नारायण विश्वकर्मा
लोहार समुदाय को एसटी की सूची में शामिल करने की मांग वाली याचिका झारखंड हाईकोर्ट में खारिज होने के बाद अब इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी है. बहुत जल्द सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की जाएगी. याचिकाकर्ता गिरिडीह निवासी दशरथ प्रसाद शर्मा ने कहा कि यह कितनी विचित्र बात है कि लोहारा (कोई जाति समुदाय नहीं) को एसटी बताकर लोहार समुदाय को एसटी सूची से हटा कर ओबीसी बताया जा रहा है. उन्होंने कहा कि झारखंड हाईकोर्ट में सुनाए गए फैसले को भी मीडिया ने सभी तथ्यों को उजागर नहीं किया है, यह मीडिया का अर्द्धसत्य है. सही बात तो ये है कि राज्य सरकार का यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का ही उल्लंघन है।
लोहारा जाति केंद्र-राज्य सरकारों की जाति सूची में शामिल नहीं
उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां आदेश (संशोधन) अधिनियम 1976 में लोहार एसटी में अधिसूचित है. गजट में भी लोहार समुदाय को एसटी माना गया है. दुर्भाग्यपूर्ण यह है झारखंड सरकार ने 13 अगस्त 2019 द्वारा लोहार समुदाय के बदले लोहारा समुदाय को एसटी बता दिया है. जबकि लोहारा समुदाय का वजूद ही नहीं है. यहां तक कि झारखंड में 1932 के खतियान में भी लोहारा जाति बदले लोहार दर्ज है. झारखंड में अनुसूचित जनजाति में लोहरा और लोहारा को शामिल किया गया है. वहीं याचिकाकर्ता दशरथ शर्मा द्वारा इस संबंध में सूचना अधिकार के तहत मांगी गई रिपोर्ट में भी झारखंड में लोहारा नाम के किसी समुदाय का कोई वजूद नहीं बताया गया. लोहारा जाति के नाम पर कोई जाति प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया जाता.
झारखंड हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने को कहा
बता दें कि कुछ दिन पूर्व झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस राजेश शंकर की एक बेंच ने झारखंड सरकार के उस फैसले को सही बताया,सही बताया जिसमें अगस्त 2019 में लोहार जाति को एसटी की श्रेणी से बाहर करते हुए ओबीसी में शामिल किया गया है। याचिकाकर्ता दशरथ प्रसाद शर्मा और सरकारी वकील की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने लोहार को एसटी में शामिल करने के लिए दायर याचिका खारिज कर दी थी। इस याचिका में कहा गया था कि झारखंड सरकार ने लोहार जाति को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की श्रेणी से अलग करते हुए ओबीसी में शामिल कर दिया है। पहले लोहार जाति एसटी में थी। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में ही सुनवाई संभव है.
लोहार-लोहरा और लोहारा के पेंच में उलझाया गया
इस संबंध में 13 और 23 जुलाई 2001 को लोहार जाति के सदस्यों द्वारा टीआरआई के निदेशक से विचार-विमर्श किया गया. समाज के विशिष्ट और जानकार लोगों ने बताया कि अंग्रेजी में लोहारा (Lohara) हिन्दी में लोहार (Lohar) जिसे स्थानीय भाषा में समाज द्वारा Lohra (लोहरा) कहा जाता है. जाति सूची में लोहार को लोहारा बताया गया है. दरअसल जातियों की सूची में हिंदी में कहीं लोहारा शब्द का जिक्र ही नहीं है. निदेशक ने सदस्यों को बताया कि बिहार सरकार द्वारा लोहारा,लोहरा को जाति सूची से विलोपित कर सिर्फ लोहार जाति दर्ज है. इस तथ्य के आधार पर पटना उच्च न्यायालय के फैसले के आलोक में बिहार सरकार द्वारा लोहार जाति के सदस्यों को अनुसूचित जनजाति का सशर्त औपबंधिक रूप से जनजाति का जाति प्रमाण पत्र निर्गत किया गया. इसके आधार पर सरकारी सेवकों को प्रोन्नति का लाभ भी दिया गया. वहीं सुप्रीम कोर्ट में लोहार जाति को पिछड़ी जाति एनेक्सर-ii एवं लोहरा-लोहारा को अनुसूचित जनजाति मानते हुए मुकदमा खत्म कर दिया गया.
5 साल बाद भी टीएसी ने फैसला नहीं दिया
बता दें कि 13 अगस्त 2019 को झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग द्वारा जारी पत्र में आवेदक दशरथ प्रसाद शर्मा को जो जवाब दिया गया, अब उसपर जरा गौर फरमाएं. लोहार जाति को झारखंड राज्य में अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के संबंध में विभाग ने बताया कि दशरथ प्र. शर्मा के पत्र सं-Jharkhand/Supreme Court Order/Lohar/2019/03, 10 मई 2019 के प्रसंग में उल्लेख है कि लोहार समुदाय को झारखंड राज्य के अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के संबंध में डॉ.रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के पत्र सं-281,3 अगस्त 2018 के द्वारा समर्पित प्रतिवेदन में मंतव्य दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा Civil Appeal no.-SLP-2688(C) no. of 1996/1569 of 1994 फैसले में लोहार जाति को अन्य पिछड़ी जाति के रूप में दर्शाया गया है. लोहार जाति में वह विशेषताएं नहीं जो अनुसूचित जनजातियों में निहित है. अत: लोहार जाति को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है. पत्र में यह भी कहा गया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, झारखंड की अधिसूचना सं-2767,13 सितबंर 2017 के द्वारा अन्य जातियों के साथ लोहार जाति के संबंध में मूल्यांकन के लिए जनजातीय परामर्शदातृ परिषद (टीएसी) की उपसमिति के द्वारा अध्ययन किया जा रहा है. हालांकि सूचना है कि टीएसी की उपसमिति में कभी इसका अध्ययन नहीं किया गया है.
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