेवलपमेंट और प्रगति मैदान इंटीग्रेटेड ट्रांजिट कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट का काम रोक दिया गया, जबकि 2020 के मई के अंत तक इनका काम पूरा हो जाना था। वहीं दूसरी तरफ सेंट्रल विस्टा के ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ के काम को लॉकडाउन में आवश्यक सेवा का दर्जा देते हुए तीनों शिफ्ट में काम करने की अनुमति दे दी गई, क्योंकि ये हमारे प्रधान सेवक की जिद थी. इसलिए कोरोना कालखंड में सेंट्रल विस्टा निर्माण की जल्दबाजी पर सवाल उठना लाजिमी है. हमारा रहनुमा विषम परिस्थिति में पहले अपने मुल्क की हिफाजत और अवाम की सलामती चाहेगा कि अपनी जिद को प्रमुखता देगा? इसलिए सबसे बड़ा सवाल सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की टाइमलाइन को लेकर था…है…रहेगा. इतिहास से इसका जवाब आनेवाली पीढ़ी भी मांगेगी.
त्रासदी के दौर में ड्रीम प्रोजेक्ट जरूरी क्यों बना?
अब इस टाइमिंग को लेकर मेरा अवाम से सवाल है… मान लीजिए आपको दो महत्वपूर्ण कार्यों को निबटाना है. जैसे आपके यहां के कोई करीबी रिश्तेदार असाध्य रोग से ग्रसित है और उसका जीवन मृत्यु की सीमा पर पहुंच गया है. दूसरा महत्वपूर्ण कार्य… अपने टूटे-फूटे घर को नया रूप देना है. अब आप बताइये कि आप पहले किसे प्राथमिकता देंगे? निश्चित रूप से पहले आप जीवन देखेंगे. जीवन रहेगा तो कई घर बन जाएंगे. आप घर बनाने के लिए रखे पूरे पैसे बीमारी में झोंक देंगे. क्योंकि जीवन अनमोल है. ठीक उसी तरह 2020-21 की वैश्विक त्रासदी कोरोना में जब लोग ऑक्सीजन और इलाज के लिए तड़प-तड़प कर अपनी जान दे रहे थे. पूरे देश में अस्पताल कम पड़ गए थे. लाशों के अंबार को श्मशान में जगह नहीं मिल रही थी. वहां लकड़ियां कम पड़ गई थी. फिर त्रासदी से त्राहिमाम करते देशवासियों को खुद के भरोसे छोड़, प्रधान सेवक के लिए आवश्यक काम सेंट्रल विस्टा का निर्माण कैसे हो गया? अगर दो-तीन साल के लिए इस प्रोजेक्ट को जनहित के कल्याणार्थ टाल दिया जाता तो कौन सी आफत आ जाती? क्या वर्तमान संसद भवन की छत टपक रही थी? ये सत्ताधीशों के लिए यक्ष प्रश्न है.
मुद्दा बना कर्तव्यपथ के नामकरण का
सेंट्रल विस्टा के निर्माण पर मैं सवाल नहीं खड़ा कर रहा हूं. मैं सिर्फ इसकी टाइमिंग पर सवाल उठा रहा हूं. इसकी निर्धारित समय-सीमा की अनिवार्यता पर सवाल खड़ा कर रहा हूं. कहते हैं दिल्ली का दिल हिंदुस्तान के लिए धड़कता है. फिर कोरोना के कालखंड में करोड़ों धड़कनों पर मौत का पहरा क्यों था? देश के करोड़ों लोगों की चारों ओर से उठती चीत्कारें…श्मशानों में महीनों उठती आग की लपटें… क्या ऐसी महाभयंकर आपदा से अपने हिंदुस्तान का कभी वास्ता पड़ा था? ऐसे सैकड़ों सवालों पर आज चर्चा होनी चाहिए थी. ऐसे में प्रधान सेवक को अपनी दूरदर्शिता का परिचय देना चाहिए था. लेकिन किसी ने इसपर सवाल नहीं उठाया. राष्ट्रीय खबरिया चैनलों के कथित देशभक्त टीवी योद्धाओं ने कर्तव्यपथ के नामकरण को मुद्दा बनाया. ऐंकर अपने पैनलिस्टों को इसी में उलझाए रखा. चूंकि मुद्दा उछाल कर उनकी झोली में आसानी से डाल दिया गया था. प्रिंट मीडिया की फौज ने भी कारोना कालखंड के काले इतिहास में झांकने की जहमत नहीं उठाई. इतिहास इन्हें भी कभी माफ नहीं करेगा.
कोरोनाकाल में करोड़ों खर्च का व्यापक विरोध हुआ
सारा देश कोरोना वायरस और लॉकडाउन की मार झेलने को अभिशप्त था. सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर तमाम बुद्धिजीवियों ने इस प्रोजेक्ट के निर्माण को आवश्यक सेवा के दायरे में रखने पर आपत्ति जतायी थी. उधर, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट में इस परियोजना को लेकर याचिकाओं के अंबार लग गए थे. आजादी के बाद से ही देश का स्वास्थ्य तंत्र का ढांचा चरमराया हुआ था. दूरदर्शी राजनेता पहले जर्जर स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करता. इसलिए इस प्रोजेक्ट पर करोड़ों खर्च करने का व्यापक विरोध हुआ. इतनी आलोचनाओं के बावजूद सरकार प्रोजेक्ट को वाजिब ठहराने में लगी रही. वहीं प्रबुद्धजन का कहना था कि इस महामारी के ख़त्म होने तक एक-दो साल के लिए इसे स्थगित कर देने से कौन सी आफत आ जाएगी. संसद भवन इतना भी जर्जर नहीं हुआ है कि दो साल में कुछ हो जाएगा. अभी सरकारी धन को लोगों के स्वास्थ्य में अधिक कारगर तरीके से उपयोग किया जाना चाहिए. जरा सोचिए 20 हजार करोड़ में देश के हजारों गांवों में अस्पतालों का निर्माण कराया जा सकता था. लेकिन हुक्मरान ने स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने के बदले अपने सपने को पूरा करने में बेचैनी दिखाई.
शुरू से विवादों में रहा प्रोजेक्ट
यह प्रोजेक्ट शुरू से विवादों में रहा। इसका काम पूरी तरह से पीएमओ की देखरेख में पूरा हुआ. पहले तो इसे मंजूरी देने में गजब की तेजी दिखाई गई। लॉकडाउन के दौरान नए संसद भवन के लिए पर्यावरण मंजूरी दी गई और फिर टेंडर निकाला गया। आमतौर पर ऐसे प्रोजेक्ट पर काफी बहस होती है, लोगों की राय ली जाती है, अध्ययन किए जाते हैं। लेकिन इस प्रोजेक्ट में काफी गोपनीयता बरती गई. टेंडर लेनेवाले ने क्यों प्रेशर बनाया? कहते हैं इसके पीछे एक बहुत बड़ी लॉबी लगी हुई थी, जिसे लॉकडाउन से कोई लेना-देना नहीं था. उस लॉबी ने पीएमओ पर लगातार दबाव बनाए हुए था.

प्रोजेक्ट को आवश्यक सेवाओं में क्यों गिना गया?
ये राष्ट्रीय शर्म का विषय था जब कोरोना काल में इसे अतिमहत्वपूर्ण समझा गया था. इस परियोजना के काम को आवश्यक सेवाओं में गिना गया. कोरोना कालखंड के दो साल बाद भी इनके ज़ख़्म अभी हरे हैं. केंद्र ने तमाम आलोचनाओं का जवाब दिया…सेंट्रल विस्टा आधुनिक भारत का प्रतीक होगा. कुछ लोग इसका महत्व नहीं समझ रहे हैं, कुछ लोग देश को विकास करते नहीं देख सकते. लॉकडाउन तो इनके लिए कोई विषय ही नहीं था. कोरोना कालखंड में निर्मित सेंट्रल विस्टा भले किसी के लिए सपने का महल हो, पर इसकी बुनियाद खोखली है. हमें कभी अपने अतीत को नहीं भूलना चाहिए. लेकिन याद रहे कल की बुनियाद पर आज टिका है और आज को हम कल से जुदा नहीं कर सकते.
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